अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम 4- 8 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 8 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।
इस संस्कार को प्रायः दस दिन के सूतक की निवृत्ति के बाद ही किया जाता है। पारस्कर गृहयसूत्र में लिखा है -दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति। कभी न कभी उसके मन में ऐसा भाव अवश्य आता है कि जैसा तेरा नाम है वैसे ही तेरे कर्म भी होने चाहिए। नामकरण संस्कार सन्तान के जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन या एक सौ एकवें दिन में या दूसरे वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो किए जाने की परंपरा रही है । इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर मधुर भाषण कर, सूर्यदर्शन कराया जाता है और कामना की जाती है की बच्चा सूर्य की प्रखरता-तेजस्विता धारण करे, इसके साथ ही भूमि को नमन कर देवसंस्कृति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाता है।हमारे यहां पर यह भी परंपरा रही है कि बच्चों को प्यार करते समय उसका चुंबन नहीं लिया जाएगा। क्योंकि ऐसा करने से बच्चे को संक्रामक रोग लग सकते हैं । इसके स्थान पर बच्चे की नासिका द्वार को स्पर्श करने या बच्चे को सूंघने की परंपरा रही है।
निष्क्रमण का अर्थ है - बाहर निकालना। जन्म के चौथे माह में इस संस्कार को संपन्न कराया जाना उचित होता है। इस अवसर पर बाहर के लोग नव शिशु का स्वागत और सत्कार करते हैं । आज भी पहली बार घर से बाहर निकले ऐसे शिशु को लोग बहुत लाड – प्यार करते हैं और उसके चिरायु होने की कामना करते हैं । इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर मधुर भाषण कर, सूर्यदर्शन कराया जाता है और कामना की जाती है की बच्चा सूर्य की प्रखरता-तेजस्विता धारण करे, इसके साथ ही भूमि को नमन कर देवसंस्कृति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाता है। शिशु का नया नाम लेकर सबके द्वारा उसके चिरंजीवी, धर्मशील, स्वस्थ एवं समृद्ध होने की कामना की जाती है।भारतीय चिंतन के अनुसार आत्मा अजर-अमर है। शरीर नष्ट होता है, कितुं जीवात्मा के संचित संस्कार उसके साथ लगे रहते हैं। बालक किस समय, किस नक्षत्र, राशि आदि में उत्पन्न हुआ, यह सब एक निश्चित विधान के अनुसार होता है। इस प्रकार निष्क्रमण संस्कार के समय बालक का परिचय सूर्य , चंद्रमा , सितारे ,नक्षत्र आदि से कराया जाना शास्त्रविहित कर्म है ।
जब बालक 6 माह का हो जाए तो उसे पहली बार अन्न ग्रहण कराया जाना चाहिए । प्रारंभ में बच्चे को गाय के 150 ग्राम दूध में 50 या 60 ग्राम उबला हुआ पानी और एक चम्मच मीठा डालकर बच्चे को पिलाना चाहिए । दूध की मात्रा को धीरे – धीरे बढ़ा सकते हैं और फिर जब भी बच्चे को भूख लगे तो उसे मां अपने दूध के स्थान पर गाय का दूध दे सकती है। चौथे सप्ताह से बच्चे को फलों का रस व सब्जी का रसा भी दिया जा सकता है। उसके पश्चात दही शहद सब्जी के माध्यम से धीरे-धीरे बच्चे को भोजन पर लाया जा सकता है। छठे माह में माता-पिता चांदी के चम्मच से खीर आदि पवित्र और पुष्टिकारक अन्न शिशु को चटाते हैं और निम्नलिखित मंत्र बोलते हैं
शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ।
एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतोअंहसः।।
अर्थात् हे बालक! जौ और चावल तुम्हारे लिए बलदायक तथा पुष्टिकारक हों, क्योंकि ये दोनों वस्तुएं यक्ष्मानाशक हैं तथा देवान्न होने से पापनाशक हैं।
इस प्रक्रिया को अपनाने से बच्चे को कभी भी किसी प्रकार का कोई शिशु रोग नहीं सताता। इस प्रकार बच्चे की शिक्षा हमारे यहां पर 5 वर्ष के पश्चात नहीं ,अपितु उसके जन्म की प्रक्रिया अर्थात गर्भाधान संस्कार से ही प्रारंभ हो जाती थी , जिसे आज भी समझने की आवश्यकता है।
चूड़ाकरण (मुडंन, शिखा) संस्कार अष्टम संस्कार है। यह संस्कार पहले या तीसरे वर्ष में कर लेना चाहिये। नयी रचना सृजना से पहले या उसके होते समय कुछ विशेष कष्ट उठाना ही पड़ता है । मां को भी नये सृजन के समय अर्थात बच्चे के प्रसव के समय कष्ट भोगना पड़ता है । इसी प्रकार जब शिशु के दांत निकलते हैं तो उसकी इस नई सृजना के लिए भी उसे कुछ कष्ट होता है । उस समय इस कष्ट के कारण बच्चा चिड़चिड़ा भी हो जाता है । यह प्रक्रिया एक वर्ष से आरंभ होकर 3 वर्ष की अवस्था तक पूर्ण हो जाती है। जन्म के पश्चात् प्रथम वर्ष के अंत तथा तीसरे वर्ष की समाप्ति के पूर्व मुंडन-संस्कार कराना आमतौर पर प्रचलित है, क्योंकि हिंदू मान्यता के अनुसार एक वर्ष से कम की उम्र में मुडंन-संस्कार करने से शिशु की सेहत पर बुरा प्रभाव पडता है और अमंगल होने की आशंका रहती है। इस अवस्था में बच्चे का सिर भारी हो जाता है । सिर में गर्मी बढ़ जाती है । मसूड़े फूल जाते हैं । आंखें आ जाती हैं । जिससे उसके मुंह में लार अधिक बनती है । यही कारण रहा कि इस अवस्था में हमारे ऋषि पूर्वजों ने मुंडन संस्कार कराने का प्रावधान किया । जिससे सिर में कुछ ठंडक अनुभव हो और बच्चे की चिड़चिड़ाहट में कमी आए। यजुर्वेद में लिखा है-
नि वर्त्तयाम्यायुषेड्न्नाद्याय प्रजननाय।
रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय।।
अर्थात् हे बालक! मैं तेरी दीर्घायु के लिए, तुझे अन्न-ग्रहण करने में समर्थ बनाने के लिए, उत्पादन शाक्ति प्राप्ति के लिए, ऐश्वर्य वृद्धि के लिए, सुंदर संतान के लिए एवं बल तथा पराक्रम प्राप्ति के योग्य होने के लिए तेरा चूडाकर्म संस्कार (मूडंन) करता हूं।
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