Thursday, 1 October 2020
क्यों लेते है चरणामृत
Sunday, 20 September 2020
अधिक मास में करे ये काम चमक जायेगी आपकी क़िस्मत
- ऐसी मान्यता है कि पीला रंग भगवान विष्णु को अत्यधिक प्रिय है. इसलिए मलमास के इस पूरे महीने के दौरान भगवान विष्णु को पीले रंग की ही वस्तुएं ही चढ़ानी चाहिए. जैसे कि पीले पुष्प, पीले फल, पीले वस्त्र आदि. जिसे बाद में दान कर देना चाहिए.
- भगवान विष्णु को तुलसी अधिक प्रिय होने के कारण पूरे मलमास में गाय के घी के दीपक तुलसी के पेड़ के सामने करना चाहिए. दीपक जलाने के बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र का जप करते हुए तुलसी के पेड़ की 11 बार परिक्रमा करनी चाहिए.
- पूरे मलमास के समय ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करने के पश्चात केसर युक्त दूध से भगवान विष्णु का अभिषेक करना चाहिए इसके बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र का 11 बार जाप करना चाहिए.
- पूरे मलमास के दौरान पीपल के पेड़ में जल चढ़ाना चाहिए और गाय के घी का दीपक करना चाहिए क्योंकि पीपल के वृक्ष में श्री हरि विष्णु का वास माना जाता है.
- पूरे मलमास की दौरान में रोज सूर्य भगवान को जल चढ़ना चाहिए. जल चढ़ाते समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः' का जाप करते हुए भगवान विष्णु का ध्यान करते रहना चाहिए.
- ऐसा कहा गया है कि मलमास की अवधि के अन्तर्गत दक्षिणवर्ती शंख की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से श्री हरि विष्णु के साथ ही माताश्री लक्ष्मी का भी आशीर्वाद मिलता है.
- मलमास की नवमी तिथि को कन्याओं को भोजन करवाने से भी सर्व मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
इसलिए आता है मलमास
चन्द्रमा 29.5 दिनों में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरा करता है। चन्द्रमा पृथ्वी की 12 परिक्रमा 354 दिन में पूरी होती है। इसलिये चन्द्र वर्ष कुल 354 दिन का होता है, जो सौर वर्ष से कुल 11 दिन कम होता है। इस प्रकार तीन वर्षों में कुल 33 दिन का अंतर आ जाता है। इसी कमी को तीन वर्षों में कुल 13 महीने मानकर एक महीने का मलमास पड़ता है।
Tuesday, 11 August 2020
जाने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मानाने का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था.
इस बार पंचांग के अनुसार अष्टमी की तिथि 11 अगस्त यानि आज सुबह 9 बजकर 6 मिनट से आरंभ हो रही है. अष्टमीकी तिथि 12 अगस्त को सुबह 11 बजकर 16 मिनट पर समाप्त हो रही है. 11 अगस्त को भरणी और 12 अगस्त को कृतिका नक्षत्र है. इसके बाद रोहिणी नक्षत्र आता है जो 13 अगस्त को रहेगा. इसीलिए कुछ स्थानों पर इस दिन भी जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है.
इस वर्ष कृष्ण जन्मोत्सव पर बन रहा है एक विशेष योग
इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी पर एक विशेष योग बन रहा है. पंडितों के मतानुसार, उसी दिन कृतिका नक्षत्र लगेगा. यही नहीं, चंद्रमा मेष राशि और सूर्य कर्क राशि में रहेंगे. कृतिका नक्षत्र और राशियों की इस स्थिति से वृद्धि योग बना रहा है. इस तरह बुधवार की रात के बताए गए मुहूर्त में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से दोगुना फल मिलेगा। 12 अगस्त को वृष राशि चंद्रमा कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में होंगे. रोहिणी नक्षत्र के नजदीक चंद्रमा होंगे, इसलिए 12 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना शुभ रहेगा।
क्या है शुभ मुहूर्त?
जन्माष्टमी के दिन रात को पूजा करने का समय सही होता है. क्योंकि, द्वापर युग में श्रीकृष्ण का अवतार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में हुआ था. उस समय चंद्र उच्च राशि वृषभ में था. उस दिन बुधवार और रोहिणी नक्षत्र था. भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को ही हुआ था. 12 अगस्त को पूजा का शुभ समय रात 12 बजकर 5 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक है. पूजा की अवधि 43 मिनट है.
पूजा की विधि
पूजा से पहले स्नान जरूर करें. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा का विधान है. पूजा करने से पहले भगवान को पंचामृत और गंगाजल से स्नान जरूर से करवाएं. स्नान के बाद भगवान को वस्त्र पहनाएं. ध्यान रहें कि कन्हाजी के वस्त्र नए हो. इसके बाद उनका श्रृंगार करें. भगवान को फिर माखन का भोग लगाएं और कृष्ण आरती गाएं.
Tuesday, 4 August 2020
जाने कैसे नारद के सिद्द किया कि 'नाम ' बड़ा या 'नामी ', "जय श्री राम"
Sunday, 19 July 2020
20 जुलाई 2020 ज्योतिष के अनुसार 20 साल बाद बन रहा है "सोमवती अमावस्या" का संयोग, जाने व्रत कथा और उपाय
अमावस्या तिथि प्रारंभ- 20 जुलाई 12.10 AM से
अमावस्या तिथि प्रारंभ समाप्त- 20 जुलाई 11.02 PM तक
सोमवती अमावस्या से दूर होते हैं अशुभ योग
Saturday, 18 July 2020
अगर घर में है तुलसी का पोधा तो रखे इन विशेष बातों का धयान
हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। तुलसी का पौधा 5 प्रकार का होता है:
1. श्याम तुलसी
2. राम तुलसी
3. विष्णु तुलसी
4. वन तुलसी और
5. नींबू तुलसी।
तुलसी का पत्ता तोड़ने के नियम भी हैं। ऐसा नहीं है कि आप तुलसी जी के पौधे के पास गए और तोड़ दिया पत्ता। तुलसी जी का पौधा पूजन के लिए होता है। अगर देखा जाए तो तुलसी का एक रूप लक्ष्मी का भी है या यूं मानें कि तुलसी जी कोई पौधा नहीं है अपितु तुलसी जी राधा जी का अवतार हैं इसलिए तुलसी जी का पत्ता तोडऩे और घर में तुलसी जी को रखने के नियम हैं।
रविवार, शुक्रवार, एकादशी, अमावस्या, चौदस तिथि, ग्रहण और द्वादशी को तुलसी का पत्ता नहीं तोडऩा चाहिए।
रविवार और एकादशी को तुलसी जी को जल अर्पण नहीं करना चाहिए।
तुलसी का पत्ता कभी भी नाखून से नहीं तोडऩा चाहिए।
तुलसी के पौधे से गिरे हुए पत्तों का प्रयोग औषधि अथवा अन्य क्रियाओं में करना चाहिए या गिरे हुए पत्तों को मिट्टी में दबा देना चाहिए।
बिना किसी विशेष कारण के तुलसी का पत्ता नहीं तोडऩा चाहिए।
तुलसी जी का पत्ता तोड़ने से पूर्व इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
‘मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानंद कारिणी।
नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते
Friday, 17 July 2020
प्रभु_श्रीकृष्ण के जीवन के अनकहे लम्हे :-
Monday, 13 July 2020
अग्नि देव की महिमा
अग्नि देवता पंच तत्वों में से एक है। इन्हे यज्ञ और हवन का सबसे महान अंग मानते है। हवन के माध्यम से इन्ही के द्वारा हव्य देवताओ तक पहुँचाई जाती है। अत: इन्हे सभी देवताओ का मुख भी कहते है। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।
पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी का नाम स्वाहा है। इनके तीन पुत्र नाम पावक, पवमान तथा शुचि है।
अग्नि देव की कृपा के हिन्दू धार्मिक पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा लेने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुंडल मांगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुंच उनकी आज्ञा से महारानी का कुण्डल प्राप्त किया। रानी ने कुंडल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुंडलो को सावधानी से ले जाइयेगा नहीं तो तक्षकनाग कुंडल छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुंडलो के लेकर पाताल में चला गया। अग्नि देव की कृपा से ही उत्तंक ने दुबारा कुंडल प्राप्त किए और उन्हें गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। अग्नि देव ने ही अपने ब्रम्हचारी भक्त उपकोशल को ब्रम्ह विद्या का उपदेश दिया था।
अग्नि देव की प्रार्थना और उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त कर सकता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है। अग्नि देव का बीजमन्त्र ‘रं’ तथा मुख्य मंत्र ‘रं वहिन्चैतन्याय नमः’ है।
Tuesday, 7 July 2020
सावन में करे इस मंत्र का जाप और करे महादेव को प्रसन्न
किसी-किसी व्यक्ति के हाथों की रेखाओ में अकाल मृत्यु का योग होता है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र के जाप से अकाल मृत्यु के योग को टाला जा सकता है। ऐसा भी कहा गया है कि इस मंत्र के जाप से मौत के मुंह से लोग बाहर आ जाते हैं। इतना ही नहीं अगर आपकी कुंडली में कोई गंभीर बीमारी, दुर्घटना या फिर कम आयु का योग है तो इस मंत्र के जाप से यह भी टल सकता है।
भय से मुक्ति मिलती हैं इस मंत्र से
अगर आपको किसी बात य चीज से डर लगता है तो आपकों इस मंत्र का जाप जरूर से करना चाहिए, क्योंकि यह मंत्र आपको भय से मुक्ति दिलाता हैं। बच्चों को भी यह मंत्र जरूर से याद करवाना चाहिए। इससे उनको कभी डर नहीं लगेगा। भविष्य पुराण में तो यहां तक बताया गया है इस मंत्र का जाप रोज 108 बार करना चाहिए।
स्वास्थ्य लाभ के लिए
भले ही आपका स्वास्थ अच्छा हो मगर, आपको हर रोज सुबह 2 बजे से 4 बजे के बीच इस मंत्र का जाप करना चाहिए। जाहिर है आजकल की लाइफस्टाइल इस बात की इजाजत नहीं देती। ऐसे में आप सुबह आराम से उठ कर स्नान करके साफ कपड़े पहन कर रुद्राक्ष की माला ले कर इस मंत्र का जाप कर सकते है। इससे आपका स्वास्थ ठीक रहेगा। आप ऐसा किसी और के लिए भी कर सकती हैं। इसके लिए आपको उसके नाम का संकल्प लेना पड़ेगा।
धन लाभ के लिए
अगर आप प्रॉपर्टी के मामले में उलझे हैं या फिर आप आर्थिक संकट की समस्या से जूझ रही हैं तो आपको महामृत्युंजय मंत्र का जाप जरूर से करना चाहिए। इससे आपके व्यापार में वृद्धि होगी। इतना ही नहीं आपके रुके हुए काम भी बनने लगेंगे। मगर, इसके लिए आपको शिवलिंग के समक्ष बैठ कर शिवलिंग की पूजा अराधना करने के बाद ही इस मंत्र का जाप करना पड़ता है।
Sunday, 5 July 2020
क्यों मनाते है गुरु पूर्णिमा
गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.
गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.
वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 'गुरु पूर्णिमा' अथवा 'व्यास पूर्णिमा' है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इसी के संदर्भ में यह समय अधिक प्रभावी भी लगता है. गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप. हिंदु परंपरा के अनुसार गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि "गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय". इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है.
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा
गुरु है ज्ञान का मार्ग
शास्त्रों में गुरू के अर्थ के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है. गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं. गुरु की भक्ति में कई श्लोक रचे गए हैं जो गुरू की सार्थकता को व्यक्त करने में सहायक होते हैं. गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता.
भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की.
गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है.
गुरू आत्मा - परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है , "हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर".
गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.
वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 'गुरु पूर्णिमा' अथवा 'व्यास पूर्णिमा' है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा
हिन्दू धर्म के सिद्धांत
इतिहास:- हिन्दू धर्म भारत का सबसे प्राचीन धर्म है वैसे इसके बारे में विद्वानों के अलग अलग मत है वही इतिहासकार इसको कुछ हजार वरषों पुराना बताते है वही भारत कि सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म चिन्ह है हिन्दू धर्म में मातृदेवी कि मूर्ति ,शिव पशुपति और भी देवता कि मुर्तिया पीपल कि पूजा हिन्दू धर्म में मानते है सिन्धु घाटी के लोग स्वय को आर्य बताते है और आर्य कि सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा जाता है
सिद्धांत ;- हिन्दू धर्म एक ही सिद्धान्त से नही बना है इसमें सभी सिद्धान्त को समान श्रध्दा दी जाती है इसमें अनेक मत और संप्रदाय आते है हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थाई मानता है हिन्दू धर्म क अनुसार मनुष्य ही ऐसा है जो पाप और पुण्य दोनों को भोग सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है इनमे चार संप्रदाय है । हा लेकिन इसमें ईश्वर के नाम अनेक है इस सिधान्त का मानना है कि धर्म कि रक्षा के लिय ईश्वर बार -बार जन्म लेता है और दुसरो को कष्ट देना पाप मानते है हमारी आत्मा अमर अजर है हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र है हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन को एक चक्र के रूप में माना गया है
हिन्दू धर्म के नियम – हिन्दू धर्म में 10 नियम है यह सुना जाता है ईश्वर ही शक्ति है कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस नियम का पालन नही करता है वह भटका हुआ होता है
1.ईश्वर प्रणिधान -ईश्वर इससे अलग किसी और में आस्था न रखे चाहे आप पर कितना ही दुःख हो अपनी आस्था को बनाये रखे
2.ईश्वर कि पूजा –ईश्वर कि पूजा हमे प्रतिदिन करनी चाहिए ये ध्यान और प्राथना दोनों से कि जा सकती है पूजा को नियमो के अनुसार ही करना चाहिए यह तक कि दुखो में भी पूजा करना न छोड़े
3.व्रत या उपवास –सप्ताह में एक व्रत जरुर रखे श्रावण का महिना बहुत ही शुभ माना जाता है इसमें मास का सेवन नही करना चाहिए वैसे तो सभी दिन श्रेष्ठरस माना जाते है इस महीने लेकिन सोमवार और शनिवार अधिक माना जाता है
4.तीर्थयात्रा या तीर्थस्थान -तीर्थयात्रा को बहुत ही सुभ माना जाता है और पुण्य भी हम सभी को कभी न कभी तीर्थ स्थानों पर जाना चाहिए इससे वैराग्य और कि प्राप्ति होती है
5.दान देना – हमे अपने जीवन दान पुण्य करना चाहिए गरीबो को खाना खिलाना चाहिए कपडे दान करने चाहिए जरुरी नही है कि आप पैसे खाना ही दान करो वेदों में अनेक दानो का जिक्र है जैसे अन्नदान ,विद्यादान,धनदान,अभयदान आदि
6.मकर सक्रांति और कुंभ पर्व मनाना –वैसे तो हम सभी त्योहारों को अच्छे से मनाते है परन्तु मकर सक्रांति को भी हमे अच्छे से मनाना चाहिए इसके बाद कुंभ का उत्सव मनाना चाहिए मकर सक्रांति के दोरान सभी देवता धरती पर घूमते रहते है जब सूर्य धनु राशी से मकर में जाता है तो मकर सक्रांति मनाते है
7.यज्ञ करना –ह्मेअपने घरो में साल में एक यज्ञ जरुर करना चाहिए वेद के अनुसार यज्ञ चार तरह के होते है ब्रह्मायज्ञ,देवयज्ञ,पितृयज्ञ,अतिथि यज्ञ,वैश्वदेव यज्ञ/ यज्ञ करने से घर में बुरी आत्मा नही आती है घर म शांति रहती है
8.सेवा करना –वेदों में लिखा है कि अपनी माता-पिता और गुरु कि सेवा करनी चाहिए उनको दुःख नही देने चाहिए उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए उनका अनादर न करे माता पिता कि सेवा ही सबसे बड़ा पुन्य है सेवा इसमें बच्चो महिलाओ बूढों आदि कि सेवा करना ही पुण्य है
9.संस्कार का पालन करना –हर एक घर में माँ बाप अपने बच्चो को अच्छे से अच्छे संस्कार देते है तो बच्चो को उनके संस्कारो का पालन करना चाहिए कोई भी गलत काम नही करने चाहिए जिससे संस्कारो पर प्रभाव पड़े प्रतिएक हिन्दू को संस्कारो का पालन करना चाहिए चाहे वो छोटे हो या बड़े
10.धर्म प्रचार –हमे अपने धर्म का बारे में कबी भी गलत नही बोलना चहिये हिन्दू धर्म को पढ़कर ही उसका प्रचार और प्रसार करना चाहिए उसको इसका ज्ञान एक से दुसरो को बाटना चाहिए अपने धर्म कि बुराइयाँ न सुने और अपने धर्म को जाने
Friday, 3 July 2020
कष्ट भंजन देव को प्रसन्न करने के लिए, कष्टों का निवारण करने के लिए करे ये पाठ
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमन मुकुरु सुधारि।
बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुँचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे।
कांधे मूंज जनेउ साजे।।
शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानु।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरे सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु संत के तुम रखवारे।।
असुर निकन्दन राम दुलारे।।
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुह्मरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै।।
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बन्दि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
Thursday, 2 July 2020
सब्जा यानी तुलसी के बीज के फायदे
कैंसर का खतरा होता है कम
कई रिसर्चों में बताया गया है कि तुलसी का बीज कैंसर के इलाज में फायदमंद होते है. हालांकि, इस बारे में अभी तक पुष्टि नहीं हुई है.
सांस की दुर्गंध को करता है दूर
तुलसी के पत्ते का इस्तेमाल करने से सांस की दुर्गंध को दूर करने में काफी हद तक राहत मिलती हैं. नेचुरल होने के कारण इसका कोई साइडइफेक्ट नहीं है. यदि आपके मुंह से बदबू आ रही हो तो तुलसी के कुछ पत्तों को चबा लें. इसके सेवन से दुर्गंध चली जाती है.
Tuesday, 30 June 2020
इस वर्ष सभी त्यौहार एक माह की देरी स आयेंगे
इस साल अंग्रेजी कैलेंडर का लीप ईयर और आश्विन के अधिकमास का योग 160 साल बाद बना है। इससे पहले 1860 में ऐसा अधिकमास आया था, जब उसी साल लीप ईयर भी था। इसी तरह 19 साल बाद आश्विन माह का अधिकमास आया था। इससे पहले 2001 में अश्विन माह में अधिकमास आया था। इसके बाद फिर 19 साल बाद यानि 2039 में अश्विन माह में अधिकमास का संयोग बनेगा।
हर तीन साल में आता है अधिकमास
ज्योतिष के अनुसार माने तो एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है। दोनों वर्षों के बीच में लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। ये अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन वर्ष में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अतिरिक्त होने की वजह से अधिकमास के नाम से जाना जाता है। अधिकमास के पीछे पूरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
Thursday, 25 June 2020
क्यों कहते हैं तुलसी को मां
वृंदा जब विवाह लायक हुई तो उनकी शादी राक्षस कुल के दानव राज जलंधर से कर दी गई. ये कहा जाता है कि जलंधर ने समुद्र से जन्म लिया था. विवाह के बाद वृंदा बड़ी ही पतिव्रता से अपने पति की सेवा किया करती थी.
एक बार की बात है जब देवताओं और दानवो में युद्ध छीडा. युद्ध पर जाते हुए वृंदा ने अपने पति जलंधर से कहा कि ‘स्वामी आप तो युद्ध पर जा रहे लेकिन जब तक आप जीत हासिल कर वापस नहीं आजाते तब तक मै आपके लिए पूजा (अनुष्ठान) करती रहूंगी और अपना संकल्प नहीं छोडूंगी’
जलंधर तो युद्ध में चले गए और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई.
वृंदा के व्रत का प्रभाव इतना था कि देवता जलंधर से जीतने में नाकाम हो रहे थे. जब देवता हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास जा पहुचे. सभी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि किसी भी तरह वे देवताओं को युद्ध जिताने में मदद करे.
भगवान् विष्णु बड़े ही असमंजस की स्थिति में थे. वे सोच रहे थे कि वृंदा को कैसे रोका जाए, जबकि वो उनकी परम भक्त थी.
बड़े ही सोचने समझने के बाद श्री विष्णु जी ने वृंदा के साथ छल करने का निर्णय ले ही लिया. वृत पूजा को तोड़ने के लिए उन्होंने वृंदा के पति जलंधर का रूप धारण किया. जलंधर के रूप में विष्णु वृंदा के महल में जा पहुचे. वृंदा ने जैसे ही अपने पति जलंधर को देखा तो उनके चरण छुने के उद्देश्य से पूजा से उठ पडी. जिससे वृंदा का संकल्प टूट गया.
वृंदा का वृत संकल्प टूटते ही देवताओं ने दानव जलंधर सिर धड से अलग करके उसे मार दिया.
भगवान् विष्णु के छल का पता जब वृंदा को ज्ञात हुआ तो पहले तो वो जलंधर का कटा हुआ सिर लेकर खूब रोई और सती होने के पहले विष्णु जी को श्राप दे दिया.
वृंदा ने विष्णु जी को पत्थर बन जाने का श्राप दिया. विष्णु जी पत्थर बन भी गए.
लेकिन इस बात से सभी देवता-देवियाँ और लक्ष्मी जी खूब रोने लगे. सभी ने मिलकर वृंदा से खूब मिन्नते की कि वे विष्णु जी को श्राप से वंचित करदे. आखिरकार वृंदा मानी. भगवान् विष्णु फिरसे अपने अवतार में आए. विष्णु जी ने देखा कि वृंदा जिस जगह सती हुई उस जगह एक पौधा खिला हुआ है.
वृंदा से किए गए छल का प्राश्चित करते हुए विष्णु जी ने खिले हुए पौधे को तुलसी का नाम दिया और ये ऐलान किया कि…
‘’आज से इनका नाम तुलसी है और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और तुलसी जी की पूजा के बगैर मै कोई भी भोग स्वीकार नहीं करुगा…’’
तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे. कार्तिक मास में तुलसी जी के साथ शालिग्राम जी का विवाह किया जाता है. एकादशी के
दिन इसे तुलसी विवाह पर्व के रूप में मनाया जाता है.
तुलसी बड़ी पवित्र और बड़े काम की चीज है.
चरणामृत के साथ तुलसी को मिलाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है.
हिन्दू धर्म में सभी अपने दरवाजे या आंगन में तुलसी का पौधा लगाते है. शरीर के कई विकारों के लिए भी यह फायदेमंद है.
जो पवित्र है, हमारे लिए समर्पित है, उसे हम माँ कहते है. इसलिए हम उन्हें माँ तुलसी कहते है…
आने वाली है देवशयनी एकादशी, नहीं होंगे मंगल कार्य
एक जुलाई को देवशयनी एकादशी ने भगवान का शयनकाल शुरू हो रहा है। इसके साथ ही मांगलिक कार्य भी बंद हो जाएंगे। साथ ही चातुर्मास भी शुरू हो रहा है 4 और अधिकमास होने ने चातुर्मास की अवधि भी लंबी होगी। इससे मांगलिक कार्यों के लिए लंबा इंतजार करना होगा। 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी को भगवान का शयनकाल पूर्ण होने से फिर से मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे।
देवशयनी एकादशनी से भगवान का शयन काल शुरू होता है। पुराणों के अनुसार यह भगवान विष्णु का शयन काल होता है। वे चार मास के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। इस वजह से देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं।
चातुर्मास को एक यज्ञ की संज्ञा दी गई है। इन दिनों तपस्वी भ्रमण नहीं करते और वे एक ही स्थान में रहकर तप पूजन करते हैं। चातुर्मास की अवधि में मांगलिक कार्य भी वर्जित माने गए हैं। मान्यता है कि श्रीहरि के शयन में चले जाने से मांगलिक कार्यों में देवताओं का आशीष नहीं मिल पाता है
Saturday, 20 June 2020
उम्मीद को ना बुझने दे
इतने लंबे समय रहेगा सूर्य ग्रहण
भूलोक में इस कंकण ग्रहण का समय इस प्रकार होगा ।
ग्रहण प्रारम्भ :-
9 बज 16 मिंट से
कंकण प्रारम्भ :-
10 बज 18 मिंट
परम ग्रास ( मध्य ) :-
12 बज 10 मिंट
कंकण समाप्त :-
दोपहर 2 बज 02 मिंट
ग्रहण समाप्त :-
दोपहर 3 बज 4 मिंट
इस प्रकार इस ग्रहण का समय 5 घंटे 48 मिंट तक रहेगा । ग्रहण का सूतक 20 जून की रात 9 बज 16 मिंट से शुरू हो जाएगा ।
भारत में इस ग्रहण को प्रत्येक शहर में अलग अलग समय पर खण्डग्रास के रूप में देखा जा सकेगा ।
प्रारम्भ मध्य समाप्ति
कोलकाता
10.46 12.35 14.16
बेंगलुरु
10.13 11.48 13.32
बीकानेर
10.11 11.49 13.37
जोधपुर
10.08 11.47 13.36
अहमदाबाद
10.04 11.42 13.32
कटक
10.38 12.26 14.09
जयपुर
10.15 11.56 13.44
मुम्बई
10.01 11.37 13.28
दिल्ली
10.20 12.01 13.48
भुनेश्वर
10.38 12.26 14.01
हैदराबाद
10.15 11.55 13.44
इंदौर
10.10 11.52 13.42
उज्जैन
10.11 11.52 13.42
गाजियाबाद
10.20 12.02 13.49
रायपुर
10.25 12.11 13.59
बनारस
10.31 12.18 14.04
हरिद्वार
10.24 12.05 13.51
लखनऊ
10.25 12.09 13.54
इस प्रकार ग्रहण के प्रारम्भ , मध्य व समाप्ति के समय दिया गया है । मुख्य शहरों का ग्रहण का प्रारम्भ व मध्य व समाप्ति के समय दिया गया है । पण्डित जितेंद्र आचार्य पंचागकर्ता व ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि ग्रहण के समय अपने ईष्ट देवता या गुरु द्वारा दिया गया मंत्र या किसी भी मंत्र का जाप करे इतने लंबे समय का ग्रहण बार बार नहीं आता है । जप करने से सभी संकट समाप्त होंगे ।
Monday, 15 June 2020
तुलसी के पत्तों के अदभुत फायदे
Sunday, 7 June 2020
16 संस्कार भाग - 4
समावर्तन ‘गुरुकुल’ में वेदों की औपचारिक शिक्षा की समाप्ति से जुड़ा हुआ समारोह है. समावर्तन संस्कार विद्याध्ययन के उपरांत ब्रह्मचारी अथवा ब्रह्मचारिणी के गुरु के आश्रम से अपने माता – पिता के घर लौटने का संस्कार है । एक प्रकार से यह संस्कार नव सृजन की तैयारी के प्रतीक के रूप में लिया जाना चाहिए । क्योंकि इसके पश्चात ही नवयुवक और नवयुवती अथवा ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी विवाह संस्कार के लिए मानसिक रूप से तैयार होते हैं । इस प्रकार यह संस्कार एक नए सृजन के लिए या समाज की शुद्ध संरचना के लिए किया जाता है। जब वह जीवन के नियम के बारे में अपनी शिक्षा पूरी करता है, तो उसका पहला आश्रम ब्रह्मचर्य पूरा होता है. अब वह गृहस्थ अवस्था में प्रवेश करने के योग्य है और विवाह करने के लिए योग्य पुरुष माना जाता है।
इस समावर्तन-संस्कार के संबध में कथा प्रचलित है- एक बार देवता, मनुष्य और असुर तीनों ही ब्रह्माजी के पास ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्याध्ययन करने गये। कुछ काल बीत जाने पर उन्होंने ब्रह्माजी से उपदेश (समावर्तन) ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की। सबसे पहले देवताओं ने कहा-प्रभो ! हमें उपदेश दीजिए। प्रजापति ने एक ही अक्षर कह दिया ‘ द ‘। इस पर देवताओं ने कहा- हम समझ गए। हमारे स्वर्गादि लोकों में भोगों की ही भरमार है। उनमें लिप्त होकर हम अंत में स्वर्ग आत्मिक आनन्द से गिर जाते हैं, अतएव आप हमें ‘द ‘ से दमन अर्थात इंद्रियसयंम का उपदेश कर रहे है। तब प्रजापति ब्रह्मा ने कहा- ठीक है, तुम समझ गए। फिर मनुष्यों को भी ‘द’ अक्षर दिया गया तो उन्होंने कहा-हमें ‘द’ से दान करने का उपदेश दिया है, क्योंकि हम लोग जीवन भर संग्रह करने की ही लिप्सा में लगे रहते हैं। अतएव हमारा दान में ही कल्याण है। प्रजापति इस जवाब से संतुष्ट हुए।
असुरों को भी ब्रह्मा ने उपदेश में ‘ द’ अक्षर ही दिया। असुरों ने सोचा-हमारा स्वभाव हिंसक है और क्रोध व हिंसा हमारे दैनिक जीवन में व्याप्त है, तो निश्च्य ही हमारे कल्याण के लिए दया ही एकमात्र मार्ग होगा। दया से ही हम इन दुष्कर्मों को छोड़कर पाप से मुक्त हो सकते हैं। इस प्रकार हमें ‘द ‘ से दया अर्थात प्राणि-मात्र पर दया करने का उपदेश दिया है। ब्रह्मा ने कहा-ठीक है, तुम समझ गए। निश्च्य ही दमन, दान और दया जैसे उपदेश को प्रत्येक मनुष्य को सीखकर अपनाना उन्नति का मार्ग होगा।
समावर्तन संस्कार अथवा दीक्षांत समारोह के इसी प्रकार के अन्य अनेकों उदाहरण हैं । जिनसे गुरु के द्वारा शिष्य को दीक्षांत समारोह के अवसर पर दिए गए उत्कृष्टतम ज्ञान का पता चलता है।
Sunday, 31 May 2020
निर्जला एकदशी
एकादशी तिथि प्रारंभ - दोपहर 02:57 बजे से (1 जून 2020)
एकादशी तिथि समाप्त - दोपहर 12:04 बजे तक (2 जून 2020)
ज्येष्ठ महीने में सूर्य का प्रभाव चरम पर होता है। इस महीने तेज गर्मी रहती है और वाष्पीकरण अधिक होता है। इस कारण नदी, तालाब सूखने लगते हैं, जमीन का जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। लोगों को पानी बर्बाद करने से बचना चाहिए। आप निर्जला एकादशी के मौके पर प्याऊ या मटके लगवाएं। अपने घर के बाहर या छत पर चिड़ियों के लिए दाना-पानी का इंतजाम करें। जल्दी उठकर सूर्य की पूजा करें। ज्येष्ठ महीने में अपने खाने पीने का विशेष ख्याल रखें।
Wednesday, 27 May 2020
खेतवाडीचा राजा मुंबई
Monday, 25 May 2020
जाने वाले महीने में कितने ग्रहण है
Thursday, 21 May 2020
16 संस्कार भाग -3
एक ऐसी चीज जिसके बिना है हर पूजा अधूरी
पूजा पाठ में इसका अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है। तिलक लगाना हो या पूजा-पाठ करना हो उसमें भी इसका का प्रयोग किया जाता है।
अक्षत का अर्थ होता है कि जो टूटा ना हो। चावल का जिस पूजा में प्रयोग होता है यदि पूजा में कुछ अन्य चीजें चूक वश छूट भी जाएं तो चावल के चढ़ावे से वह भूल माफ मानी जाती है। कई बार ऐसा होता है कि कुछ चीजें कुछ देवाता या देवी को पूजा में चढ़ाने की मनाही होती है, जैसे तुलसी को कुमकुम, गणेशजी को तुलसी, शिवजी को हल्दी नहीं चढ़ाई जाती, लेकिन अक्षत ऐसी महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है जिसे हर पूजा में हर देवी-देवता को चढ़ाया जाता है। अक्षत यानी चावल के कुछ दाने का प्रयोग आपके घर में सुख-शांति और धन-समृदधि सब कुछ दे सकता है।मंत्र-
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ता: सुशोभिता:।
मया निवेदिता भक्त्या: गृहाण परमेश्वर॥
इस मंत्र का अर्थ यही होता है कि हे भगवान कुमकुम के रंग से सुशोभित यह अक्षत आपको समर्पित हैं, कृपया आप इसे स्वीकार करें। इसका यही भाव है कि अन्न में अक्षत जिसे सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जिसे देवान्न भी कहा जाता है साथ ही यह सभी देवताओं का प्रिय अन्न होता है। इसलिए इसे सुगंधित द्रव्य कुमकुम के साथ आपको अर्पित कर रहे हैं। इसे ग्रहण करें, आप भक्त की भावना को स्वीकार करें।
- याद रखें कि जब भी पूजा में आप अक्षत यानी चावल के दाने प्रयोग करें वह संपूर्ण हो। यानी चावल के दाने टूटे नहीं होने चाहिए। टूटा चावल अशुभ माना जाता है। चावल के कुछ दाने रोज भगवान को चढ़ाने से आपको ऐश्वर्य की प्राप्ति हो सकती है।
- शिवलिंग पर चावल चढ़ाना बहुत ही फलदायी माना गया है। यदि आपके पास धतुरा या कनैल का फूल नहीं भी है और आप शिवलिंग पर अक्षत चढ़ा दें तो आपको असीम फल की प्राप्ति होगी। अक्षत चढ़ाने वाले को भगवान शिव धन-वैभव और सम्मान प्रदान करते हैं।
- यदि आपके घर में आर्थिक समस्या बनी रहती है तो आपको अपने घर कें मंदिर में मां अन्नपूर्णा की स्थापना करनी चाहिए और उनकी प्रतिमा चावल के ढ़ेर पर स्थापित करना चाहिए। इससे आपके घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होगी।
- यदि आपके घर में आर्थिक समस्या बनी रहती है तो आपको अपने घर कें मंदिर में मां अन्नपूर्णा की स्थापना करनी चाहिए और उनकी प्रतिमा चावल के ढ़ेर पर स्थापित करना चाहिए। इससे आपके घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होगी।
- देवताओं का प्रिय अन्न है चावल और यही कारण है कि इसे देवतान्न भी कहा गया है। इसे सुगंधित द्रव्य कुंकुम के साथ भगवान अर्पित करना चाहिए। ये आपकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का जबरदस्त उपाय है।
- अपने ईष्ट देव के नाम से भी अक्षत का चढ़ावा जरूर चढ़ाया करें। ये आपके घर में सौभाग्य लाएगा।
- विवाह की कई रस्मों में अक्षत का प्रयोग किया जाता है। माना जाता है कि अक्षत से दुष्टात्माएं भागती हैं। इसलिए वर-वधू इसे अग्नि में समर्पित करते हैं। परिवार के लोग जोड़े के ऊपर अक्षत छिड़कते हैं। मान्यता है कि इस तरह दोनों को जीवन में समृद्धि प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया जाता है।
Wednesday, 20 May 2020
Sunday, 17 May 2020
मुंबईचा राजा (गणेश गली गणपति)
देशभर में ऐसे कई मंडल हैं जो गणेशोत्सव की महिमा बढाते हैं और व्यापक स्तर पर इसको मनाते हैं। वैसे तो देशभर में कई पंडाल है लेकिन गणेश गली मुंबई चा राजा पंडाल का अपना विशेष महत्व हैं।
यह पंडाल लालबागचा राजा पंडाल से केवल कुछ ही दूरी पर है इस पंडाल की शुरुआत 1928 में की गई थी। यह मुंबई के सबसे मशहूर गणेश पंडालों में से एक है। हर साल इसे एक थीम पर आधार करके बनाया जाता है। यहां पर भारत के प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिकृति बनाई जाती है। यहां आने के लिए आप चिंचपोकली, करी रोड या लोअर परेल स्टेशन उतर सकते हैं यहां से पंडाल की पैदल दूरी है।
Saturday, 16 May 2020
लालबागचा राजा
Sunday, 10 May 2020
16 संस्कार भाग-2
नि वर्त्तयाम्यायुषेड्न्नाद्याय प्रजननाय।
रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय।।
अर्थात् हे बालक! मैं तेरी दीर्घायु के लिए, तुझे अन्न-ग्रहण करने में समर्थ बनाने के लिए, उत्पादन शाक्ति प्राप्ति के लिए, ऐश्वर्य वृद्धि के लिए, सुंदर संतान के लिए एवं बल तथा पराक्रम प्राप्ति के योग्य होने के लिए तेरा चूडाकर्म संस्कार (मूडंन) करता हूं।