Monday, 18 July 2022

पीपल

*पीपल*

💚अकेला ऐसा पौधा जो दिन और रात दोनो समय आक्सीजन देता है

🌟पीपल के ताजा 6-7 पत्ते लेकर 400 ग्राम पानी मे डालकर 100 ग्राम रहने तक उबाले,ठंडा होने पर पिए ब्रर्तन स्टील और एल्युमिनियम का नहीं हो, आपका ह्रदय एक ही दिन में ठीक होना शुरू हो जाएगा

🌟पीपल के पत्तो पर भोजन करे, लीवर ठीक हो जाता है

🌟पीपल के सूखे पत्तों का पाउडर बनाकर आधा चम्मच गुड़ में मिलाकर सुबह दोपहर शाम खायेँ, किंतना भी पुराना दमा ठीक कर देता है

🌟पीपल के ताजा 4-5 पत्ते लेकर पीसकर पानी मे मिलाकर पिलाये,1- 2 बार मे ही पीलिया में आराम देना शुरू कर देता है

🌟पीपल की छाल को गंगाजल में घिसकर घाव में लगाये तुरंत आराम देता है

🌟पीपल की छाल को खांड (चीनी )मिलाकर दिन में 5-6 बार चूसे, कोई भी नशा छूट जाता है

🌟पीपल के पत्तों का काढ़ा पिये, फेफड़ो, दिल ,अमाशय और लीवर के सभी रोग ठीक कर देता है

🌟पीपल के पत्तों का काढ़ा बनाकर पिये, किडनी के रोग ठीक कर देता है व पथरी को तोड़कर बाहर करता है

🌟किंतना भी डिप्रेशन हो, पीपल के पेड़ के नीचे जाकर रोज 30 मिनट बैठिए डिप्रेशन खत्म कर देता है

🌟पीपल की फल और ताजा कोपले लेकर बराबर मात्रा में लेकर पीसकर सुखाकर खांड मिलाकर दिन में 2 बार ले, महिलाओ के गर्भशाय और मासिक समय के सभी रोग ठीक करता है

🌟पीपल का फल और ताजा कोपले लेकर बराबर मात्रा में लेकर पीसकर सुखाकर खांड मिलाकर दिन में 2 बार ले, बच्चो का तुतलाना ठीक कर देता है और दिमाग बहुत तेज करता है

🌟जिन बच्चो में हाइपर एक्टिविटी होती है, जो बच्चे दिनभर रातभर दौड़ते भागते है सोते कम है, पीपल के पेड़ के नीचे बैठाइए सब ठीक कर देता है

🌟किंतना भी पुराना घुटनो का दर्द हो, पीपल के नीचे बैठे 30-45 दिन में सब खत्म हो जाएगा

🌟शरीर मे कही से भी खून आये, महिलाओ को मासिक समय मे रक्त अधिक आता हो, बाबासीर में रक्त आता हो, दांत निकलवाने पर रक्त आये ,चोट लग जाये, 8-10 पत्ते पीसकर,छानकर पी जाएं, तुंरत रक्त का बहना बंद कर देता है

🌟शरीर मे कही भी सूजन हो, दर्द हो, पीपल के पत्तों को गर्म करके बांध दे, ठीक हो जायेगे

🙏🙏🙏🙏

Thursday, 1 October 2020

क्यों लेते है चरणामृत

क्या है चरणामृत का महत्व!!!!!!!

अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है, शास्त्रों में कहा गया है।

*अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।*
*विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।*

*"अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधि के समान है।*

*जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है।

चरणामृत से सम्बन्धित एक पौराणिक गाथा काफी प्रसिद्ध है जो हमें श्रीकृष्ण एवं राधाजी के अटूट प्रेम की याद दिलाती है। कहते हैं कि एक बार नंदलाल काफी बीमार पड़ गए। कोई दवा या जड़ी-बूटी उन पर बेअसर साबित हो रही थी। तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक ऐसा उपाय करने को कहा जिसे सुन गोपियां दुविधा में पड़ गईं।

श्रीकृष्ण हुए बीमार
दरअसल श्रीकृष्ण ने गोपियों से उन्हें चरणामृत पिलाने को कहा। उनका मानना था कि उनके परम भक्त या फिर जो उनसे अति प्रेम करता है तथा उनकी चिंता करता है यदि उसके पांव को धोने के लिए इस्तेमाल हुए जल को वे ग्रहण कर लें तो वे निश्चित ही ठीक हो जाएंगे। दूसरी ओर गोपियां और भी चिंता में पड़ गईं। श्रीकृष्ण उन सभी गोपियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे, वे सभी उनकी परम भक्त थीं, लेकिन उन्हें इस उपाय के निष्फल होने की चिंता सता रही थी।

उनके मन में बार-बार यह आ रहा था कि यदि उनमें से किसी एक गोपी ने अपने पांव के इस्तेमाल से चरणामृत बना लिया और कृष्णजी को पीने के लिए दिया तो वह परम भक्त का कार्य तो कर देगी। परन्तु किन्हीं कारणों से कान्हा ठीक ना हुए तो उसे नर्क भोगना पड़ेगा।

अब सभी गोपियां व्याकुल होकर श्रीकृष्ण की ओर ताक रहीं थी और किसी अन्य उपाय के बारे में सोच ही रहीं थी कि वहां कृष्ण की प्रिय राधा आ गईं। अपने कृष्ण को इस हालत में देख के राधा के तो जैसे प्राण ही निकल गए हों।जब गोपियों ने कृष्ण द्वारा बताया गया उपाय राधा को बताया तो राधा ने एक क्षण भी व्यर्थ करना उचित ना समझा और जल्द ही स्वयं के पांव धोकर चरणामृत तैयार कर श्रीकृष्ण को पिलाने के लिए आगे बढ़ी।

 राधा जानतीं थी कि वे क्या कर रही हैं। जो बात अन्य गोपियों के लिए भय का कारण थी ठीक वही भय राधा को भी मन में था लेकिन कृष्ण को वापस स्वस्थ करने के लिए वह नर्क में चले जाने को भी तैयार थीं।आखिरकार कान्हा ने चरणामृत ग्रहण किया और देखते ही देखते वे ठीक हो गए, क्योंकि वह राधा ही थीं जिनके प्यार एवं सच्ची निष्ठा से कृष्णजी तुरंत स्वस्थ हो गए।  अपने कृष्ण को निरोग देखने के लिए राधाजी ने एक बार भी स्वयं के भविष्य की चिंता ना की और वही किया जो उनका धर्म था।

इतिहास गवाह है इस बात का... 
राधा-कृष्ण का कभी विवाह ना हुआ, लेकिन उनका प्यार इतना पवित्र एवं सच्चा था कि आज भी दोनों का नाम एक साथ लेने में भक्त एक क्षण भी संदेह महसूस नहीं करते। उनके भक्तों के लिए कृष्ण केवल राधा के हैं तथा राधा भी कृष्ण की ही हैं।

राधा-कृष्ण की इस कहानी ने चरणामृत को एक ऐतिहासिक पहलू तो दिया ही, लेकिन आज भी चरणामृत को प्रभु का प्रसाद मानकर भक्तों में बांटा जाता है। पीतल के बर्तन में पीतल के ही चम्मच से, थोड़ा मीठा-सा यह अमृत भक्तों के कंठ को पवित्र बनाता है।*

*जब भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया,वह चरणामृत गंगा जी बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये शक्ति उनके पास कहाँ से पात्र शक्ति है भगवान के चरणों की जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी।

*जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते है - "चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी"*

*धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।

कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया, बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।

चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं, चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।

आयुर्वेदिक मतानुसार, तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।

इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए । ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि,स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधि के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।

इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये, लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं?*

*दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।कहते हैं इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं, बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है। इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।

‼️   !! श्री हरि : !!
!! श्री हरि शरणम् !!* ‼️

Sunday, 20 September 2020

अधिक मास में करे ये काम चमक जायेगी आपकी क़िस्मत

अधिक मास का पवित्र महीना 18 सितंबर, शुक्रवार शुरू हो गया है। शास्त्रों में इस महीने की महिमा के बारे में बताया गया है। माना जाता है कि इस महीने में पूजा-पाठ करने से दस गुणा अधिक फलों की प्राप्ति होती है। अधिक मास को भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है। इसलिए ही इस महीने का नाम पुरुषोत्तम मास अथवा मल मास भी कहा जाता है।
इन दिनों में भागवत पुराण का भी विशेष पाठ किया जाता है। आपको बता दें कि पितृपक्ष और मलमास में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। यही वजह है कि इस बार इस बार शुभ मुहूर्त समेत लग्न 123 दिन के बजाय 148 दिन बाद 25 नवंबर से आरंभ होगा। इस दिन  25 तारीख को देवउठनी एकादशी पर श्री हरि निंद्रा से जगेंगे। उसी के साथ मांगलिक कार्य शुरू होंगे।
  1. ऐसी मान्यता है कि पीला रंग भगवान विष्णु को अत्यधिक प्रिय है. इसलिए मलमास के इस पूरे महीने के दौरान भगवान विष्णु को पीले रंग की ही वस्तुएं ही चढ़ानी चाहिए. जैसे कि पीले पुष्प, पीले फल, पीले वस्त्र आदि. जिसे बाद में दान कर देना चाहिए.

  2. भगवान विष्णु को तुलसी अधिक प्रिय होने के कारण पूरे मलमास में गाय के घी के दीपक तुलसी के पेड़ के सामने करना चाहिए. दीपक जलाने के बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र का जप करते हुए तुलसी के पेड़ की 11 बार परिक्रमा करनी चाहिए.

  3. पूरे मलमास के समय ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करने के पश्चात केसर युक्त दूध से भगवान विष्णु का अभिषेक करना चाहिए इसके बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र का 11 बार जाप करना चाहिए.

  4. पूरे मलमास के दौरान पीपल के पेड़ में  जल चढ़ाना चाहिए और गाय के घी का दीपक करना चाहिए क्योंकि पीपल के वृक्ष में श्री हरि विष्णु का वास माना जाता है.

  5. पूरे मलमास की दौरान में रोज सूर्य भगवान को जल चढ़ना चाहिए. जल चढ़ाते समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः' का जाप करते  हुए भगवान विष्णु का ध्यान करते रहना चाहिए.

  6. ऐसा कहा गया है कि मलमास की अवधि के अन्तर्गत दक्षिणवर्ती शंख की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से श्री हरि विष्णु के साथ ही माताश्री लक्ष्मी का भी आशीर्वाद मिलता है.

  7. मलमास की नवमी तिथि को कन्याओं को भोजन करवाने से भी सर्व मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

इसलिए आता है मलमास

चन्द्रमा 29.5 दिनों में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरा करता है। चन्द्रमा पृथ्वी  की 12 परिक्रमा 354 दिन में पूरी होती है। इसलिये चन्द्र वर्ष कुल 354 दिन का होता है, जो सौर वर्ष से कुल 11 दिन कम होता है। इस प्रकार तीन वर्षों में कुल 33 दिन का अंतर आ जाता है। इसी कमी को तीन वर्षों में कुल 13 महीने मानकर एक महीने का मलमास पड़ता है। 

Tuesday, 11 August 2020

जाने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मानाने का शुभ मुहूर्त


पंचांग के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था.

इस बार पंचांग के अनुसार अष्टमी की तिथि 11 अगस्त यानि आज सुबह 9 बजकर 6 मिनट से आरंभ हो रही है. अष्टमीकी तिथि 12 अगस्त को सुबह 11 बजकर 16 मिनट पर समाप्त हो रही है. 11 अगस्त को भरणी और 12 अगस्त को कृतिका नक्षत्र है. इसके बाद रोहिणी नक्षत्र आता है जो 13 अगस्त को रहेगा. इसीलिए कुछ स्थानों पर इस दिन भी जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है.


इस वर्ष कृष्ण जन्मोत्सव पर बन रहा है एक विशेष योग

इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी पर एक विशेष योग बन रहा है. पंडितों के मतानुसार, उसी दिन कृतिका नक्षत्र लगेगा. यही नहीं, चंद्रमा मेष राशि और सूर्य कर्क राशि में रहेंगे. कृतिका नक्षत्र और राशियों की इस स्थिति से वृद्धि योग बना रहा है. इस तरह बुधवार की रात के बताए गए मुहूर्त में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से दोगुना फल मिलेगा। 12 अगस्त को वृष राशि चंद्रमा कृतिका नक्षत्र के चतुर्थ चरण में होंगे. रोहिणी नक्षत्र के नजदीक चंद्रमा होंगे, इसलिए 12 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना शुभ रहेगा।

क्या है शुभ मुहूर्त?

जन्माष्टमी के दिन रात को पूजा करने का समय सही होता है. क्योंकि, द्वापर युग में श्रीकृष्ण का अवतार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में हुआ था. उस समय चंद्र उच्च राशि वृषभ में था. उस दिन बुधवार और रोहिणी नक्षत्र था. भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को ही हुआ था. 12 अगस्त को पूजा का शुभ समय रात 12 बजकर 5 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक है. पूजा की अवधि 43 मिनट है.

पूजा की विधि

पूजा से पहले स्नान जरूर करें. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा का विधान है. पूजा करने से पहले भगवान को पंचामृत और गंगाजल से स्नान जरूर से करवाएं. स्नान के बाद भगवान को वस्त्र पहनाएं. ध्यान रहें कि कन्हाजी के वस्त्र नए हो. इसके बाद उनका श्रृंगार करें. भगवान को फिर माखन का भोग लगाएं और कृष्ण आरती गाएं.


Tuesday, 4 August 2020

जाने कैसे नारद के सिद्द किया कि 'नाम ' बड़ा या 'नामी ', "जय श्री राम"

लंका-विजय के बाद एक बार अयोध्या में भगवान श्रीराम देवर्षि नारद, विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषि-मुनियों के साथ इक्कट्ठे हुए । उस समय नारदजी ने ऋषियों से कहा कि वे बताएं—‘नाम’ (भगवान का नाम) और ‘नामी’ (स्वयं भगवान) में श्रेष्ठ कौन है ?’ इस पर सभी ऋषियों में वाद-विवाद होने लगा किन्तु कोई भी इस प्रश्न का सही निर्णय नहीं ले पाया । तब नारदजी ने कहा—‘निश्चत ही ‘भगवान का ‘नाम’ श्रेष्ठ है और इसको सिद्ध भी किया जा सकता है ।’ इस बात को सिद्ध करने के लिए नारदजी ने एक युक्ति सुझाई । उन्होंने हनुमानजी से कहा कि तुम राज दरबार में जाकर सभी ऋषि-मुनियों को प्रणाम करना किन्तु गुरु विश्वामित्रजी को प्रणाम मत करना क्योंकि वे राजर्षि (राजा से ऋषि बने) हैं, अत: वे अन्य ऋषियों के समान सम्मान के योग्य नहीं हैं ।’

हनुमानजी ने दरबार में जाकर नारदजी के कहे अनुसार ही किया । विश्वामित्रजी हनुमानजी के इस व्यवहार से क्रोधित हो गए । तब नारदजी विश्वामित्रजी के पास जाकर बोले—‘हनुमान बहुत उद्दण्ड और घमण्डी हो गया है, उसने आपको छोड़कर उसने सभी ऋषियों को प्रणाम किया ?’ यह सुन गुरु विश्वामित्र आगबबूला हो उठे और श्रीराम के पास जाकर बोले—‘आपके सेवक हनुमान ने सभी ऋषियों के सामने मेरा घोर अपमान किया है, अत: कल सूर्यास्त से पूर्व उसे आपके हाथों मृत्युदण्ड मिलना चाहिए ।’ विश्वामित्रजी श्रीराम के गुरु थे अत: श्रीराम को उनकी आज्ञा का पालन करना आवश्यक था ।‘ प्रभु श्रीराम हनुमान को कल मृत्युदण्ड देंगे’—यह बात सारे नगर में आग की तरह फैल गई थी। हनुमानजी नारदजी के पास गए और बोले—‘देवर्षि ! मेरी रक्षा करें, प्रभु कल मृत्यु दंड देंगे। मैंने तो आपके कहने पे ही यह सब कुछ  किया है ।’ नारदजी ने हनुमानजी से कहा—‘तुम हताश मत हो, मैं जैसा कहूं, वैसा ही करो । ब्राह्ममुहुर्त में उठकर सरयू नदी में स्नान करके और फिर नदी-तट पर ही खड़े होकर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’—इस मन्त्र का जाप करना । तुम्हें कुछ नहीं होगा ।’ दूसरे दिन प्रात:काल हनुमानजी की कठिन परीक्षा देखने के लिए अयोध्यावासियों की भीड़ इकट्ठी हो गई । हनुमानजी सूर्योदय से पहले ही सरयू में स्नान कर बालुका तट पर हाथ जोड़कर जोर-जोर से ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जाप करने लगे । भगवान श्रीराम हनुमानजी से थोड़ी दूर पर खड़े होकर अपने प्रिय सेवक पर अनिच्छापूर्वक बाणों का बौछार करने लगे । पूरे दिन श्रीराम बाणों की वर्षा करते रहे, पर हनुमानजी का बाल-बांका भी नहीं हुआ । अंत में श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र निकाला । हनुमानजी पूर्ण आत्मसमर्पण किए हुए जोर-जोर से मुस्कराते हुए ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जाप करते रहे । सभी लोग आश्चर्य में डूब गए ।
तब नारदजी विश्वामित्रजी के पास जाकर बोले—‘मुने ! आप अपने क्रोध को शान्त कीजिए । श्रीराम थक चुके हैं, उन्हें हनुमान के वध की गुरु-आज्ञा से मुक्ती दीजिए । आपने श्रीराम के ‘नाम’ की महत्ता को तो प्रत्यक्ष देख ही लिया है । अनन्य बाण हनुमान का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके है । अब आप श्रीराम को हनुमान को ब्रह्मास्त्र के उपयोग से न मारने की आज्ञा दें ।’ विश्वामित्रजी ने वैसा ही किया । हनुमानजी आकर श्रीराम के चरणों पर गिर पड़े । विश्वामित्रजी ने हनुमानजी को आशीर्वाद देकर उनकी श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति की प्रशंसा करने लगे ।

Sunday, 19 July 2020

20 जुलाई 2020 ज्योतिष के अनुसार 20 साल बाद बन रहा है "सोमवती अमावस्या" का संयोग, जाने व्रत कथा और उपाय

सावन महीना का हर सोमवार बहुत खास होता है लेकिन इस बार सावन का तीसरा सोमवार ज्यादा फलदायी है. ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, 20 साल बाद सोमवती अमावस्या का संयोग बन रहा है. इसे हरियाली अमावस्या भी कहते हैं.
ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, इस बार सोमवती अमावस्या के दिन चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र और शनि ग्रह अपनी राशि में रहेंगे. इस दिन भगवान शिव की पूजा करना सबसे अधिक फलदायी रहता है. बताया जाता है कि इस दिन महिलाओं को तुलसी की 108 बार परिक्रमा करना चाहिए.

सोमवती अमावस्या तिथि मुहूर्त

अमावस्या तिथि प्रारंभ-  20 जुलाई 12.10 AM से

अमावस्या तिथि प्रारंभ समाप्त- 20 जुलाई 11.02 PM तक

सोमवती अमावस्या से दूर होते हैं अशुभ योग

किसी भी माह में सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन खासकर पूर्वजों को तर्पण किया जाता है। इस दिन उपवास करते हुए पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर शनि मंत्र का जाप करना चाहिए और पीपल के पेड़ के चारों ओर 108 बार परिक्रमा करते हुए भगवान विष्णु तथा पीपल वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। खासकर यह व्रत महिलाओं द्वारा संतान के दीर्घायु रहने की लिए की जाती है। 
 सोमवती अमावस्या के उपाय
– सोमवती अमावस्या के दिन तुलसी की 108 परिक्रमा करने से दरिद्रता मिटती है।
– इसके बाद क्षमता के अनुसार दान किया जाता है।
– सोमवती अमावस्या के दिन स्नान और दान का विशेष महत्त्व है।
– इस दिन मौन भी रखते हैं, इस कारण इसे मौनी अमावस्या भी कहा जाता है।
– माना जाता है कि सोमवती अमावस्या के दिन मौन रहने के साथ ही स्नान और दान करने से  हजार गायों के दान करने के समान फल मिलता है।
 
सोमवती अमावस्या व्रत कथा
सोमवती अमावस्या की पौराणिक कथा के मुताबिक एक व्यक्ति के सात बेटे और एक बेटी थी। उसने अपने सभी बेटों की शादी कर दी लेकिन, बेटी की शादी नहीं हुई। एक भिक्षुक रोज उनके घर भिक्षा मांगने आते थे। वह उस व्यक्ति की बहूओ को सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद तो देता था लेकिन उसने उसकी बेटी को शादी का आशीर्वाद कभी नहीं देता। बेटी ने अपनी मां से यह बात कही तो मां ने इस बारे में भिक्षु से पूछा, लेकिन वह बिना कुछ कहे वहां से चला गया। इसके बाद लड़की की मां ने एक पंडित से अपनी बेटी की कुंडली दिखाई। पंडित ने कहा कि लड़की के भाग्य में विधवा बनना लिखा है। मां ने परेशान होकर उपाय पूछा तो उसने कहा कि लड़की सिंघल द्वीप जाकर वहां रहने वाली एक धोबिन से सिंदूर लेकर माथे पर लगाकर सोमवती अमावस्या का उपवास करे तो यह अशुभ योग दूर हो सकता है। इसके बाद मां के कहने पर छोटा बेटा अपनी बहन के साथ सिंघल द्वीप के लिए रवाना हो गया। रास्ते में समुद्र देख दोनों चिंतित होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उस पेड़ पर एक गिद्ध का घोंसला था। मादा गिद्ध जब भी बच्चे को जन्म देती थी, एक सांप उसे खा जाता था। उस दिन नर और मादा गिद्ध बाहर थे और बच्चे घोसले में अकेले थे। इस बीच सांप अाया तो गिद्ध के बच्चे चिल्लाने लगे। यह देख पेड़ के नीचे बैठी साहूकार की बेटी ने सांप को मार डाला। जब गिद्ध और उसकी पत्नी लौटे, तो अपने बच्चों को जीवित देखकर बहुत खुश हुए और लड़की को धोबिन के घर जाने में मदद की। लड़की ने कई महीनों तक चुपचाप धोबिन महिला की सेवा की। लड़की की सेवा से खुश होकर धोबिन ने लड़की के माथे पर सिंदूर लगाया। इसके बाद रास्ते में उसने एक पीपल के पेड़ के चारों ओर घूमकर परिक्रमा की और पानी पिया। उसने पीपल के पेड़ की पूजा की और सोमवती अमावस्या का उपवास रखा। इस प्रकार उसके अशुभ योग का निवारण हो गया। 


Saturday, 18 July 2020

अगर घर में है तुलसी का पोधा तो रखे इन विशेष बातों का धयान

हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। तुलसी का पौधा 5 प्रकार का होता है:

1. श्याम तुलसी
2. राम तुलसी
3. विष्णु तुलसी
4. वन तुलसी और
5. नींबू तुलसी।

तुलसी का पत्ता तोड़ने के नियम भी हैं। ऐसा नहीं है कि आप तुलसी जी के पौधे के पास गए और तोड़ दिया पत्ता। तुलसी जी का पौधा पूजन के लिए होता है। अगर देखा जाए तो तुलसी का एक रूप लक्ष्मी का भी है या यूं मानें कि तुलसी जी कोई पौधा नहीं है अपितु तुलसी जी राधा जी का अवतार हैं इसलिए तुलसी जी का पत्ता तोडऩे और घर में तुलसी जी को रखने के नियम हैं।

रविवार, शुक्रवार, एकादशी, अमावस्या, चौदस तिथि, ग्रहण और द्वादशी को तुलसी का पत्ता नहीं तोडऩा चाहिए।

रविवार और एकादशी को तुलसी जी को जल अर्पण नहीं करना चाहिए।

तुलसी का पत्ता कभी भी नाखून से नहीं तोडऩा चाहिए।

तुलसी के पौधे से गिरे हुए पत्तों का प्रयोग औषधि अथवा अन्य  क्रियाओं में करना चाहिए या गिरे हुए पत्तों को मिट्टी में दबा देना चाहिए।

बिना किसी विशेष कारण के तुलसी का पत्ता नहीं तोडऩा चाहिए।

तुलसी जी का पत्ता तोड़ने से पूर्व इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए: 

‘मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानंद कारिणी।

नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते