Thursday, 1 October 2020

क्यों लेते है चरणामृत

क्या है चरणामृत का महत्व!!!!!!!

अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है, शास्त्रों में कहा गया है।

*अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।*
*विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।*

*"अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधि के समान है।*

*जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है।

चरणामृत से सम्बन्धित एक पौराणिक गाथा काफी प्रसिद्ध है जो हमें श्रीकृष्ण एवं राधाजी के अटूट प्रेम की याद दिलाती है। कहते हैं कि एक बार नंदलाल काफी बीमार पड़ गए। कोई दवा या जड़ी-बूटी उन पर बेअसर साबित हो रही थी। तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक ऐसा उपाय करने को कहा जिसे सुन गोपियां दुविधा में पड़ गईं।

श्रीकृष्ण हुए बीमार
दरअसल श्रीकृष्ण ने गोपियों से उन्हें चरणामृत पिलाने को कहा। उनका मानना था कि उनके परम भक्त या फिर जो उनसे अति प्रेम करता है तथा उनकी चिंता करता है यदि उसके पांव को धोने के लिए इस्तेमाल हुए जल को वे ग्रहण कर लें तो वे निश्चित ही ठीक हो जाएंगे। दूसरी ओर गोपियां और भी चिंता में पड़ गईं। श्रीकृष्ण उन सभी गोपियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे, वे सभी उनकी परम भक्त थीं, लेकिन उन्हें इस उपाय के निष्फल होने की चिंता सता रही थी।

उनके मन में बार-बार यह आ रहा था कि यदि उनमें से किसी एक गोपी ने अपने पांव के इस्तेमाल से चरणामृत बना लिया और कृष्णजी को पीने के लिए दिया तो वह परम भक्त का कार्य तो कर देगी। परन्तु किन्हीं कारणों से कान्हा ठीक ना हुए तो उसे नर्क भोगना पड़ेगा।

अब सभी गोपियां व्याकुल होकर श्रीकृष्ण की ओर ताक रहीं थी और किसी अन्य उपाय के बारे में सोच ही रहीं थी कि वहां कृष्ण की प्रिय राधा आ गईं। अपने कृष्ण को इस हालत में देख के राधा के तो जैसे प्राण ही निकल गए हों।जब गोपियों ने कृष्ण द्वारा बताया गया उपाय राधा को बताया तो राधा ने एक क्षण भी व्यर्थ करना उचित ना समझा और जल्द ही स्वयं के पांव धोकर चरणामृत तैयार कर श्रीकृष्ण को पिलाने के लिए आगे बढ़ी।

 राधा जानतीं थी कि वे क्या कर रही हैं। जो बात अन्य गोपियों के लिए भय का कारण थी ठीक वही भय राधा को भी मन में था लेकिन कृष्ण को वापस स्वस्थ करने के लिए वह नर्क में चले जाने को भी तैयार थीं।आखिरकार कान्हा ने चरणामृत ग्रहण किया और देखते ही देखते वे ठीक हो गए, क्योंकि वह राधा ही थीं जिनके प्यार एवं सच्ची निष्ठा से कृष्णजी तुरंत स्वस्थ हो गए।  अपने कृष्ण को निरोग देखने के लिए राधाजी ने एक बार भी स्वयं के भविष्य की चिंता ना की और वही किया जो उनका धर्म था।

इतिहास गवाह है इस बात का... 
राधा-कृष्ण का कभी विवाह ना हुआ, लेकिन उनका प्यार इतना पवित्र एवं सच्चा था कि आज भी दोनों का नाम एक साथ लेने में भक्त एक क्षण भी संदेह महसूस नहीं करते। उनके भक्तों के लिए कृष्ण केवल राधा के हैं तथा राधा भी कृष्ण की ही हैं।

राधा-कृष्ण की इस कहानी ने चरणामृत को एक ऐतिहासिक पहलू तो दिया ही, लेकिन आज भी चरणामृत को प्रभु का प्रसाद मानकर भक्तों में बांटा जाता है। पीतल के बर्तन में पीतल के ही चम्मच से, थोड़ा मीठा-सा यह अमृत भक्तों के कंठ को पवित्र बनाता है।*

*जब भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया,वह चरणामृत गंगा जी बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये शक्ति उनके पास कहाँ से पात्र शक्ति है भगवान के चरणों की जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी।

*जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते है - "चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी"*

*धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।

कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया, बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।

चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं, चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।

आयुर्वेदिक मतानुसार, तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।

इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए । ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि,स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधि के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।

इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये, लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं?*

*दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं, बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है। इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।

‼️   !! श्री हरि : !!
!! श्री हरि शरणम् !!* ‼️

Sunday, 20 September 2020

अधिक मास में करे ये काम चमक जायेगी आपकी क़िस्मत

अधिक मास का पवित्र महीना 18 सितंबर, शुक्रवार शुरू हो गया है। शास्त्रों में इस महीने की महिमा के बारे में बताया गया है। माना जाता है कि इस महीने में पूजा-पाठ करने से दस गुणा अधिक फलों की प्राप्ति होती है। अधिक मास को भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है। इसलिए ही इस महीने का नाम पुरुषोत्तम मास अथवा मल मास भी कहा जाता है।
इन दिनों में भागवत पुराण का भी विशेष पाठ किया जाता है। आपको बता दें कि पितृपक्ष और मलमास में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। यही वजह है कि इस बार इस बार शुभ मुहूर्त समेत लग्न 123 दिन के बजाय 148 दिन बाद 25 नवंबर से आरंभ होगा। इस दिन  25 तारीख को देवउठनी एकादशी पर श्री हरि निंद्रा से जगेंगे। उसी के साथ मांगलिक कार्य शुरू होंगे।
  1. ऐसी मान्यता है कि पीला रंग भगवान विष्णु को अत्यधिक प्रिय है. इसलिए मलमास के इस पूरे महीने के दौरान भगवान विष्णु को पीले रंग की ही वस्तुएं ही चढ़ानी चाहिए. जैसे कि पीले पुष्प, पीले फल, पीले वस्त्र आदि. जिसे बाद में दान कर देना चाहिए.

  2. भगवान विष्णु को तुलसी अधिक प्रिय होने के कारण पूरे मलमास में गाय के घी के दीपक तुलसी के पेड़ के सामने करना चाहिए. दीपक जलाने के बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र का जप करते हुए तुलसी के पेड़ की 11 बार परिक्रमा करनी चाहिए.

  3. पूरे मलमास के समय ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करने के पश्चात केसर युक्त दूध से भगवान विष्णु का अभिषेक करना चाहिए इसके बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र का 11 बार जाप करना चाहिए.

  4. पूरे मलमास के दौरान पीपल के पेड़ में  जल चढ़ाना चाहिए और गाय के घी का दीपक करना चाहिए क्योंकि पीपल के वृक्ष में श्री हरि विष्णु का वास माना जाता है.

  5. पूरे मलमास की दौरान में रोज सूर्य भगवान को जल चढ़ना चाहिए. जल चढ़ाते समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः' का जाप करते  हुए भगवान विष्णु का ध्यान करते रहना चाहिए.

  6. ऐसा कहा गया है कि मलमास की अवधि के अन्तर्गत दक्षिणवर्ती शंख की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से श्री हरि विष्णु के साथ ही माताश्री लक्ष्मी का भी आशीर्वाद मिलता है.

  7. मलमास की नवमी तिथि को कन्याओं को भोजन करवाने से भी सर्व मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

इसलिए आता है मलमास

चन्द्रमा 29.5 दिनों में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरा करता है। चन्द्रमा पृथ्वी  की 12 परिक्रमा 354 दिन में पूरी होती है। इसलिये चन्द्र वर्ष कुल 354 दिन का होता है, जो सौर वर्ष से कुल 11 दिन कम होता है। इस प्रकार तीन वर्षों में कुल 33 दिन का अंतर आ जाता है। इसी कमी को तीन वर्षों में कुल 13 महीने मानकर एक महीने का मलमास पड़ता है। 

Tuesday, 11 August 2020

जाने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मानाने का शुभ मुहूर्त


पंचांग के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था.

इस बार पंचांग के अनुसार अष्टमी की तिथि 11 अगस्त यानि आज सुबह 9 बजकर 6 मिनट से आरंभ हो रही है. अष्टमीकी तिथि 12 अगस्त को सुबह 11 बजकर 16 मिनट पर समाप्त हो रही है. 11 अगस्त को भरणी और 12 अगस्त को कृतिका नक्षत्र है. इसके बाद रोहिणी नक्षत्र आता है जो 13 अगस्त को रहेगा. इसीलिए कुछ स्थानों पर इस दिन भी जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है.


इस वर्ष कृष्ण जन्मोत्सव पर बन रहा है एक विशेष योग

इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी पर एक विशेष योग बन रहा है. पंडितों के मतानुसार, उसी दिन कृतिका नक्षत्र लगेगा. यही नहीं, चंद्रमा मेष राशि और सूर्य कर्क राशि में रहेंगे. कृतिका नक्षत्र और राशियों की इस स्थिति से वृद्धि योग बना रहा है. इस तरह बुधवार की रात के बताए गए मुहूर्त में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से दोगुना फल मिलेगा। 12 अगस्त को वृष राशि चंद्रमा कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में होंगे. रोहिणी नक्षत्र के नजदीक चंद्रमा होंगे, इसलिए 12 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना शुभ रहेगा।

क्या है शुभ मुहूर्त?

जन्माष्टमी के दिन रात को पूजा करने का समय सही होता है. क्योंकि, द्वापर युग में श्रीकृष्ण का अवतार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में हुआ था. उस समय चंद्र उच्च राशि वृषभ में था. उस दिन बुधवार और रोहिणी नक्षत्र था. भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को ही हुआ था. 12 अगस्त को पूजा का शुभ समय रात 12 बजकर 5 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक है. पूजा की अवधि 43 मिनट है.

पूजा की विधि

पूजा से पहले स्नान जरूर करें. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा का विधान है. पूजा करने से पहले भगवान को पंचामृत और गंगाजल से स्नान जरूर से करवाएं. स्नान के बाद भगवान को वस्त्र पहनाएं. ध्यान रहें कि कन्हाजी के वस्त्र नए हो. इसके बाद उनका श्रृंगार करें. भगवान को फिर माखन का भोग लगाएं और कृष्ण आरती गाएं.


Tuesday, 4 August 2020

जाने कैसे नारद के सिद्द किया कि 'नाम ' बड़ा या 'नामी ', "जय श्री राम"

लंका-विजय के बाद एक बार अयोध्या में भगवान श्रीराम देवर्षि नारद, विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषि-मुनियों के साथ इक्कट्ठे हुए । उस समय नारदजी ने ऋषियों से कहा कि वे बताएं—‘नाम’ (भगवान का नाम) और ‘नामी’ (स्वयं भगवान) में श्रेष्ठ कौन है ?’ इस पर सभी ऋषियों में वाद-विवाद होने लगा किन्तु कोई भी इस प्रश्न का सही निर्णय नहीं ले पाया । तब नारदजी ने कहा—‘निश्चत ही ‘भगवान का ‘नाम’ श्रेष्ठ है और इसको सिद्ध भी किया जा सकता है ।’ इस बात को सिद्ध करने के लिए नारदजी ने एक युक्ति सुझाई । उन्होंने हनुमानजी से कहा कि तुम राज दरबार में जाकर सभी ऋषि-मुनियों को प्रणाम करना किन्तु गुरु विश्वामित्रजी को प्रणाम मत करना क्योंकि वे राजर्षि (राजा से ऋषि बने) हैं, अत: वे अन्य ऋषियों के समान सम्मान के योग्य नहीं हैं ।’

हनुमानजी ने दरबार में जाकर नारदजी के कहे अनुसार ही किया । विश्वामित्रजी हनुमानजी के इस व्यवहार से क्रोधित हो गए । तब नारदजी विश्वामित्रजी के पास जाकर बोले—‘हनुमान बहुत उद्दण्ड और घमण्डी हो गया है, उसने आपको छोड़कर उसने सभी ऋषियों को प्रणाम किया ?’ यह सुन गुरु विश्वामित्र आगबबूला हो उठे और श्रीराम के पास जाकर बोले—‘आपके सेवक हनुमान ने सभी ऋषियों के सामने मेरा घोर अपमान किया है, अत: कल सूर्यास्त से पूर्व उसे आपके हाथों मृत्युदण्ड मिलना चाहिए ।’ विश्वामित्रजी श्रीराम के गुरु थे अत: श्रीराम को उनकी आज्ञा का पालन करना आवश्यक था ।‘ प्रभु श्रीराम हनुमान को कल मृत्युदण्ड देंगे’—यह बात सारे नगर में आग की तरह फैल गई थी। हनुमानजी नारदजी के पास गए और बोले—‘देवर्षि ! मेरी रक्षा करें, प्रभु कल मृत्यु दंड देंगे। मैंने तो आपके कहने पे ही यह सब कुछ  किया है ।’ नारदजी ने हनुमानजी से कहा—‘तुम हताश मत हो, मैं जैसा कहूं, वैसा ही करो । ब्राह्ममुहुर्त में उठकर सरयू नदी में स्नान करके और फिर नदी-तट पर ही खड़े होकर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’—इस मन्त्र का जाप करना । तुम्हें कुछ नहीं होगा ।’ दूसरे दिन प्रात:काल हनुमानजी की कठिन परीक्षा देखने के लिए अयोध्यावासियों की भीड़ इकट्ठी हो गई । हनुमानजी सूर्योदय से पहले ही सरयू में स्नान कर बालुका तट पर हाथ जोड़कर जोर-जोर से ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जाप करने लगे । भगवान श्रीराम हनुमानजी से थोड़ी दूर पर खड़े होकर अपने प्रिय सेवक पर अनिच्छापूर्वक बाणों का बौछार करने लगे । पूरे दिन श्रीराम बाणों की वर्षा करते रहे, पर हनुमानजी का बाल-बांका भी नहीं हुआ । अंत में श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र निकाला । हनुमानजी पूर्ण आत्मसमर्पण किए हुए जोर-जोर से मुस्कराते हुए ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जाप करते रहे । सभी लोग आश्चर्य में डूब गए ।
तब नारदजी विश्वामित्रजी के पास जाकर बोले—‘मुने ! आप अपने क्रोध को शान्त कीजिए । श्रीराम थक चुके हैं, उन्हें हनुमान के वध की गुरु-आज्ञा से मुक्ती दीजिए । आपने श्रीराम के ‘नाम’ की महत्ता को तो प्रत्यक्ष देख ही लिया है । अनन्य बाण हनुमान का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके है । अब आप श्रीराम को हनुमान को ब्रह्मास्त्र के उपयोग से न मारने की आज्ञा दें ।’ विश्वामित्रजी ने वैसा ही किया । हनुमानजी आकर श्रीराम के चरणों पर गिर पड़े । विश्वामित्रजी ने हनुमानजी को आशीर्वाद देकर उनकी श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति की प्रशंसा करने लगे ।

Sunday, 19 July 2020

20 जुलाई 2020 ज्योतिष के अनुसार 20 साल बाद बन रहा है "सोमवती अमावस्या" का संयोग, जाने व्रत कथा और उपाय

सावन महीना का हर सोमवार बहुत खास होता है लेकिन इस बार सावन का तीसरा सोमवार ज्यादा फलदायी है. ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, 20 साल बाद सोमवती अमावस्या का संयोग बन रहा है. इसे हरियाली अमावस्या भी कहते हैं.
ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, इस बार सोमवती अमावस्या के दिन चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र और शनि ग्रह अपनी राशि में रहेंगे. इस दिन भगवान शिव की पूजा करना सबसे अधिक फलदायी रहता है. बताया जाता है कि इस दिन महिलाओं को तुलसी की 108 बार परिक्रमा करना चाहिए.

सोमवती अमावस्या तिथि मुहूर्त

अमावस्या तिथि प्रारंभ-  20 जुलाई 12.10 AM से

अमावस्या तिथि प्रारंभ समाप्त- 20 जुलाई 11.02 PM तक

सोमवती अमावस्या से दूर होते हैं अशुभ योग

किसी भी माह में सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन खासकर पूर्वजों को तर्पण किया जाता है। इस दिन उपवास करते हुए पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर शनि मंत्र का जाप करना चाहिए और पीपल के पेड़ के चारों ओर 108 बार परिक्रमा करते हुए भगवान विष्णु तथा पीपल वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। खासकर यह व्रत महिलाओं द्वारा संतान के दीर्घायु रहने की लिए की जाती है। 
 सोमवती अमावस्या के उपाय
– सोमवती अमावस्या के दिन तुलसी की 108 परिक्रमा करने से दरिद्रता मिटती है।
– इसके बाद क्षमता के अनुसार दान किया जाता है।
– सोमवती अमावस्या के दिन स्नान और दान का विशेष महत्त्व है।
– इस दिन मौन भी रखते हैं, इस कारण इसे मौनी अमावस्या भी कहा जाता है।
– माना जाता है कि सोमवती अमावस्या के दिन मौन रहने के साथ ही स्नान और दान करने से  हजार गायों के दान करने के समान फल मिलता है।
 
सोमवती अमावस्या व्रत कथा
सोमवती अमावस्या की पौराणिक कथा के मुताबिक एक व्यक्ति के सात बेटे और एक बेटी थी। उसने अपने सभी बेटों की शादी कर दी लेकिन, बेटी की शादी नहीं हुई। एक भिक्षुक रोज उनके घर भिक्षा मांगने आते थे। वह उस व्यक्ति की बहूओ को सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद तो देता था लेकिन उसने उसकी बेटी को शादी का आशीर्वाद कभी नहीं देता। बेटी ने अपनी मां से यह बात कही तो मां ने इस बारे में भिक्षु से पूछा, लेकिन वह बिना कुछ कहे वहां से चला गया। इसके बाद लड़की की मां ने एक पंडित से अपनी बेटी की कुंडली दिखाई। पंडित ने कहा कि लड़की के भाग्य में विधवा बनना लिखा है। मां ने परेशान होकर उपाय पूछा तो उसने कहा कि लड़की सिंघल द्वीप जाकर वहां रहने वाली एक धोबिन से सिंदूर लेकर माथे पर लगाकर सोमवती अमावस्या का उपवास करे तो यह अशुभ योग दूर हो सकता है। इसके बाद मां के कहने पर छोटा बेटा अपनी बहन के साथ सिंघल द्वीप के लिए रवाना हो गया। रास्ते में समुद्र देख दोनों चिंतित होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उस पेड़ पर एक गिद्ध का घोंसला था। मादा गिद्ध जब भी बच्चे को जन्म देती थी, एक सांप उसे खा जाता था। उस दिन नर और मादा गिद्ध बाहर थे और बच्चे घोसले में अकेले थे। इस बीच सांप अाया तो गिद्ध के बच्चे चिल्लाने लगे। यह देख पेड़ के नीचे बैठी साहूकार की बेटी ने सांप को मार डाला। जब गिद्ध और उसकी पत्नी लौटे, तो अपने बच्चों को जीवित देखकर बहुत खुश हुए और लड़की को धोबिन के घर जाने में मदद की। लड़की ने कई महीनों तक चुपचाप धोबिन महिला की सेवा की। लड़की की सेवा से खुश होकर धोबिन ने लड़की के माथे पर सिंदूर लगाया। इसके बाद रास्ते में उसने एक पीपल के पेड़ के चारों ओर घूमकर परिक्रमा की और पानी पिया। उसने पीपल के पेड़ की पूजा की और सोमवती अमावस्या का उपवास रखा। इस प्रकार उसके अशुभ योग का निवारण हो गया। 


Saturday, 18 July 2020

अगर घर में है तुलसी का पोधा तो रखे इन विशेष बातों का धयान

हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। तुलसी का पौधा 5 प्रकार का होता है:

1. श्याम तुलसी
2. राम तुलसी
3. विष्णु तुलसी
4. वन तुलसी और
5. नींबू तुलसी।

तुलसी का पत्ता तोड़ने के नियम भी हैं। ऐसा नहीं है कि आप तुलसी जी के पौधे के पास गए और तोड़ दिया पत्ता। तुलसी जी का पौधा पूजन के लिए होता है। अगर देखा जाए तो तुलसी का एक रूप लक्ष्मी का भी है या यूं मानें कि तुलसी जी कोई पौधा नहीं है अपितु तुलसी जी राधा जी का अवतार हैं इसलिए तुलसी जी का पत्ता तोडऩे और घर में तुलसी जी को रखने के नियम हैं।

रविवार, शुक्रवार, एकादशी, अमावस्या, चौदस तिथि, ग्रहण और द्वादशी को तुलसी का पत्ता नहीं तोडऩा चाहिए।

रविवार और एकादशी को तुलसी जी को जल अर्पण नहीं करना चाहिए।

तुलसी का पत्ता कभी भी नाखून से नहीं तोडऩा चाहिए।

तुलसी के पौधे से गिरे हुए पत्तों का प्रयोग औषधि अथवा अन्य  क्रियाओं में करना चाहिए या गिरे हुए पत्तों को मिट्टी में दबा देना चाहिए।

बिना किसी विशेष कारण के तुलसी का पत्ता नहीं तोडऩा चाहिए।

तुलसी जी का पत्ता तोड़ने से पूर्व इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए: 

‘मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानंद कारिणी।

नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते

Friday, 17 July 2020

प्रभु_श्रीकृष्ण के जीवन के अनकहे लम्हे :-

प्रभु_श्रीकृष्ण के जीवन के अनकहे लम्हे  :-


१.कृष्ण के जन्म के समय और उनकी आयु के विषय में पुराणों व आधुनिक विज्ञानियों में मतभेद हैं !

 कुछ उन की आयु 125 और कुछ 110 वर्ष बताते हैं व्यक्तिगत रूप से द्वितीय मत अधिक सर्वोच्च प्रतीत होता है !

२. कृष्ण की त्वचा का रंग मेघ-श्यामल था ! और उनके शरीर से एक मादक गंध स्रावित होती थी ! अतः उन्हें अपने गुप्त अभियानों में इन को छुपाने का प्रयत्न करते थे !

 जैसे  :-  जरासन्ध अभियान के समय ! वैसे यही खूबियाँ
द्रौपदी में भी थीं ! इसीलिये
अज्ञातवास में उन्होंने सैरंध्री का कार्य चुना ताकि चंदन , उबटन , इत्रादि में उनकी गंध छुपी रहे !

३. कृष्ण की माँसपेशियाँ मृदु परंतु युद्ध के समय विस्तृत हो जातीं थीं ! 

इसीलिये सामन्यतः लडकियों के समान दिखने वाला उनका लावण्यमय शरीर युद्ध के
समय अत्यंत कठोर दिखाई देने लगता था !

इस दृष्टि से कर्ण , द्रौपदी और कृष्ण के शरीर म्यूटेंट प्रतीत होते हैं  !

४. कृष्ण के परम धाम गमन के समय ना तो उनका एक भी केश श्वेत था और ना ही उन के शरीर पर कोई झुर्री थी !

५. कृष्ण की परदादी मारिषा और सौतेली माँ रोहिणी बलराम की माँ नाग जनजाति की थीं !

६. कृष्ण से बदली गयी यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था ! जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जाती हैं 
 

७. कृष्ण के पालक पिता नंद अाभीर जाति से संबंधित थे ! जिन्हें आज अहीर कहा जाता है ! 

जब कि उनके वास्तविक पिता वसुदेव आर्यों के प्रसिद्ध पंच जन में से एक यदु से संबंधित गण-क्षत्रिय थे जिन्हें उस समय यादव कहा जाता था !

८.  राधा का जिक्र महा-भारत, हरिवंश-पुराण,  विष्णु-पुराण और भागवत-पुराण में नहीं है !

 उनका उल्लेख बृम्हवैवर्त-पुराण, गीत-गोविंद और जन-श्रुतियों में रहा है !

 ९. जैन परम्परा के अनुसार कृष्ण के चचेरे भाई तीर्थंकर नेमिनाथ थे ! जो हिंदू परम्परा में  घोर अंगिरस के नाम से प्रसिद्ध हैं !

१०. कृष्ण अंतिम वर्षों को छोडकर कभी भी द्वारिका में ६ महीने से ज्यादा नहीं रहे !

 ११. अपनी औपचारिक शिक्षा मात्र कुछ महीनों में पूरी कर ली थी !

कृष्ण ने ६४ दिनों में ६४ विद्याओं को सिखलीया था !

१२. एेसा माना जाता है कि घोर अंगिरस अर्थात् नेमिनाथ के यहाँ रहकर भी उन्होंने साधना की थी !

१३. अनुश्रुतियों के अनुसार कृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था ! और डाँडिया रास उसी का नृत्य रूप है !

 १४. कलारी-पट्टु का प्रथम आचार्य कृष्ण को माना जाता है ! इसी कारण नारायणी सेना  हिन्दुस्थान की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गयी थी !

१५. कृष्ण के रथ का नाम  जैत्र था ! और उनके सारथी का नाम दारुक/ बाहुक था !

उनके अश्वों के नाम थे :-

१. शैव्य 
२. सुग्रीव 
३. मेघपुष्प 
४. बलाहक 

१६. कृष्ण के धनुष का नाम शार्ंग और मुख्य आयुध चक्र का नाम सुदर्शन था !

१७.  सुदर्शन लौकिक, दिव्यास्त्र और देवास्त्र तीनों रूपों में कार्य कर सकता था ! उसकी बराबरी के विध्वंसक केवल २ अस्त्र और थे !

 पाशुपतास्त्र  शिव , कृष्ण और अर्जुन के पास थे ! 

 प्रस्वपास्त्र  शिव , वसुगण  भीष्म और कृष्ण के पास
थे !

१८. कृष्ण के खड्ग का नाम नंदक, गदा का नाम कौमौदकी और शंख का नाम पांचजन्य था जो गुलाबी रंग का था !

 १९.  प्रायः  यह मिथक स्थापित है, कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे ! परंतु वास्तव में कृष्ण इस विधा में भी सर्वश्रेष्ठ थे !  और एेसा सिद्ध हुआ मद्र राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयं-वर में जिसकी प्रतियोगिता द्रौपदी स्वयं-वर के ही समान परन्तु और कठिन थी !

 जब कर्ण और अर्जुन दोंनों असफल हो गये ! और तब कृष्ण ने लक्ष्य भेद कर लक्ष्मणा की इच्छा पूरी की जो पहले से ही उन्हें अपना पति मान चुकीं थीं !

२०. युद्ध  :-  कृष्ण ने कई अभियान और युद्धों का संचालन किया था ! परंतु ३ सर्वाधिक भयंकर थे -१- महाभारत,  २- जरासंध और कालयवन के विरुद्ध ३-नरकासुर के विरुद्ध  !

२१. १६ वर्ष की आयु में विश्व प्रसिद्ध चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया !

 मार्शल आर्ट - २- मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया ! 

२२. कृष्ण ने आसाम में बाणासुर से युद्ध के समय भगवान शिव से युद्ध के समय माहेश्वर ज्वर के विरुद्ध वैष्णव ज्वर का प्रयोग कर विश्व का प्रथम जीवाणु युद्ध किया था !

२३. कृष्ण के जीवन का सबसे भयानक द्वंद युद्ध सुभद्रा की प्रतिज्ञा के कारण अर्जुन के साथ हुआ था !

 जिसमें दोनों ने अपने अपने सबसे विनाशक शस्त्र क्रमशः सुदर्शन चक्र और पाशुपतास्त्र निकाल लिये थे  !

बाद में देवताओं के हस्तक्षेप
 से दोंनों शांत हुए !

२४. कृष्ण ने २ नगरों की स्थापना की थी  :-

द्वारिका [ पूर्व मे कुशावती ]                
पांडव पुत्रो के द्वारा इंद्रप्रस्थ [ पूर्व में खांडवप्रस्थ ] !

२५. उन्होंने कलारिपट्टू की नींव रखी जो बाद में बोधि-धर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई !

२६. श्रीमद्भगवत गीता के रूप में आध्यात्मिकता की वैज्ञानिक व्याख्या दी जो मानवता के लिये आशा का सबसे बडा संदेश थी ! है और सदैव रहेगी !

               -

Monday, 13 July 2020

अग्नि देव की महिमा

अग्नि देवता पंच तत्वों में से एक है। इन्हे यज्ञ और हवन का सबसे महान अंग मानते है। हवन के माध्यम से इन्ही के द्वारा हव्य देवताओ तक पहुँचाई जाती है। अत: इन्हे सभी देवताओ का मुख भी कहते है। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।

वेदों में भी अग्नि देव को महान देवता माना गया हैं। यह जीवन दाता है। अग्नि के बिना जीवन मृत्यु के तुल्य है।

पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी का नाम स्वाहा है। इनके तीन पुत्र नाम  पावक, पवमान तथा शुचि है।

अग्नि देव की कृपा के  हिन्दू धार्मिक पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा लेने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का  कुंडल मांगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुंच उनकी आज्ञा से महारानी का कुण्डल प्राप्त किया। रानी ने कुंडल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुंडलो को सावधानी से ले जाइयेगा नहीं तो तक्षकनाग कुंडल छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक  कुंडलो  के लेकर पाताल में चला गया। अग्नि देव की कृपा से ही उत्तंक ने दुबारा  कुंडल प्राप्त किए और उन्हें गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। अग्नि देव ने ही अपने ब्रम्हचारी भक्त उपकोशल को ब्रम्ह विद्या का उपदेश दिया था।

अग्नि देव की प्रार्थना और उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त कर सकता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है। अग्नि देव का बीजमन्त्र ‘रं’ तथा मुख्य मंत्र ‘रं वहिन्चैतन्याय नमः’ है।

Tuesday, 7 July 2020

सावन में करे इस मंत्र का जाप और करे महादेव को प्रसन्न

अगर आप भगवान शिव पर आस्था रखते हैं तो उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र को जाप करने से अच्छा और कोई विकल्प नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव को मृत्यु पर विजय प्राप्त है। अगर आप आपके घर में कोई बहुत अधिक बीमार है और असमय ही वह रोग उसके अंत का कारण बनने जा रहा हो तो आप महामृत्युंजय मंत्र के जाप से भगवान शिव को प्रसन्न कर बिमार व्यक्ति को स्वस्थ कर सकते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस मंत्र में इतनी ताकत होती है कि यह व्यक्ति को मौत के मूंह से भी खींच लाता है।  वैदिक पंडितों की मानें तो आपको सवा लाख बार इस मंत्र का जाप करना चाहिए। 
अकाल मृत्यु से रक्षा करता है ये मंत्र

किसी-किसी व्यक्ति के हाथों की रेखाओ में अकाल मृत्यु का योग होता है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र के जाप से अकाल मृत्यु के योग को टाला जा सकता है। ऐसा भी कहा गया है कि इस मंत्र के जाप से मौत के मुंह से लोग बाहर आ जाते हैं। इतना ही नहीं अगर आपकी कुंडली में कोई गंभीर बीमारी, दुर्घटना या फिर कम आयु का योग है तो इस मंत्र के जाप से यह भी टल सकता है। 

भय से मुक्ति मिलती हैं इस मंत्र से

अगर आपको किसी बात य चीज से डर लगता है तो आपकों इस मंत्र का जाप जरूर से करना चाहिए, क्योंकि यह मंत्र आपको भय से मुक्ति दिलाता हैं। बच्चों को भी यह मंत्र जरूर से याद करवाना चाहिए। इससे उनको कभी डर नहीं लगेगा। भविष्य पुराण में तो यहां तक बताया गया है इस मंत्र का जाप रोज 108 बार करना चाहिए।


स्वास्थ्य लाभ के लिए 

भले ही आपका स्वास्थ अच्छा हो मगर, आपको हर रोज सुबह 2 बजे से 4 बजे के बीच इस मंत्र का जाप करना चाहिए। जाहिर है आजकल की लाइफस्टाइल इस बात की इजाजत नहीं देती। ऐसे में आप सुबह आराम से उठ कर स्नान करके साफ कपड़े पहन कर रुद्राक्ष की माला ले कर इस मंत्र का जाप कर सकते है। इससे आपका स्वास्थ ठीक रहेगा। आप ऐसा किसी और के लिए भी कर सकती हैं। इसके लिए आपको उसके नाम का संकल्प लेना पड़ेगा।

धन लाभ के लिए

अगर आप प्रॉपर्टी के मामले में उलझे हैं या फिर आप आर्थिक संकट की समस्या से जूझ रही हैं तो आपको महामृत्युंजय मंत्र का जाप जरूर से करना चाहिए। इससे आपके व्यापार में वृद्धि होगी। इतना ही नहीं आपके रुके हुए काम भी बनने लगेंगे। मगर, इसके लिए आपको शिवलिंग के समक्ष बैठ कर शिवलिंग की पूजा अराधना करने के बाद ही इस मंत्र का जाप करना पड़ता है। 

Sunday, 5 July 2020

क्यों मनाते है गुरु पूर्णिमा


गुरु पूर्णिमा का महत्व

गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.

गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.

वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 'गुरु पूर्णिमा' अथवा 'व्यास पूर्णिमा' है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र  इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा 

गुरु पूर्णिमा क्यों कहते हैं

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इसी के संदर्भ में यह समय अधिक प्रभावी भी लगता है. गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप. हिंदु परंपरा   के अनुसार  गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि "गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय". इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है.

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा

गुरु है ज्ञान का मार्ग

शास्त्रों में गुरू के अर्थ के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है. गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं. गुरु की भक्ति में कई श्लोक रचे गए हैं जो गुरू की सार्थकता को व्यक्त करने में सहायक होते हैं. गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता.

भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की.

गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है.

गुरू आत्मा - परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है , "हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर". 


गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.

वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 'गुरु पूर्णिमा' अथवा 'व्यास पूर्णिमा' है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र  इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा 


हिन्दू धर्म के सिद्धांत

इतिहास:- हिन्दू धर्म भारत का सबसे प्राचीन धर्म है वैसे इसके बारे में विद्वानों के अलग अलग मत है वही इतिहासकार इसको कुछ हजार वरषों  पुराना बताते है वही भारत कि सिन्धु  घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म चिन्ह है हिन्दू धर्म में मातृदेवी कि मूर्ति ,शिव पशुपति और भी देवता कि मुर्तिया पीपल कि पूजा हिन्दू धर्म में मानते है सिन्धु घाटी के लोग स्वय को आर्य बताते है और आर्य कि सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा जाता है

सिद्धांत ;- हिन्दू धर्म एक ही सिद्धान्त से नही बना है इसमें सभी सिद्धान्त को समान श्रध्दा दी जाती है इसमें अनेक मत और संप्रदाय आते है हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थाई मानता है हिन्दू धर्म क अनुसार मनुष्य ही ऐसा है जो पाप और पुण्य दोनों को भोग सकता है  और मोक्ष प्राप्त कर सकता है  इनमे चार संप्रदाय  है । हा लेकिन इसमें ईश्वर के नाम अनेक है इस सिधान्त का मानना है कि धर्म कि रक्षा के लिय ईश्वर बार -बार  जन्म लेता है और दुसरो को कष्ट देना पाप मानते है हमारी आत्मा अमर अजर है हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र है हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन को एक चक्र के रूप में माना गया है

हिन्दू धर्म के नियम – हिन्दू धर्म में 10 नियम है यह सुना जाता है  ईश्वर ही शक्ति है कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस नियम का पालन नही करता है वह भटका हुआ होता है

1.ईश्वर प्रणिधान -ईश्वर इससे अलग किसी और में आस्था न रखे चाहे आप पर कितना ही दुःख हो अपनी आस्था को बनाये रखे

2.ईश्वर कि पूजा –ईश्वर कि पूजा हमे प्रतिदिन करनी चाहिए ये ध्यान और प्राथना दोनों से कि जा सकती है पूजा को नियमो के अनुसार ही करना चाहिए  यह तक कि दुखो में भी पूजा करना न छोड़े

3.व्रत या उपवास –सप्ताह में एक व्रत जरुर रखे श्रावण का महिना बहुत ही शुभ माना जाता है इसमें मास का सेवन नही करना चाहिए वैसे तो सभी  दिन श्रेष्ठरस   माना जाते है इस महीने लेकिन सोमवार और शनिवार अधिक माना जाता है

4.तीर्थयात्रा या तीर्थस्थान -तीर्थयात्रा को बहुत ही सुभ माना जाता है और पुण्य भी हम सभी को कभी न कभी तीर्थ स्थानों पर जाना चाहिए इससे वैराग्य और  कि प्राप्ति होती है

5.दान देना – हमे अपने जीवन दान पुण्य करना चाहिए गरीबो को खाना खिलाना चाहिए कपडे दान करने चाहिए जरुरी नही है कि आप पैसे खाना ही दान करो वेदों में अनेक दानो का जिक्र है जैसे अन्नदान ,विद्यादान,धनदान,अभयदान आदि

6.मकर सक्रांति और कुंभ पर्व मनाना –वैसे तो हम सभी त्योहारों को अच्छे से मनाते है परन्तु मकर सक्रांति को भी हमे अच्छे से मनाना चाहिए इसके बाद कुंभ का उत्सव मनाना चाहिए मकर सक्रांति के दोरान सभी देवता धरती पर घूमते रहते है जब सूर्य धनु राशी से मकर में जाता है तो मकर सक्रांति मनाते है

7.यज्ञ करना –ह्मेअपने घरो में साल में एक यज्ञ जरुर करना चाहिए वेद के अनुसार यज्ञ चार तरह के होते है ब्रह्मायज्ञ,देवयज्ञ,पितृयज्ञ,अतिथि यज्ञ,वैश्वदेव यज्ञ/ यज्ञ करने से घर में बुरी आत्मा नही आती है घर म शांति रहती है

8.सेवा करना –वेदों में लिखा है कि अपनी माता-पिता और गुरु  कि सेवा करनी चाहिए उनको दुःख नही देने चाहिए उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए  उनका अनादर न करे माता पिता कि सेवा ही सबसे बड़ा पुन्य है सेवा इसमें बच्चो महिलाओ  बूढों आदि कि सेवा करना ही पुण्य है

9.संस्कार का पालन करना –हर एक घर में माँ बाप अपने बच्चो को अच्छे से अच्छे संस्कार देते है तो बच्चो को उनके संस्कारो का पालन करना चाहिए कोई भी गलत काम नही करने चाहिए जिससे संस्कारो पर प्रभाव पड़े प्रतिएक हिन्दू को संस्कारो का पालन करना चाहिए चाहे वो छोटे हो या बड़े

10.धर्म प्रचार –हमे अपने धर्म का बारे में कबी भी गलत नही बोलना चहिये हिन्दू धर्म को पढ़कर ही उसका प्रचार और प्रसार करना चाहिए उसको इसका ज्ञान एक से दुसरो को बाटना चाहिए अपने धर्म कि बुराइयाँ न सुने और अपने धर्म को जाने

Friday, 3 July 2020

कष्ट भंजन देव को प्रसन्न करने के लिए, कष्टों का निवारण करने के लिए करे ये पाठ

कष्ठ भंजन देव श्री वीर हनुमान, अंजनी के लाल वीर हनुमान, कष्टों के हरण करने वाले हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करे।

दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमन मुकुरु सुधारि।
बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।

राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुँचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे।
कांधे मूंज जनेउ साजे।।

शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन।।

बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।

भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज संवारे।।

लाय सजीवन लखन जियाये।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना।।

जुग सहस्र जोजन पर भानु।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना।।

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरे सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।

संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।।

और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।।

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।

साधु संत के तुम रखवारे।।
असुर निकन्दन राम दुलारे।।

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।

राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुह्मरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै।।

अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बन्दि महा सुख होई।।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।

दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

Thursday, 2 July 2020

सब्जा यानी तुलसी के बीज के फायदे

तुलसी का नाम आते ही हमारे दिमाग में सबसे पहला ख्याल इससे होने वाले फायदों जाता है। आप नहीं जानते होंगे कि ये छोटे से आकार के बीज पोषक तत्वों के भंडार होते हैं। इतना ही नहीं ये कई स्वास्थ्य समस्याओं के लिए प्रभावी प्राकृतिक नुस्खा भी हैं।  सब्जा(बेसिल सीड) यानी की तुलसी के बीज कई स्वास्थ्य गुणों का भंडार है। तुलसी के पौधे का हमारी परंपराओं में एक विशेष महत्व है और इसे हर घर में लगा है। तुलसी के बीज दूसरों से बिल्कुल अलग होते हैं और इनके बेहद फायदे हैं। प्रोटीन, फैट और कार्ब से युक्त ये काले और छोटे सब्जा बीज में अच्छी क्वालिटी का ढेर सारा फाइबर भी होता है।
 
शरीर में ठंडक प्रदान करते है
पानी में भिगोकर तुलसी के बीजों का सेवन शरीर को गर्मी को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है। तुलसी के बीजों में प्राकृतिक रूप से ठंडा करने के उच्च गुण होते हैं और ये पानी में अच्छे तरह से मिल भी जाते हैं। तुलसी के बीजों का सेवन आप नारियल दूध, शरबत और मिल्कशेक में भी कर सकते हैं।

मधुमेह में आरामदायक
सबजा बीज टाइप 2 डायबिटीज के लिए बेहद प्रभावी माने जाते हैं।  ये बीज आपके मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देते हैं और कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदलने में मदद करते हैं। आपको बस करना ये है कि एक गिलास दूध में कुछ भीगे हुए बीज मिलाएं और नाश्ते में स्वादिष्ट, स्वास्थ्यवर्धक पेय के रूप में सेवन करें। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ द्वारा किए गए सर्वे से पता चलता हे कि जब टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित लोगों ने एक महीने तक अपने भोजन के बाद पानी में 10 ग्राम सब्जा बीज डालकर सेवन किया तो उनके भोजन के बाद ब्लड शुगर में 17% की गिरावट देखी गई है।
अनियमित पीरियड्स को दूर करने मे सहायता
यदिमहिलाओं को पीरियड्स में अनियमितता की शिकायत हो तो तुलसी के बीज का इस्तेमाल करना फायदेमंद रहता है. इसके अलावा तुलसी के पत्तों का नियमित सेवन करने से मासिक चक्र की अनियमितता भी दूर हो जाती है.

दस्त की समस्या से मिलता है छुटकारा
यदि आप दस्त की समस्या से बहुत परेशान हैं तो तुलसी के पत्तों का सेवन लाभदायक होता है. इसके पत्ते को जीरे के साथ मिलाकर पीस ले और उसे दिन में 3 से 4 बार चाटना चाहिए. ऐसा करने से दस्त रुक जाती है.

बढ़ाता है चेहरे की चमक 
तुलसी स्कीन संबंधी बीमारियों के लिए फायदेमंद है. इसका इस्तेमाल करने से चेहरे पर कील-मुहांसे नहीं रहते हैं और चेहरा क्लीन हो जाता है.

कैंसर का खतरा होता है कम 

कई रिसर्चों में बताया गया है कि तुलसी का बीज कैंसर के इलाज में फायदमंद होते है. हालांकि, इस बारे में अभी तक पुष्ट‍ि नहीं हुई है.

सांस की दुर्गंध को करता है दूर

तुलसी के पत्ते का इस्तेमाल करने से सांस की दुर्गंध को दूर करने में काफी हद तक राहत मिलती हैं. नेचुरल होने के कारण इसका कोई  साइडइफेक्ट नहीं  है. यदि आपके मुंह से बदबू आ रही हो तो तुलसी के कुछ पत्तों को चबा लें. इसके सेवन से दुर्गंध चली जाती है.


Tuesday, 30 June 2020

इस वर्ष सभी त्यौहार एक माह की देरी स आयेंगे

एक जुलाई 2020 को देवशयनी एकादशी है। इसके साथ ही भगवान विष्णु पांच माह के लिए योग निद्रा में चले जाएंगे और चातुर्मास की शुरुआत हो जाएगी। इस बार अधिकमास आने से चातुर्मास चार के बजाय पांच माह का है। इसी के चलते श्राद्ध पक्ष के बाद आने वाले सभी त्योहार 20-25 देरी से आएंगेे। इस बार दो आश्विन मास है। आमतौर पर श्राद्ध खत्म होते ही अगले दिन से नवरात्रि आरंभ हो जाती है लेकिन इस बार ऐसा नहीं है और श्राद्ध समाप्त होने के एक माह के पश्चात नवरात्र शुरू होंगे। 17 सितंबर को श्राद्ध खत्म होंगे और अगले दिन से अधिकमास शुरू हो जाएगा। 17 अक्टूबर से नवरात्री आरंभ होंगी। इस तरह श्राद्ध और नवरात्र के बीच इस साल एक महीने का अंतर होगा। दशहरा 26 अक्टूबर को और दीपावली 14 नवंबर को है। 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी है और इसी दिन चातुर्मास भी खत्म हो जाएंगे।
लीप ईयर व अधिक मास एक ही साल में है
इस साल अंग्रेजी कैलेंडर का लीप ईयर और आश्विन के अधिकमास का योग 160 साल बाद बना है। इससे पहले 1860 में ऐसा अधिकमास आया था, जब उसी साल लीप ईयर भी था। इसी तरह 19 साल बाद आश्विन माह का अधिकमास आया था। इससे पहले 2001 में अश्विन माह में अधिकमास आया था। इसके बाद फिर 19 साल बाद यानि 2039 में अश्विन माह में अधिकमास का संयोग बनेगा।
हर तीन साल में आता है अधिकमास
ज्योतिष के अनुसार माने तो एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है। दोनों वर्षों के बीच में लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। ये अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन वर्ष में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अतिरिक्त होने की वजह से अधिकमास के नाम से जाना जाता है। अधिकमास के पीछे पूरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। 

Thursday, 25 June 2020

क्यों कहते हैं तुलसी को मां

माँ तुलसी का नाम वृंदा था. वृंदा का जन्म राक्षस कुल में हुआ था. राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद भी वृंदा भगवान श्री विष्णु जी की परम भक्त थी और सदैव बड़े मन से उनकी पूजा अर्चना किया करती थी.


वृंदा जब विवाह लायक हुई तो उनकी शादी राक्षस कुल के दानव राज जलंधर से कर दी गई. ये कहा जाता है कि जलंधर ने समुद्र से जन्म लिया था. विवाह के बाद वृंदा बड़ी ही पतिव्रता से अपने पति की सेवा किया करती थी.

एक बार की बात है जब देवताओं और दानवो में युद्ध छीडा. युद्ध पर जाते हुए वृंदा ने अपने पति जलंधर से कहा कि ‘स्वामी आप तो युद्ध पर जा रहे लेकिन जब तक आप जीत हासिल कर वापस नहीं आजाते तब तक मै आपके लिए पूजा (अनुष्ठान) करती रहूंगी और अपना संकल्प नहीं छोडूंगी’

जलंधर तो युद्ध में चले गए और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई.

वृंदा के व्रत का प्रभाव इतना था कि देवता जलंधर से जीतने में नाकाम हो रहे थे. जब देवता हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास जा पहुचे. सभी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि किसी भी तरह वे देवताओं को युद्ध जिताने में मदद करे.

भगवान् विष्णु बड़े ही असमंजस की स्थिति  में थे. वे सोच रहे थे कि वृंदा को कैसे रोका जाए, जबकि वो उनकी परम भक्त थी.

बड़े ही सोचने समझने के बाद श्री विष्णु जी ने वृंदा के साथ छल करने का निर्णय ले ही लिया. वृत पूजा को तोड़ने के लिए उन्होंने वृंदा के पति जलंधर का रूप धारण किया. जलंधर के रूप में विष्णु वृंदा के महल में जा पहुचे. वृंदा ने जैसे ही अपने पति जलंधर को देखा तो उनके चरण छुने के उद्देश्य से पूजा से उठ पडी. जिससे वृंदा का संकल्प टूट गया.

वृंदा का वृत संकल्प टूटते ही देवताओं ने दानव जलंधर सिर धड से अलग करके उसे मार दिया.

भगवान् विष्णु के छल का पता जब वृंदा को ज्ञात हुआ तो पहले तो वो जलंधर का कटा हुआ सिर लेकर खूब रोई और सती होने के पहले विष्णु जी को श्राप दे दिया.

वृंदा ने विष्णु जी को पत्थर बन जाने का श्राप दिया. विष्णु जी पत्थर बन भी गए.

लेकिन इस बात से सभी देवता-देवियाँ और लक्ष्मी जी खूब रोने लगे. सभी ने मिलकर वृंदा से खूब मिन्नते की कि वे विष्णु जी को श्राप से वंचित करदे. आखिरकार वृंदा मानी. भगवान् विष्णु फिरसे अपने अवतार में आए. विष्णु जी ने देखा कि वृंदा जिस जगह सती हुई उस जगह एक पौधा खिला हुआ है.

वृंदा से किए गए छल का प्राश्चित करते हुए विष्णु जी ने खिले हुए पौधे को तुलसी का नाम दिया और ये ऐलान किया कि…

‘’आज से इनका नाम तुलसी है और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और तुलसी जी की पूजा के बगैर मै कोई भी भोग स्वीकार नहीं करुगा…’’

तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे. कार्तिक मास में तुलसी जी के साथ शालिग्राम जी का विवाह किया जाता है. एकादशी के
दिन इसे तुलसी विवाह पर्व के रूप में मनाया जाता है.

तुलसी बड़ी पवित्र और बड़े काम की चीज है.

चरणामृत के साथ तुलसी को मिलाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है.

हिन्दू धर्म में सभी अपने दरवाजे या आंगन में तुलसी का पौधा लगाते है. शरीर के कई विकारों के लिए भी यह फायदेमंद है.

जो पवित्र है, हमारे लिए समर्पित है, उसे हम माँ कहते है. इसलिए हम उन्हें माँ तुलसी कहते है…

आने वाली है देवशयनी एकादशी, नहीं होंगे मंगल कार्य

एक जुलाई को देवशयनी एकादशी ने भगवान का शयनकाल शुरू हो रहा है। इसके साथ ही मांगलिक कार्य भी बंद हो जाएंगे। साथ ही चातुर्मास भी शुरू हो रहा है 4 और अधिकमास होने ने चातुर्मास की अवधि भी लंबी होगी। इससे मांगलिक कार्यों के लिए लंबा इंतजार करना होगा। 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी को भगवान का शयनकाल पूर्ण होने से फिर से मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे।

देवशयनी एकादशनी से भगवान का शयन काल शुरू होता है। पुराणों के अनुसार यह भगवान विष्णु का शयन काल होता है। वे चार मास के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। इस वजह से देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं।

चातुर्मास को एक यज्ञ की संज्ञा दी गई है। इन दिनों तपस्वी भ्रमण नहीं करते और वे एक ही स्थान में रहकर तप पूजन करते हैं। चातुर्मास की अवधि में मांगलिक कार्य भी वर्जित माने गए हैं। मान्यता है कि श्रीहरि के शयन में चले जाने से मांगलिक कार्यों में देवताओं का आशीष नहीं मिल पाता है

Saturday, 20 June 2020

उम्मीद को ना बुझने दे



एक घर मे *पांच दिए* जल रहे थे।

एक दिन पहले एक दिए ने कहा -

इतना जलकर भी *मेरी रोशनी की* लोगो को *कोई कदर* नही है...

तो बेहतर यही होगा कि मैं बुझ जाऊं।

वह दिया खुद को व्यर्थ समझ कर बुझ गया । 

जानते है वह दिया कौन था ?

वह दिया था *उत्साह* का प्रतीक ।

यह देख दूसरा दिया जो *शांति* का प्रतीक था, कहने लगा -

मुझे भी बुझ जाना चाहिए।

निरंतर *शांति की रोशनी* देने के बावजूद भी *लोग हिंसा कर* रहे है।

और *शांति* का दिया बुझ गया । 

*उत्साह* और *शांति* के दिये के बुझने के बाद, जो तीसरा दिया *हिम्मत* का था, वह भी अपनी हिम्मत खो बैठा और बुझ गया।

*उत्साह*, *शांति* और अब *हिम्मत* के न रहने पर चौथे दिए ने बुझना ही उचित समझा।

*चौथा* दिया *समृद्धि* का प्रतीक था।

सभी दिए बुझने के बाद केवल *पांचवां दिया* *अकेला ही जल* रहा था।

हालांकि पांचवां दिया सबसे छोटा था मगर फिर भी वह *निरंतर जल रहा* था।

तब उस घर मे एक *लड़के* ने प्रवेश किया।

उसने देखा कि उस घर मे सिर्फ *एक ही दिया* जल रहा है।

वह खुशी से झूम उठा।

चार दिए बुझने की वजह से वह दुखी नही हुआ बल्कि खुश हुआ।

यह सोचकर कि *कम से कम* एक दिया तो जल रहा है।

उसने तुरंत *पांचवां दिया उठाया* और बाकी के चार दिए *फिर से* जला दिए ।

जानते है वह *पांचवां अनोखा दिया* कौन सा था ?

वह था *उम्मीद* का दिया...

इसलिए *अपने घर में* अपने *मन में* हमेशा उम्मीद का दिया जलाए रखिये ।

चाहे *सब दिए बुझ जाए* लेकिन *उम्मीद का दिया* नही बुझना चाहिए ।

ये एक ही दिया *काफी* है बाकी *सब दियों* को जलाने के लिए ....
🌹🌹कोरोना जायेगा ख़ुशियाँ आएँगी, सब कुछ जल्द सामान्य होगा , उम्मीद का दिया जलाए रखे 🌹🌹

इतने लंबे समय रहेगा सूर्य ग्रहण

 इस साल का पहला सूर्य ग्रहण 21 जून को होने वाला है। इसका सूतक बारह घंटे पहले यानि 20 जून की रात 9 बजे से ही लागू हो जाएगा। ग्रहण के समय सूर्य चमकते कंगन के जैसा चमकता दिखाई देगा, इसलिए इसे कंकणाकृति ग्रहण नाम दिया गया  है। भारत में इस साल का दृश्य एक मात्र ग्रहण का पूरा विवरण दिया जा रहा है । यह कंकणाकृति सूर्यग्रहण 21 जून 2020 को सम्पूर्ण भारत में खण्डग्रास के रूप में दिखाई देगा ।यह ग्रहण मृगशिरा एवं आद्रा नक्षत्र में मिथुन राशि मंडल पर घटित होगा। इस ग्रहण की कंकणा कृति केवल उत्तरी राजस्थान, उत्तरी हरियाणा , उत्तराखंड राज्य के उत्तरी भागों से गुजरेगी । कंकण वाले क्षेत्रों में इस ग्रहण का परम ग्रास 99.4 त्न व शेष भारत में 90 के आसपास व मध्य भारत में इसका परम ग्रास 70 से 90 व दक्षिण के भागों में 30 से 70 प्रतिशत तक पाया जाएगा । भारत के अतिरिक्त पूर्वी दक्षिणी यूरोप , ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी क्षेत्रों , न्यू गियाना, फिजी, अधिकतर अफ्रीका , प्रशांत व हिन्द महासागर, मध्य पूर्वी एशिया अफगानिस्तान , पाकिस्तान , मध्य व दक्षिणी चीन, बर्मा, फिलीपींस में दिखाई देगा ।
भूलोक में इस कंकण ग्रहण का समय इस प्रकार होगा ।
ग्रहण प्रारम्भ :-
9 बज 16 मिंट से
कंकण प्रारम्भ :-
10 बज 18 मिंट
परम ग्रास ( मध्य ) :-
12 बज 10 मिंट
कंकण समाप्त :-
दोपहर 2 बज 02 मिंट
ग्रहण समाप्त :-
दोपहर 3 बज 4 मिंट
इस प्रकार इस ग्रहण का समय 5 घंटे 48 मिंट तक रहेगा । ग्रहण का सूतक 20 जून की रात 9 बज 16 मिंट से शुरू हो जाएगा ।
भारत में इस ग्रहण को प्रत्येक शहर में अलग अलग समय पर खण्डग्रास के रूप में देखा जा सकेगा ।
प्रारम्भ मध्य समाप्ति
कोलकाता
10.46 12.35 14.16
बेंगलुरु
10.13 11.48 13.32
बीकानेर
10.11 11.49 13.37
जोधपुर
10.08 11.47 13.36
अहमदाबाद
10.04 11.42 13.32
कटक
10.38 12.26 14.09
जयपुर
10.15 11.56 13.44
मुम्बई
10.01 11.37 13.28
दिल्ली
10.20 12.01 13.48
भुनेश्वर
10.38 12.26 14.01
हैदराबाद
10.15 11.55 13.44
इंदौर
10.10 11.52 13.42
उज्जैन
10.11 11.52 13.42
गाजियाबाद
10.20 12.02 13.49
रायपुर
10.25 12.11 13.59
बनारस
10.31 12.18 14.04
हरिद्वार
10.24 12.05 13.51
लखनऊ
10.25 12.09 13.54
इस प्रकार ग्रहण के प्रारम्भ , मध्य व समाप्ति के समय दिया गया है । मुख्य शहरों का ग्रहण का प्रारम्भ व मध्य व समाप्ति के समय दिया गया है । पण्डित जितेंद्र आचार्य पंचागकर्ता व ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि ग्रहण के समय अपने ईष्ट देवता या गुरु द्वारा दिया गया मंत्र या किसी भी मंत्र का जाप करे इतने लंबे समय का ग्रहण बार बार नहीं आता है । जप करने से सभी संकट समाप्त होंगे ।

Monday, 15 June 2020

तुलसी के पत्तों के अदभुत फायदे

भारत के लगभग हर घर में आपको होली बेसिल यानी तुलसी का पौधा नजर आ जाएगा। अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए तुलसी का उपयोग करना चाहिए। तुलसी एक ऐसी दिव्य औषधि वाला पौधा है, जो कई तरह के मर्ज की दवा साबित होता है। हिन्दू धर्म में इसे एक खास स्थान दिया गया है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, जिस घर के आंगन में तुलसी का पौधा होता है, वहां बैक्टीरिया और जीवाणु प्रवेश नहीं कर पाते हैं। साथ ही घर का वातावरण भी शुद्ध होता है। तुलसी किस तरह से मानव जीवन को रोगों से छुटकारा दिलाने में कारगर साबित होती है। लेकिन तुलसी का सेवन खाली दूध के साथ कभी नहीं करना चाहिए। - तुलसी को दांतों से चबाना नहीं चाहिए, क्योंकि इसमें स्वाभाविक रूप से पारद तत्व की मौजूदगी होती है, जो दांतों के लिए हानिकारक होता है।

सुबह खाली पेट तुलसी का सेवन 

सुबह खाली पेट तुलसी के 5 पत्ते खाने से सर्दी-खांसी में राहत मिलती है, इम्यून सिस्टम बेहतर होता है और व्यक्ति का मानसिक तनाव भी दूर होता है।

सर्दी बुखार को दूर करे 
तुलसी की हरी पत्तियों का सेवन करने से सर्दी, खांसी, जुकाम, बुखार, बच्चों का दमा, सिर दर्द जैसी अनेक मौसमी बीमारियों से छुटकारा मिलता है। खांसी-जुकाम में तुलसी के पत्ते, अदरक और काली मिर्च से तैयार की हुई चाय पीने से तुरंत लाभ होता है। और बारिश के मौसम में रोजाना तुलसी के पांच पत्ते खाने से मौसमी बुखार व जुकाम जैसी समस्याएं दूर रहती हैं।

तुलसी के सेवन से वजन घटाएं
तुलसी के पत्तों का 250 ग्राम रस आठ हफ्तों तक रोजाना दिन में दो बार व्यायाम और सही खान पान के साथ लेने से शरीर का वजन, बीएमआई और शरीर में इन्सुलिन को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं।

गले की खराश मिटाए
गले के लिए तुलसी पानी पीने के फायदे उठाने के लिए एक गिलास पानी में सात-आठ तुलसी के पत्ते उबाल कर उस पानी का सेवन करना चाहिए । इस पानी से गरारे भी कर सकते हैं।

डायबिटीज़ मिटाए
रोज सुबह खाली पेट तुलसी का पानी पीने से डायबिटीज़ को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। तुलसी में हाइपोग्लाइसेमिक गुण होते हैं। इनके कारण शरीर में ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है।

सांस की दुर्गंध दूर करे
सांस की दु्र्गंध को दूर करने में भी तुलसी के पत्ते काफी फायदेमंद होते हैं। मुंह की दुर्गंध ज्यादातर पाचन शक्ति कमजोर हो जाने के कारण होती है। तुलसी नेचुरल होने की वजह से इसका कोई साइडइफेक्ट भी नहीं होता है। अगर आपके मुंह से बदबू आ रही हो तो तुलसी के कुछ पत्तों को चबा लें, ऐसा करने से दुर्गंध चली जाती है। सांसों की समस्या से भी तुलसी राहत दिलाती है। अगर सांस लेने में दिक्कत हो रही हो, तो तुलसी के आधा चम्मच रस में शहद मिलाकर पिएं, आराम मिलेगा।

चोट लगने पर:
अगर आपको कहीं चोट लग गई हो तो तुलसी के पत्ते को फिटकरी के साथ मिलाकर लगाने से घाव जल्दी ठीक हो जाता है। तुलसी में एंटी-बैक्टीरियल तत्व होते हैं जो घाव को पकने नहीं देता है। इसके अलावा तुलसी के पत्ते को तेल में मिलाकर लगाने से जलन भी कम होती है।

फेफड़ों में सूजन दूर करें 
फेफड़ों में सूजन आने से व्यक्ति को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जैसे बुखार, सीने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ आदि, ऐसे में व्यक्ति को डॉक्टरी दवाओं के साथ-साथ तुलसी के पत्तों का लगभग 15 ग्राम रस सुबह-शाम खाली पेट विशेषज्ञ की सलाह से लेना चाहिए।

हेयर फॉल घटाए

तुलसी की पत्तियां हेयर फॉलिकल्स को फिर से सक्रिय कर बालों को झड़ने से बचा सकती हैं। साथ ही बालों को जड़ों से मजबूत बना सकती हैं। इसके अलावा, स्कैल्प को ठंडा करती हैं और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर कर सकती हैं।

मुंह के छालों से निजात
अगर किसी व्यक्ति के मुंह में छाले हो, तो उसे तुलसी की पत्तियों का रस पीना चाहिए या फिर पत्तियां चूसनी चाहिए। इससे छालो में राहत मिलती है।




Sunday, 7 June 2020

16 संस्कार भाग - 4

अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम 13 - 16 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 4 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।


इस संस्कार में बालक जब 16 वर्ष का होता है तो पहली बार उसकी दाढ़ी-मूछ काटी जाती है। गुरु के समीप रहते हुए जब बालक विधिवत् शिक्षा ग्रहण करते हुए युवा अवस्था में प्रवेश करता है गुरु
उसका केशान्त संस्कार करता है। और वह अपने गुरु को गुरु दक्षिणा में गाय दान देता है इसीलिए इसे गोदान संस्कार भी कहा जाता है। गुरुकुल में वेदाध्ययन प्राप्त करने के बाद आचार्य के सम्मुख यह संस्कार संपन्न किया जाता था। यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम  होता है।

समावर्तन संस्कार 

समावर्तन ‘गुरुकुल’ में वेदों की औपचारिक शिक्षा की समाप्ति से जुड़ा हुआ समारोह है. समावर्तन संस्कार विद्याध्ययन के उपरांत ब्रह्मचारी अथवा ब्रह्मचारिणी के गुरु के आश्रम से अपने माता – पिता के घर लौटने का संस्कार है । एक प्रकार से यह संस्कार नव सृजन की तैयारी के प्रतीक के रूप में लिया जाना चाहिए । क्योंकि इसके पश्चात ही नवयुवक और नवयुवती अथवा ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी विवाह संस्कार के लिए मानसिक रूप से तैयार होते हैं । इस प्रकार यह संस्कार एक नए सृजन के लिए या समाज की शुद्ध संरचना के लिए किया जाता है। जब वह जीवन के नियम के बारे में अपनी शिक्षा पूरी करता है, तो उसका पहला आश्रम ब्रह्मचर्य पूरा होता है. अब वह गृहस्थ अवस्था में प्रवेश करने के योग्य है और विवाह करने के लिए योग्य पुरुष माना जाता है।

इस समावर्तन-संस्कार के संबध में कथा प्रचलित है- एक बार देवता, मनुष्य और असुर तीनों ही ब्रह्माजी के पास ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्याध्ययन करने गये। कुछ काल बीत जाने पर उन्होंने ब्रह्माजी से उपदेश (समावर्तन) ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की। सबसे पहले देवताओं ने कहा-प्रभो ! हमें उपदेश दीजिए। प्रजापति ने एक ही अक्षर कह दिया ‘ द ‘। इस पर देवताओं ने कहा- हम समझ गए। हमारे स्वर्गादि लोकों में भोगों की ही भरमार है। उनमें लिप्त होकर हम अंत में स्वर्ग आत्मिक आनन्द से गिर जाते हैं, अतएव आप हमें ‘द ‘ से दमन अर्थात इंद्रियसयंम का उपदेश कर रहे है। तब प्रजापति ब्रह्मा ने कहा- ठीक है, तुम समझ गए। फिर मनुष्यों को भी ‘द’ अक्षर दिया गया तो उन्होंने कहा-हमें ‘द’ से दान करने का उपदेश दिया है, क्योंकि हम लोग जीवन भर संग्रह करने की ही लिप्सा में लगे रहते हैं। अतएव हमारा दान में ही कल्याण है। प्रजापति इस जवाब से संतुष्ट हुए। 

असुरों को भी ब्रह्मा ने उपदेश में ‘ द’ अक्षर ही दिया। असुरों ने सोचा-हमारा स्वभाव हिंसक है और क्रोध व हिंसा हमारे दैनिक जीवन में व्याप्त है, तो निश्च्य ही हमारे कल्याण के लिए दया ही एकमात्र मार्ग होगा। दया से ही हम इन दुष्कर्मों को छोड़कर पाप से मुक्त हो सकते हैं। इस प्रकार हमें ‘द ‘ से दया अर्थात प्राणि-मात्र पर दया करने का उपदेश दिया है। ब्रह्मा ने कहा-ठीक है, तुम समझ गए। निश्च्य ही दमन, दान और दया जैसे उपदेश को प्रत्येक मनुष्य को सीखकर अपनाना उन्नति का मार्ग होगा।
समावर्तन संस्कार अथवा दीक्षांत समारोह के इसी प्रकार के अन्य अनेकों उदाहरण हैं । जिनसे गुरु के द्वारा शिष्य को दीक्षांत समारोह के अवसर पर दिए गए उत्कृष्टतम ज्ञान का पता चलता है।



मनुस्मृतिकार ने तृतीय अध्याय में लिखा है कि तीन वेदों का, दो वेदों का अथवा एक वेद का अध्ययन
पूर्ण करके अविलुप्त ब्रह्मचर्य स्नातक का विवाह संस्कार किया जाना चाहिए। यह संस्कार मनुष्य की मृत्यु से पूर्व का अंतिम संस्कार है। विवाह का अर्थ है ‘विशेषेण वाह्यते इति विवाह:’ अर्थात विशिष्ट प्रकार से वहन करना विवाह है। सृष्टि के तीन शाश्वत सत्यों उत्पति, स्थिति और प्रलय में से स्थिति अवयव के लिए विवाह को सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। वहीं पितृऋण से मुक्ति के लिए यह संस्कार आवश्यक है। इस संस्कार में स्त्री और पुरुष संयुक्त रूप से धर्म की पालना का संकल्प लेते हैं और एक दूसरे के हाथ को विशिष प्रकार से वहन करते हैं। इसीलिए इस संस्कार को पाणिग्रहण संस्कार भी कहा जाता है।


मृत्यु के पश्चात किया जाने वाला संस्कार।

Sunday, 31 May 2020

निर्जला एकदशी

हिंदू पंचांग के अनुसार अभी तीसरा महीना ज्येष्ठ का चल रहा है। इस महीने में गर्मी काफी तेज होती है इस कारण ये समय लोगों को पानी का मूल्य बताता है। इस पूरे माह पानी की बचत और जल का दान करना अच्छा माना जाता है। ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस दिन को भीमसेन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन व्रती पानी की एक बूंद ग्रहण किये बिना निर्जला एकादशी का व्रत पूरा कर विष्णु जी की उपासना करता है। इस साल निर्जला एकादशी का व्रत 2 जून को रखा जाएगा।


एकादशी तिथि प्रारंभ - दोपहर 02:57 बजे से (1 जून 2020)

एकादशी तिथि समाप्त - दोपहर 12:04 बजे तक (2 जून 2020)

सूर्य पूजा करने की परंपरा

ज्येष्ठ महीने में सूर्य का प्रभाव चरम पर होता है। इस महीने तेज गर्मी रहती है और वाष्पीकरण अधिक होता है। इस कारण नदी, तालाब सूखने लगते हैं, जमीन का जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। लोगों को पानी बर्बाद करने से बचना चाहिए। आप निर्जला एकादशी के मौके पर प्याऊ या मटके लगवाएं। अपने घर के बाहर या छत पर चिड़ियों के लिए दाना-पानी का इंतजाम करें। जल्दी उठकर सूर्य की पूजा करें। ज्येष्ठ महीने में अपने खाने पीने का विशेष ख्याल रखें।

Wednesday, 27 May 2020

खेतवाडीचा राजा मुंबई

गणपति पंडाल
खेतवाडीचा राजा मुंबई

खेतवाडीचा राजा मुंबई के प्राचीन और प्रसिद्ध गणपति पंडाल हैं। इनकी स्थापना 1959 हुई थी। सं 2000 में 40 फिट ऊंचाई का गणपति बनानें से ख्यातिप्राप्त हुआ। खेतवाडी में 13 गली है, और उनमें से लगभग हर गली में गणपति पंडाल है, परन्तु 12 वीं गली का पंडाल खेतवाडी का सबसे प्रसिद्ध पंडाल है।

पता-  12वीं गली खेतवाडी, गिरगांव। चर्नी रोड स्टेशन के बाजू में।


Monday, 25 May 2020

जाने वाले महीने में कितने ग्रहण है

२०२० ग्रहण
5 जून से 5 जुलाई 2020 के बीच मे तीन ग्रहण है 
एक महीने में तीन ग्रहण 
दो चंद्र ग्रहण 
एक सूर्य ग्रहण 

जब कभी एक महीने में तीन से ज्यादा ग्रहण आ जाये 
तो एक चिंता का कारण बनता है 

5 जून 2020 चंद्रग्रहण
प्रारंभ रात 11:15 मिनिट समाप्ति 6 जून सुबह 2:34 चंद्र ग्रहण जिसमे शुक्र वक्री और अस्त रहेगा गुरु शनि वक्री रहेंगे तो तीन ग्रह वक्री रहेंगे, जिसके कारण जिसके प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा। शेयर बाजार से जुड़े हुए लोग सावधान रहें। यह ग्रहण वृश्चिक राशि पर बहोत बुरा प्रभाव डालेगा। किसी ख्यातिप्राप्त व्यक्ति की रहस्यात्मक मौत।
परिवार वालो के साथ वाद विवाद का सामना करना पड़ेगा तो वृश्चिक राशिवाले सावधान।

21 जून 2020 सूर्य ग्रहण
एक साथ छ ग्रह वक्री रहेंगे बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु यह छह ग्रह 21 जून 2020 को वक्री रहेंगे। इन छह ग्रह का वक्री होना यानी एक बहोत बड़ा तहलका मचाने वाला है।

5 जुलाई 2020 चंद्रग्रहण एक बहुत बड़ा परिवर्तन
मंगल का राशि परिवर्तन
सूर्य का राशि परिवर्तन
गुरु धन राशि मे वापस, लेकिन वक्री रहेंगे।
शुक्र मार्गी
प्राकृतिक आपदाएं आयेगी।
विश्व युद्ध होगा वैश्विक शक्तियां लड़ने को हावी होगी।
किसी ख्यातिप्राप्त यशस्वी कीर्तिमान राजनीति नेता की हत्या होगी कुछ जगह पर आपसी लड़ाईया होगी। जल प्रलय का खतरा हम सभी पे मंडरा रहा है।

5 जून को चंद्र ग्रहण
21 जून को सूर्य ग्रहण
5 जुलाई को चंद्र ग्रहण 

यह तीन ग्रहण के कारण उथल-पुथल मच जायेगी 
मांसाहार का त्याग करें, अन्यथा भयकर परिणाम।

Thursday, 21 May 2020

16 संस्कार भाग -3

अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम 9 - 12 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 4 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।


कर्णवेध संस्कार नवम संस्कार है। इस संस्कार में शिशु  के कोमल कानों में एक सूचिका द्वारा छेद किया जाता है। इस संस्कार को 6 माह से लेकर 16वें माह तक अथवा 3,5 आदि विषम वर्षों में या कुल की पंरपरा के अनुसार उचित आयु में किया जाता है। इसे स्त्री-पुरुषों में पूर्ण स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व की प्राप्ति के उद्देश्य से कराया जाता है। मान्यता यह भी है की सूर्य की किरणें कानों के छिद्र से प्रवेश पाकर बालक-बालिका को तेज़ संपन्न बनाती है। बालिकाओं के आभुषण धारण हेतु तथा रोगों से बचाव हेतु यह संस्कार आधुनिक एक्युपंचर पद्धति के अनुरुप एक सशक्त माध्यम भी है इसका व्यावहारिक पक्ष मुखमंडल की सौंदर्यता से है। वहीं चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से कर्णवेध से हाइड्रोसील नामक रोग से विमुक्ति होती है। इसी प्रकार दर्शन के अनुसार यह संसार एक शून्य है और कर्णवेध इसका परिचायक है।


जब शिशु की आयु शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाए तो उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है। इसमें समारोह के जरिये बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा होता है। दूसरी तरफ अभिभावकों, शिक्षकों को भी उनके दायित्व के प्रति जागरूक कराया जाता है। प्रचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था. आज भी बसंत पंचमी के दिन बच्चे से पहली बार अक्षर लिखवाया जाता है.शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार शुरू होता है और इसके बाद बच्चा अपनी पढाई शुरू करता है.



यह दशम संस्कार है।, शास्त्रों में बताया गया है कि इस संस्कार के द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का दूसरा जन्म होता है। उपनयन का अर्थ है, "ज्ञान रूपी नेत्र का प्रस्फोटन करना "   इस संस्कार से जीवन की ज्ञान यात्रा की शुरूआत होती है। बालक को विधिवत यज्ञोपवित (जनेऊ) धारण करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं जो कि त्रिदेव यानी कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक माने जाते हैं। इस संस्कार के द्वारा बालक को गायत्री जाप, वेदों का अध्ययन आदि करने का अधिकार प्राप्त होता है। इस संस्कार से जीवन की ज्ञान यात्रा की शुरूआत होती है। जनेउ धारण करने का वैज्ञानिक महत्व भी है। शौच जाते समय जनेउ से कान को बांधने से कान के पास से गुजरने वाली एक पतली सी नस बंध जाती है। इससे हृदय प्रदेश के अवयव प्रभावित होती हैं और हृदय रोगी की आशंका कम हो जाती है।


वेदारंभ (वेदों और सिद्धांतों का अध्ययन) संस्कार उपनयन के साथ किया जाता है. वेदारंभ ‘गुरुकुल’ में वेदों और उपनिषदों की शिक्षा है. प्रत्येक शैक्षणिक अवधि की शुरुआत में एक समारोह होता है जिसे उपकर्म कहलाता है। और प्रत्येक शैक्षणिक अवधि के अंत में एक और समारोह होता है जिसे उपसर्जना कहलाता है.वेदारम्भ संस्कार में केवल बालक ही एक आवश्यक अंग नहीं है , अपितु माता-पिता और अध्यापक भी इस संस्कार के महत्वपूर्ण अंग हैं । क्योंकि उनके उचित मार्गदर्शन के बिना इस संस्कार का संपन्न होना असंभव है । यही कारण रहा कि प्राचीन काल में भारत में विद्यारम्भ संस्कार के लिए सुयोग्य , चरित्रवान , विद्वान , संयमी , तपस्वी अध्यापक या गुरु की खोज करते थे। क्योंकि जब गुरु अवगुणों से रहित होगा तभी वह गुणी शिष्यों का निर्माण कर सकेगा । एक अच्छे समारोह के माध्यम से गुरु को भी समाज के सामने अपने आपको उत्तम सिद्ध करने का अवसर मिलता था । वह समाज को यह विश्वास दिलाते थे कि इस शिष्य को वह योग्यतम बनाकर संसार को देगा । गुरु के इस संकल्प की पूर्ति तभी संभव हो पाती है जब माता-पिता भी अपने बच्चे को वैसी ही प्रेरणा और शिक्षा देने वाले हों , जैसी उसका गुरु उसे देता है।

एक ऐसी चीज जिसके बिना है हर पूजा अधूरी

हिंदू धर्म


यह चीज हर पूजा का आधार है। इस चीज के बिना हर पूजा अधूरी है। हिंदू धर्म आस्था का प्रतीक हैं। हिंदू धर्म आधार स्तम्भ है "पूजा- अर्चना", और हमारे देश का हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य के हिसाब से पूजा करता है।
 हमारे देश के हर कार्य की शुरुआत पूजा से होती हैं। हर वर्ग के अलग - अलग विधि विधान से पूजा कार्य होता हैं। परन्तु ये वो वस्तु है जो हर धर्म में और सभी देवी देवताओं के लिए जरूरी है। सभी देवी देवता इस वस्तु के उपयोग स खुश रहते हैं। इसे धार्मिक लिहाज से भी बहुत शुभ माना जाता है। पूजा में इसके कुछ दाने ही आपकी सोई किस्मत को जागा सकते हैं। जानें कैसे?

पूजा पाठ में इसका अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है। तिलक लगाना हो या पूजा-पाठ करना हो उसमें भी इसका का प्रयोग किया जाता है। 

अक्षत का अर्थ होता है कि जो टूटा ना हो। चावल का जिस पूजा में प्रयोग होता है यदि पूजा में कुछ अन्य चीजें चूक वश छूट भी जाएं तो चावल के चढ़ावे से वह भूल माफ मानी जाती है। कई बार ऐसा होता है कि कुछ चीजें कुछ देवाता या देवी को पूजा में चढ़ाने की मनाही होती है, जैसे तुलसी को कुमकुम, गणेशजी को तुलसी, शिवजी को हल्दी नहीं चढ़ाई जाती, लेकिन अक्षत ऐसी महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है जिसे हर पूजा में हर देवी-देवता को चढ़ाया जाता है। अक्षत यानी चावल के कुछ दाने का प्रयोग आपके घर में सुख-शांति और धन-समृदधि सब कुछ दे सकता है।

मंत्र-
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ता: सुशोभिता:।
मया निवेदिता भक्त्या: गृहाण परमेश्वर॥

इस मंत्र का अर्थ यही होता है कि हे भगवान कुमकुम के रंग से सुशोभित यह अक्षत आपको समर्पित हैं, कृपया आप इसे स्वीकार करें। इसका यही भाव है कि अन्न में अक्षत जिसे सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जिसे देवान्न भी कहा जाता है साथ ही यह सभी देवताओं का प्रिय अन्न होता है। इसलिए इसे सुगंधित द्रव्य कुमकुम के साथ आपको अर्पित कर रहे हैं। इसे ग्रहण करें, आप भक्त की भावना को स्वीकार करें।

  • याद रखें कि जब भी पूजा में आप अक्षत यानी चावल के दाने प्रयोग करें वह संपूर्ण हो। यानी चावल के दाने टूटे नहीं होने चाहिए। टूटा चावल अशुभ माना जाता है। चावल के कुछ दाने रोज भगवान को चढ़ाने से आपको ऐश्वर्य की प्राप्ति हो सकती है।
  • शिवलिंग पर चावल चढ़ाना बहुत ही फलदायी माना गया है। यदि आपके पास धतुरा या कनैल का फूल नहीं भी है और आप शिवलिंग पर अक्षत चढ़ा दें तो आपको असीम फल की प्राप्ति होगी। अक्षत चढ़ाने वाले को भगवान शिव धन-वैभव और सम्मान प्रदान करते हैं।
  • यदि आपके घर में आर्थिक समस्या बनी रहती है तो आपको अपने घर कें मंदिर में मां अन्नपूर्णा की स्थापना करनी चाहिए और उनकी प्रतिमा चावल के ढ़ेर पर स्थापित करना चाहिए। इससे आपके घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होगी।
  • यदि आपके घर में आर्थिक समस्या बनी रहती है तो आपको अपने घर कें मंदिर में मां अन्नपूर्णा की स्थापना करनी चाहिए और उनकी प्रतिमा चावल के ढ़ेर पर स्थापित करना चाहिए। इससे आपके घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होगी।
  • देवताओं का प्रिय अन्न है चावल और यही कारण है कि इसे देवतान्न भी कहा गया है। इसे सुगंधित द्रव्य कुंकुम के साथ भगवान अर्पित करना चाहिए। ये आपकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का जबरदस्त उपाय है।
  • अपने ईष्ट देव के नाम से भी अक्षत का चढ़ावा जरूर चढ़ाया करें। ये आपके घर में सौभाग्य लाएगा।
  • विवाह की कई रस्मों में अक्षत का प्रयोग किया जाता है। माना जाता है कि अक्षत से दुष्टात्माएं भागती हैं। इसलिए वर-वधू इसे अग्नि में समर्पित करते हैं। परिवार के लोग जोड़े के ऊपर अक्षत छिड़कते हैं। मान्यता है कि इस तरह दोनों को जीवन में समृद्धि प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया जाता है।

Wednesday, 20 May 2020

जीएसबी सेवा पंडाल मुंबई

जीएसबी सेवा पंडाल


गणपति पंडालों में जीएसबी पंडाल मुम्बई  का सबसे महंगा गणेश पंडाल  है। यहां हर साल 60 किलो से भी ज्यादा सोना और चांदी चढ़ावा आता है। इसलिए इसे मुंबई के गोल्डन गणेशा के नाम से भी जानते हैं। यहां साल 1954 से ही हर साल गणेश चतुर्थी पर पंडाल सजाया जाता है।

Sunday, 17 May 2020

मुंबईचा राजा (गणेश गली गणपति)

गणपति पंडाल मुंबई


देशभर में ऐसे कई मंडल हैं जो गणेशोत्सव की महिमा बढाते हैं और व्यापक स्तर पर इसको मनाते हैं। वैसे तो देशभर में कई पंडाल है लेकिन गणेश गली मुंबई चा राजा पंडाल का अपना विशेष महत्व हैं।


यह पंडाल लालबागचा राजा पंडाल से केवल कुछ ही दूरी पर है इस पंडाल की शुरुआत 1928 में की गई थी। यह मुंबई के सबसे मशहूर गणेश पंडालों में से एक है। हर साल इसे एक थीम पर आधार करके बनाया जाता है। यहां पर भारत के प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिकृति बनाई जाती है। यहां आने के लिए आप चिंचपोकली, करी रोड या लोअर परेल स्टेशन उतर सकते हैं यहां से पंडाल की पैदल दूरी है।


Saturday, 16 May 2020

लालबागचा राजा

लालबाग का राजा – गणपति बहुत मशहूर हैं. लोग इन्हें मन्नत के गणपति भी कहते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि यहां आकर गणपति से मांगने पर वो आपकी सभी मुरादे पूरी कर देते हैं. लालबाग का राजा गणपति कितने लोकप्रिय है।लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की स्थापना वर्ष 1934 में हुई थी। यह मुंबई के लालबाग, परेल इलाके में स्थित हैं।यह गणेश मंडल अपने 10 दिवसीय समारोह के दौरान लाखों लोगों को खासा आकर्षित करता है। इस प्रसिद्ध गणपति को ‘नवसाचा गणपति’(इच्छाओं की पूर्ति करने वाले) के रूप में भी जाना जाता है। हर वर्ष केवल दर्शन पाने के लिए यहां करीबन 5 किलोमीटर की लंबी कतार लगती है, लालबाग के गणेश मूर्ति का विसर्जन गिरगांव चौपाटी में दसवें दिन किया जाता है।

लालबाग के राजा की कहानी इस प्रकार है. आज जहां पर लालबाग के राजा विराजमान हैं, पहले वहां पर अंग्रेजों के जमाने में मिल मजदूर रहा करते थें. उसके बाद साल 1930 में विकास के नाम पर उनको वहां से निकला दिया गया, जिसके बाद उन लोगों ने श्री गणपति महराज से ये मन्नत मांगी कि अगर उनके सर की छत बची रही तो वो गणपति जी की प्रतिमा वहां स्थापित करेंगे. बेघर लोगों को नई जगह के साथ-साथ सर पर छत भी मिल गई और उन्होंने अपनी मन्नत मानते हुए वहां उसी समय पर गणपति की एक मुर्ति के स्थापना की और उनको दिया नया नाम, मन्नतों के गणपति. तब से यहां बड़े ही भव्य अंदाज में पूजा-अर्चना होने लगी. लोग यहां दूर-दूर से आते और अपनी-अपनी मन्नत मानते. आज भी ये सिलसिला यू हीं बरकरार है. बता दें कि यहां हर साल उत्सव में गणपति का रुप बदला जाता है. यहां लाखों-करोड़ों की तादात में चढ़ावा आता है, जिससे गरीबों का पेट भरता और वहां रहने वाले मजूबर लोगों की मदद की जाती है.

Sunday, 10 May 2020

16 संस्कार भाग-2

अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम 4- 8 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 8 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।



इस संस्कार को प्रायः दस दिन के सूतक की निवृत्ति के बाद ही किया जाता है। पारस्कर गृहयसूत्र में लिखा है -दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति। कभी न कभी उसके मन में ऐसा भाव अवश्य आता है कि जैसा तेरा नाम है वैसे ही तेरे कर्म भी होने चाहिए। नामकरण संस्कार सन्तान के जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन या एक सौ एकवें दिन में या दूसरे वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो किए जाने की परंपरा रही है । इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर मधुर भाषण कर, सूर्यदर्शन कराया जाता है और कामना की जाती है की बच्चा सूर्य की प्रखरता-तेजस्विता धारण करे, इसके साथ ही भूमि को नमन कर देवसंस्कृति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाता है।हमारे यहां पर यह भी परंपरा रही है कि बच्चों को प्यार करते समय उसका चुंबन नहीं लिया जाएगा। क्योंकि ऐसा करने से बच्चे को संक्रामक रोग लग सकते हैं । इसके स्थान पर बच्चे की नासिका द्वार को स्पर्श करने या बच्चे को सूंघने की परंपरा रही है।

 
निष्क्रमण का अर्थ है - बाहर निकालना। जन्म के चौथे माह में इस संस्कार को संपन्न कराया जाना उचित होता है। इस अवसर पर बाहर के लोग नव शिशु का स्वागत और सत्कार करते हैं । आज भी पहली बार घर से बाहर निकले ऐसे शिशु को लोग बहुत लाड – प्यार करते हैं और उसके चिरायु होने की कामना करते हैं । इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर मधुर भाषण कर, सूर्यदर्शन कराया जाता है और कामना की जाती है की बच्चा सूर्य की प्रखरता-तेजस्विता धारण करे, इसके साथ ही भूमि को नमन कर देवसंस्कृति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाता है। शिशु का नया नाम लेकर सबके द्वारा उसके चिरंजीवी, धर्मशील, स्वस्थ एवं समृद्ध होने की कामना की जाती है।भारतीय चिंतन के अनुसार आत्मा अजर-अमर है। शरीर नष्ट होता है, कितुं जीवात्मा के संचित संस्कार उसके साथ लगे रहते हैं। बालक किस समय, किस नक्षत्र, राशि आदि में उत्पन्न हुआ, यह सब एक निश्चित विधान के अनुसार होता है। इस प्रकार निष्क्रमण संस्कार के समय बालक का परिचय सूर्य , चंद्रमा , सितारे ,नक्षत्र आदि से कराया जाना शास्त्रविहित कर्म है ।


जब बालक 6 माह का हो जाए तो उसे पहली बार अन्न ग्रहण कराया जाना चाहिए । प्रारंभ में बच्चे को गाय के 150 ग्राम दूध में 50 या 60 ग्राम उबला हुआ पानी और एक चम्मच मीठा डालकर बच्चे को पिलाना चाहिए । दूध की मात्रा को धीरे – धीरे बढ़ा सकते हैं और फिर जब भी बच्चे को भूख लगे तो उसे मां अपने दूध के स्थान पर गाय का दूध दे सकती है। चौथे सप्ताह से बच्चे को फलों का रस व सब्जी का रसा भी दिया जा सकता है। उसके पश्चात दही शहद सब्जी के माध्यम से धीरे-धीरे बच्चे को भोजन पर लाया जा सकता है। छठे माह में माता-पिता चांदी के चम्मच से खीर आदि पवित्र और पुष्टिकारक अन्न शिशु को चटाते हैं और निम्नलिखित मंत्र बोलते हैं
    शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ।
    एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतोअंहसः।।
अर्थात् हे बालक! जौ और चावल तुम्हारे लिए बलदायक तथा पुष्टिकारक हों, क्योंकि ये दोनों वस्तुएं यक्ष्मानाशक हैं तथा देवान्न होने से पापनाशक हैं।
इस प्रक्रिया को अपनाने से बच्चे को कभी भी किसी प्रकार का कोई शिशु रोग नहीं सताता। इस प्रकार बच्चे की शिक्षा हमारे यहां पर 5 वर्ष के पश्चात नहीं ,अपितु उसके जन्म की प्रक्रिया अर्थात गर्भाधान संस्कार से ही प्रारंभ हो जाती थी , जिसे आज भी समझने की आवश्यकता है।


चूड़ाकरण (मुडंन, शिखा) संस्कार अष्टम संस्कार है। यह संस्कार पहले या तीसरे वर्ष में कर लेना चाहिये। नयी रचना सृजना से पहले या उसके होते समय कुछ विशेष कष्ट उठाना ही पड़ता है । मां को भी नये सृजन के समय अर्थात बच्चे के प्रसव के समय कष्ट भोगना पड़ता है । इसी प्रकार जब शिशु के दांत निकलते हैं तो उसकी इस नई सृजना के लिए भी उसे कुछ कष्ट होता है । उस समय इस कष्ट के कारण बच्चा चिड़चिड़ा भी हो जाता है । यह प्रक्रिया एक वर्ष से आरंभ होकर 3 वर्ष की अवस्था तक पूर्ण हो जाती है। जन्म के पश्चात् प्रथम वर्ष के अंत तथा तीसरे वर्ष की समाप्ति के पूर्व मुंडन-संस्कार कराना आमतौर पर प्रचलित है, क्योंकि हिंदू मान्यता के अनुसार एक वर्ष से कम की उम्र में मुडंन-संस्कार करने से शिशु की सेहत पर बुरा प्रभाव पडता है और अमंगल होने की आशंका रहती है। इस अवस्था में बच्चे का सिर भारी हो जाता है । सिर में गर्मी बढ़ जाती है । मसूड़े फूल जाते हैं । आंखें आ जाती हैं । जिससे उसके मुंह में लार अधिक बनती है । यही कारण रहा कि इस अवस्था में हमारे ऋषि पूर्वजों ने मुंडन संस्कार कराने का प्रावधान किया । जिससे सिर में कुछ ठंडक अनुभव हो और बच्चे की चिड़चिड़ाहट में कमी आए। यजुर्वेद में लिखा है-

नि वर्त्तयाम्यायुषेड्न्नाद्याय प्रजननाय।
रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय।।

अर्थात् हे बालक! मैं तेरी दीर्घायु के लिए, तुझे अन्न-ग्रहण करने में समर्थ बनाने के लिए, उत्पादन शाक्ति प्राप्ति के लिए, ऐश्वर्य वृद्धि के लिए, सुंदर संतान के लिए एवं बल तथा पराक्रम प्राप्ति के योग्य होने के लिए तेरा चूडाकर्म संस्कार (मूडंन) करता हूं।