Thursday, 24 October 2019

रमा एकादशी


भगवान विष्णु के प्रिय और दान-पुण्य, जप-तप के लिए परम पावन कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी रमा एकादशी के नाम से जानी जाती है। इस वर्ष रमा एकादशी 24 अक्टूबर 2019 गुरुवार को आ रही है। इस दिन भगवान विष्णु का पूजन और भागवत महापुराण का पाठ करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है और उसके जीवन में मधुरता आती है। इस एकादशी के प्रभाव से व्यक्ति के पूर्व जन्मों के पाप भी नष्ट होते हैं और इस जन्म में मृत्यु के पश्चात उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। इस एकादशी को रंभा एकादशी भी कहा जाता है। माना जाता है कि सूर्य-चंद्र ग्रहण के दौरान गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह इस व्रत के दिन भगवान विष्णु के पूजन मात्र से प्राप्त हो जाता है। रमा एकादशी करने से मनुष्य को कुयोनियां प्राप्त नहीं होती है। इस एकादशी की पूजा में तुलसी का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

रमा एकादशी व्रत कथा


रमा एकादशी के संबंध में पुराणों में कथा मिलती है। उसके अनुसार एक समय मुचुकुंद नाम का राजा था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। इंद्र, वरुण, कुबेर और विभीषण आदि उसके मित्र थे। राजा बड़ा दयालु था और अपनी प्रजा का हर तरह से ध्यान रखता था। प्रजा भी राजा को बहुत पसंद करती थी। एक समय राजा के घर में एक कन्या ने जन्म लिया। कन्या का नाम चंद्रभागा रखा गया। पुत्री के युवा होने पर राजा ने उसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन के साथ कर दिया। जब चंद्रभागा अपने ससुराल में थी, तो एक एकादशी का व्रत आया। वह भी एकादशी का व्रत करने की कामना करती है, लेकिन उसका पति सोभन इस व्रत को करने में शारीरिक रूप से अक्षम था। वह अत्यंत कमजोर था इस कारण पत्नी को भी व्रत न करने के बारे में कहता। इस बात से चंद्रभागा बड़ी परेशान रहती थी। उसकी व्रत करने की बड़ी इच्छा रहती, इसलिए वह अपने पति को उस एक दिन के लिए किसी अन्य स्थान पर चले जाने को कहती है, ताकि वह सुखपूर्वक व्रत कर सके। पत्नी की यह बात सुनकर सोभन कहता है कि तब तो मैं यही रहूंगा और व्रत अवश्य ही करूंगा। इस प्रकार दोनों पति पत्नी एकादशी का व्रत करते हैं। व्रत में वह भूख प्यास से पीड़ित होने लगा और उसकी मृत्यु हो गई।


भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखें


राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल में प्रवाहित करा दिया और अपनी पुत्री को आज्ञा दी कि वह सती न हो और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखे। चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार पिता के घर में रहकर एकादशी के व्रत करने लगी। उधर रमा एकादशी के प्रभाव से सोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से वह जीवित हो उठा और उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ। उसे वहां का राजा बना दिया गया। किंतु वह नगर अस्थिर था और सोभन उस नगर से बाहर नहीं जा सकता था। उन्हीं दिनों मुचुकुंद नगर में रहने वाला सोम शर्मा नाम का एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला। घूमते हुए वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। वह ब्राह्मण सोभन को पहचान गया और उसको राजा का जमाई जानकर उसके निकट गया। राजा सोभन ब्राह्मण को देख आसन से उठ खड़ा हुआ और अपने ससुर तथा पत्नी चंद्रभागा की कुशलक्षेम पूछने लगा। सोभन की बात सुन सोम शर्मा ने कहा कि हे राजन हमारे राजा कुशल से हैं तथा आपकी पत्नी चंद्रभागा भी कुशल है। अब आप अपना वृत्तांत बतलाइए। आपने तो रमा एकादशी के दिन अन्न् जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको किस प्रकार प्राप्त हुआ।


कार्तिक माह की रमा एकादशी के व्रत का फल

इस पर सोभन ने कहा हे देव यह सब कार्तिक माह की रमा एकादशी के व्रत का फल है। किंतु यह अस्थिर है और मैं यहां से बाहर नहीं जा सकता। ब्राह्मण बोला राजन यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है। सोभन ने कहा ब्राह्मण देव मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ परंतु यदि तुम इस वृत्तांत को राजा मुचुकुंद की पुत्री चंद्रभागा से कहोगे तो वह इसको स्थिर बना सकती है। सोभन की बात सुन ब्राह्मण अपने नगर को लौट आया और उसने चंद्रभागा से सारा वाक्या सुनाया। चंद्रभागा बोली मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी। चंद्रभागा के वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चंद्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चंद्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई। सोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा को देखकर उसे प्रसन्न्तापूर्वक आसन पर अपने पास बैठा लिया। चंद्रभागा ने कहा हे स्वामी अब आप मेरे पुण्य को सुनिए जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी तभी से मैं सविधि एकादशी का व्रत कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। चंद्रभागा के व्रत के फलस्वरूप न केवल वह नगर स्थिर हुआ बल्कि वह अपने पति साथ सुखपूर्वक रहने लगी।


Wednesday, 16 October 2019

करवा चौथ की व्रत कथा

करवा चौथ पर्व पर इस बार खास संयोग का योग है। महिलाएं इस दिन रोहिणी और मंगल नक्षत्र में व्रत-पूजन कर पति की दीर्घायु की कामना करेंगी। यह शुभ संयोग सुहागिनों के लिए फलदायी रहेगा।


ज्योतिषाचार्य पं. दिवाकर त्रिपाठी पूर्वांचली के अनुसार गुरुवार को सूर्योदय 6:17 बजे होगा और चतुर्थी तिथि का मान पूरा दिन और रात्रिशेष 5:28 बजे तक रहेगा। कृतिका नक्षत्र योग दिन में 3:25 बजे तक रहेगा। इसके बाद रोहिणी नक्षत्र, योग व्यतिपात और वरियान दोनों है। चंद्रमा वृषभ राशि में उच्च स्थिति में रहेगा। यह योग प्रेम को समृद्ध करेगा। महिलाएं निर्जला व्रत रखकर व सोलह शृंगार कर चंद्रमा को अर्घ्य देंगी। इस दिन करवा चौथ व्रत की कथा भी सुननी चाहिए: यहां पढ़ें व्रत की कथा:

करवा चौथ की व्रत कथा-
करवा चौथ की कथा इंद्रप्रस्थ नगरी के वेदशर्मा नामक ब्राह्मण परिवार की पुत्री से जुड़ी है। सात भाइयों में अकेली बहन वीरावती का विवाह सुदर्शन नामक ब्राह्मण के साथ हुआ। वीरावती ने एक बार करवा चौथ का व्रत अपने मायके में किया। पूरे दिन निर्जल रहने के कारण वह निढाल हो गई। उसके भाइयों से उसकी यह दशा नहीं देखी गई। उन्होंने खेत में आग लगा कर समय से पहले ही नकली चांद उदय करा दिया। 

वीरावती की भाभियों ने उसे चांद निकलने की बात बता कर अर्घ्य दिलवा दिया। उसके बाद से वीरावती का पति लगातार बीमार रहने लगा। उसने इंद्र की पत्नी इंद्राणी का पूजन कर उनसे समाधान मांगा। उन्होंने व्रत के खंडित होने की बात बताई और पुन: विधि विधान से व्रत करने की सलाह दी। वीरावती ने वैसा ही किया। इससे उसका पति ठीक हो गया। उसी समय से यह व्रत लोक प्रचलन में आ गया।

Tuesday, 15 October 2019

इन 5 कामों के बिना आपका करवा चौथ रह जाएगा अधूरा

क्यों है करवा चौथ इतना महत्वपूर्ण...


करवा चौथ उत्तर भारतीय स्त्रियों के लिए एक बेहद ही ख़ास त्योहार है। भारत में इस व्रत को खासकर पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाती है। ये व्रत सिर्फ धार्मिक कारणों और मान्यताओं के लिए ही नहीं बल्कि पति-पत्नी के आपसी प्रेम और समर्पण का भी त्योहार है। करवा चौथ पति की लंबी आयु के लिए रखा जाने वाला व्रत है। 


क्या है इस व्रत का महत्त्व
सब लोग ये तो जानते हैं कि इस व्रत को पत्नियां अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए रखती हैं लेकिन क्या आप इसके महत्त्व के बारे में जानते हैं। मान्यताओं के मुताबिक और छांदोग्य उपनिषद के अनुसार करवा चौथ के दिन व्रत रखने वाली चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इससे जीवन के सभी तरह के कष्टों का निवारण तो होता ही है साथ ही लंबी उम्र भी प्राप्त होती है। करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणोश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य देकर पूजा होती है। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल,उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री रखकर सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर सुहाग सामग्री भेंट करनी चाहिए।

व्रत के बारे में महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले गए। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। अर्जुन की पत्नी द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। तभी उनके सखा श्रीकृष्ण उन्हें कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करने के बारे में बताते हैं, जिससे अर्जुन के सभी कष्ट दूर होगें। श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए विधि विधान से द्रौपदी करवाचौथ का व्रत रखती हैं जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है। यह व्रत यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।

व्रत के बारे में महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले गए। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। अर्जुन की पत्नी द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। तभी उनके सखा श्रीकृष्ण उन्हें कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करने के बारे में बताते हैं, जिससे अर्जुन के सभी कष्ट दूर होगें। श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए विधि विधान से द्रौपदी करवाचौथ का व्रत रखती हैं जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है। यह व्रत यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।


1. बहू को सरगी देना है बेहद ज़रूरी

ससुराल से मिलने वाली सरगी करवा चौथ के व्रत का सबसे ज़रूरी हिस्सा होती है। बता दें की व्रत शुरू होने से पहले हर सास अपनी बहू को कुछ मिठाइयां, कपड़े और श्रृंगार का सामान देती हैं, इसे ही सरगी कहा जाता है। करवा चौथ के दिन सूर्योदय होने से पहले सुबह लगभग चार बजे के आस-पास महिलाएं इसी सरगी को खाकर अपने व्रत की शुरुवात करती हैं। 


2. बेटी के घर बाया भेजती हैं मां

बता दें कि जिस तरह तरह सास का अपनी बहू को देती है उसी तरह बाया, मां और बेटी से जुड़ी रस्म है। हर करवा चौथ पर शाम को चौथ माता की पूजा शुरू होने से पहले हर मां अपनी बेटी के घर कुछ मिठाइयां, तोहफे और ड्राई फ्रूट्स भेजती है। इसे बाया कहा जाता है। ध्यान रखें बाया पूजा शुरू होने से पहले ही पहुंचाया जाना शुभ होता है।



3. कथा सुनना भी है ज़रूरी

करवा चौथ में जितना महत्व व्रत और पूजा का है उतना ही महत्व करवा चौथ की कथा सुनने का भी है। अक्सर ये देखा जाता है कि कई महिलाओं को कथा सुनने में रुचि नहीं होती और इसी वजह से वे कथा में अपना ध्यान नहीं लगातीं। हालांकि बिना कथा सुने आपका इस व्रत को रखने का कोई फायदा नहीं है। इस त्योहार में जितना जरूरी व्रत और पूजा करना होता है, उतना ही जरूरी कथा सुनना भी होता है। इसलिए सभी महिलाओं को एकचित्त होकर कथा सुननी चाहिए और अगर कथा नहीं सुननी है तो व्रत से भी परहेज करना चाहिए। 


करवा चौथ के गीत भी गाएं

करवा चौथ की पूजा के लिए आस-पास की सभी महिलाएं एक जगह मिलकर व्रत कथा सुनती हैं और पूजा करती हैं। ऐसे में पूजा के समय ही करवा चौथ के गीत और भजन गाए जाते हैं, इनमें हिस्सा लेना भी कथा सुनने के जितना ही महत्वपूर्ण है। ऐसा करने से वातावरण शुद्ध होता है और पूजा का पूरा फल प्राप्त होता है।


लाल साड़ी या लहंगा ही पहनें

ये तो सभी जानते हैं कि करवा चौथ का व्रत महिलाओं के वैवाहिक जीवन से जुड़ा होता है। इसलिए ये कहा जाता है कि महिलाओं को इस दिन अपनी शादी का जोड़ा पहनना चाहिए। अगर किसी के पास शादी का जोड़ा नहीं है तो उसे लाल रंग की साड़ी या लहंगा पहनना चाहिए। असल में मान्यताओं के मुताबिक लाल रंग को प्रेम का प्रतीक माना जाता है। करवा चौथ के दिन जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके इसी रंग का प्रयोग करना चाहिए।









Monday, 14 October 2019

घरेलु टोटके और उपाय

(1) अपने आस पास रहने वाले भूखे व्यक्ति और जीव जन्तुओ को उनके प्रिय भोजन कराये | वे उस भोजन से जैसे जैसे संतुष्ट होंगे आपका भाग्य वैसे ही चमकने लगेगा |

( 2 ) व्यक्ति को नशे की लत , माँस और तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए | अच्छे विचार के साथ जीवन जीना चाहिए | अपने गुस्से और वाणी पर नियंत्रण रखे |


(3 ) घर से जब भी काम के लिए निकले , अपने आराध्य से अच्छे और मंगल दिन की कामना करे |


(4) किसी मंदिर में जाकर करे | वहा किसी जरूरतमंद को भोजन कराये , वस्त्र दे और पाने चप्पल भी जरुर दान दे | इसके आपका दुर्भाग्य भी चलता बनेगा |


कैसे लाये लक्ष्मी 

यदि घर की मालकिन सुबह उठाकर सबसे पहले अपने आँगन को धोती है , तो यह लक्ष्मी माँ को घर में आने का निमंत्रण होता है 

|घरेलु टोटके और उपाय

(1) कभी भी अग्नि और जल को लांघे नही | यह देवता समान है |

(2) किसी निर्जन जगह या जंगल में किसी भी पेड़ के ऊपर पेशाब ना करे |

(3) हाथ से गिरा हुआ और जमीन पर पड़ा हुई खाने की चीज को ना तो खुद खाए और ना ही दुसरो को खाने दे |

(4) महिलाओ को पीरियड के समय चौराहे से दूर रहना चाहिए वरन उन्हें काली शक्तियाँ मिल सकती है |

(5) पीपल , मेहंदी , बरगद के पेड़ के निचे संध्या के बाद कोई मीठी चीज नही खानी चाहिए |

(6) अन्न का कभी अपमान ना करे |

(7) अमावस्या के दिन अच्छे से घर की सफाई करे और सुबह और शाम को गूगल की धुप से घर में खुशबु फैलाये | यह लाल किताब का उपाय घर को बीमारी से दूर रखता है |

(8) घर के अग्नि कोन में पानी की कोई टंकी नही होनी चाहिए | यह जगह वास्तु शास्त्र से अग्नि देव की है | यहा आप लाल रंग का हमेशा बल्ब जला करे रखे |

Thursday, 10 October 2019

माँ सृष्टि-देवी के बीज मंत्रो से उपचार!

🌹 *खं*– हार्ट-टैक कभी नही होता है | उच्च रक्तचाप (हाई बी.पी.), निम्न रक्तचाप (लो बी.पी.) कभी नही होता | * ५० माला जप करें, तो लीवर ठीक हो जाता है | १०० माला जप करें तो शनि देवता के ग्रह का प्रभाव चला जाता है |

बीज मंत्रो से उपचार! * कां, * गुं, * शं

🌹 *कां*– पेट सम्बन्धी कोई भी विकार और विशेष रूप से आंतों की सूजन में लाभकारी। 🌹 *गुं*– मलाशय और मूत्र सम्बन्धी रोगों में उपयोगी। 🌹 *शं*– वाणी दोष, स्वप्न दोष, महिलाओं में गर्भाशय सम्बन्धी विकार औेर हर्निया आदि रोगों में उपयोगी ।

बीज मंत्रो से उपचार! * घं, * ढं

🌹 *घं* – काम वासना को नियंत्रित करने वाला और मारण-मोहन-उच्चाटन आदि के दुष्प्रभाव के कारण जनित रोग-विकार को शांत करने में सहायक।🌹 *ढं*– मानसिक शांति देने में सहायक। अप्राकृतिक विपदाओं जैसे मारण, स्तम्भन आदि प्रयोगों से उत्पन्न हुए विकारों में उपयोगी।

बीज मंत्रो से उपचार! * पं, * बं, * यं, * रं

🌹 *पं*– फेफड़ों के रोग जैसे टी.बी., अस्थमा, श्वास रोग आदि के लिए गुणकारी। 🌹 *बं*– शूगर, वमन, कफ, विकार, जोडों के दर्द आदि में सहायक। 🌹 *यं*– बच्चों के चंचल मन के एकाग्र करने में अत्यत सहायक। 🌹 *रं* – उदर विकार, शरीर में पित्त जनित रोग, ज्वर आदि में उपयोगी।


बीज मंत्रो से उपचार! * लं, * मं, * घं, * एं

🌹 *लं*– महिलाओं के अनियमित मासिक धर्म, उनके अनेक गुप्त रोग तथा विशेष रूप से आलस्य को दूर करने में उपयोगी।*🌹मं*– महिलाओं में स्तन सम्बन्धी विकारों में सहायक।*🌹धं* – तनाव से मुक्ति के लिए मानसिक संत्रास दूर करने में उपयोगी ।*🌹ऐं*– वात नाशक, रक्त चाप, रक्त में कोलेस्ट्राॅल, मूर्छा आदि असाध्य रोगों में सहायक।

बीज मंत्रो से उपचार! * द्वान्, * ह्रीं, * एं, * वं, * शुं

*🌹द्वां*– कान के समस्त रोगों में सहायक।*🌹ह्रीं*– कफ विकार जनित रोगों में सहायक।*🌹ऐं*– पित्त जनित रोगों में उपयोगी।*🌹वं*– वात जनित रोगों में उपयोगी।*🌹शुं*– आंतों के विकार तथा पेट संबंधी अनेक रोगों में सहायक ।


बीज मंत्रो से उपचार! * हुं, * अं, *

*🌹हुं*– यह बीज एक प्रबल एन्टीबॉयटिक सिद्ध होता है। गाल ब्लैडर, अपच, लिकोरिया आदि रोगों में उपयोगी।*🌹अं* – पथरी, बच्चों के कमजोर मसाने, पेट की जलन, मानसिक शान्ति आदि में सहायक इस बीज का सतत जप करने से शरीर में शक्ति का संचार उत्पन्न होता है।


सावधानियां...

बीज मंत्रों से अनेक रोगों का निदान सफल है। आवश्यकता केवल अपने अनुकूल प्रभावशाली मंत्र चुनने और उसका शुद्ध उच्चारण करने की है। पौराणिक, वेद, शाबर आदि मंत्रों में बीज मंत्र सर्वाधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं उठते-बैठते, सोते-जागते उस मंत्र का सतत् शुद्ध उच्चारण करते रहें। आपको चमत्कारिक रुप से अपने अन्दर अन्तर दिखाई देने लगेगा। यह बात सदैव ध्यान रखें कि बीज मंत्रों में उसकी शक्ति का सार उसके अर्थ में नहीं बल्कि उसके विशुद्ध उच्चारण को एक निश्चित लय और ताल से करने में है। बीज मंत्र में सर्वाधिक महत्व उसके बिन्दु में है और यह ज्ञान केवल वैदिक व्याकरण के सघन ज्ञान द्वारा ही संभव है। आप स्वयं देखें कि एक बिन्दु के तीन अलग-2 उच्चारण हैं। गंगा शब्द ‘ङ’ प्रधान है। गन्दा शब्द ‘न’ प्रधान है। गंभीर शब्द ‘म’ प्रधान है। अर्थात इनमें क्रमशः ङ, न और म, का उच्चारण हो रहा है।


Tuesday, 8 October 2019

चांडाल को भी होता है ,श्री जगन्नाथ रथ को खींचने का अधिकार

श्री जगदीश रथ यात्रा का विशेष महत्व है। पुण्य नक्षत्र में सुभद्रा समेत भगवान जगन्नाथ व बलराम के रथ निकालने का विधान है। वैसे तो यह यह पर्व देशभर में मनाया जाता है, लेकिन जगन्नाथ पुरी में यह पर्व मनाने का विशेष महत्व है। इस पर्व का विशेष सम्बन्ध भी जगन्नाथपुरी से ही है।

जगन्नाथपुरी भारत के चार धामों में से एक है। यह मंदिर भारतीय शिल्पकला की अनूठी मिसाल है। ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण विश्वकर्मा जी ने किया था। इस तीर्थ की विशेषता यह है कि यहां जातीय बंधनों का बिल्कुल भी पालन नहीं किया जाता है।

इस मंदिर की देव प्रतिमाओं को वर्ष में एक बार मंदिर के बाहर लाया जाता है और नगर की रथयात्रा कराई जाती है। रथ खींचने का अधिकार चांडाल तक को भी होता है। जगन्नाथ पुरी में जगतगुरु शंकराचार्य द्बारा स्थापित गोवर्धन पीठ भी है। इसके अतिरिक्त वैष्णव, शैव, शाक्य आदि सभी सम्प्रदायों के मठ यहां मौजूद हैं। रथ यात्रा के दिन देश के कोने-कोने से लोग एकत्र होकर यहां पहुंचते हैं। जगन्नाथ जी का रथ 45 फीट ऊंचा, 35 फीट लम्बा और इतना ही चौड़ा होता है। इसमें सात फीट व्यास के 16 पहिये होते हैं। बलभद्र जी का रथ 44 फीट ऊंचा होता है, जिसमें 12 पहिये होते हैं। सुभद्रा जी का रथ 43 फीट ऊंचा होता है। इसमें भी 12 पहिये होते हैं। ये रथ हर वर्ष बनाए जाते हैं। मंदिर के सिंह द्बार पर बैठेकर भगवान जनकपुरी की ओर रथ यात्रा करते हैं।

इन रथों को खींचने वाले मनुष्यों की संख्या करीब 42 हजार होती है। जनकपुरी पहुंचकर तीन दिन तक भगवान वहीं ठहरते हैं। वहां उनकी भेंट लक्ष्मी जी से होती है। इसके पश्चात लौटकर भगवान फिर जगन्नाथ पुरी में आसन पर सुशोभित होते है। यह रथ यात्रा हर वर्ष पारम्परिक रूप से निकाली जाती है।




Monday, 7 October 2019

मां सिद्धिदात्री की पूजा

शारदीय नवरात्रि की नवमी को महानवमी के नाम से जाना जाता है और इस दिन होती है मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा। मां के इस अंतिम स्वरूप की पूजा करके उन्हें विदाई दी जाती है।

वहीं दूसरी ओर महानवमी के दिन छोटी- छोटी कन्याओं को मां का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें उपहार आदि दिए जाते हैं। इसके बाद उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन ऐसा करने से मां की कृपा प्राप्त होती है

ऐसा है मां सिद्धिदात्री का स्वरूप

नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है इनका वाहन सिंह हैं। देवी सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर भी विराजमान है।

मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण से ही भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर कहलाए।

दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। इसलिए मां का यह रूप अत्यंत ही मोहक है।

माना जाता है कि मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

मां सिद्धिदात्री की पूजा पूरे विधि-विधान से की जानी चाहिए और इनकी पूजा में किसी तरह की कोई गलती भी नहीं होनी चाहिए ताकि पूजा का पूरा फल मिल सके।

ऐसे करें मां सिद्धिदात्री की पूजा

-महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह नवरात्रि का आखिरी दिन होता है। इस दिन मां का पूजन करके उन्हें विदाई दी जाती है।

- सबसे पहले साधक को शुद्ध होकर साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद एक चौकी पर मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। - इसके बाद मां को फल, फूल, माला, नैवेद्य आदि अर्पित करने चाहिए और मां कि विधिवत पूजा करनी चाहिए। अंत मे मां कि आरती उतारें।

- इस दिन कन्या पूजन को विशेष महत्व दिया जाता है। छोटी- छोटी नौ कन्याओं को घर बुलाकर उनका भी पूजन करें और उन्हें उपहार अवश्य दें।

- अंत में पैर छुकर उनका आर्शीवाद लें । ब्राह्मण और गाय को भी इस दिन भोजन अवश्य कराएं।
आप सभी परिवार को नवरात्रि पर्व नवमा दिन की हार्दिक शुभकामनाएं है

Saturday, 5 October 2019

मां महागौरी पूजा

नवरात्रि नौ दिन का पर्व होता है. इसमें हर दिन मां देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है. साल में दो बार नवरात्रि मनाई जाती है, लेकिन शारदीय नवरात्रि का खास महत्व होता है. इस साल शारदीय नवरात्री 29 सितंबर से शुरू हो रही है और 7 अक्टूबर तक चलेगी. हम आपको माता के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा अराधना के बारे में बता रहे हैं, जिसका काफी महत्व होता है.

हिंदू धर्म में नवरात्रि का काफी महत्व माना जाता है. नवरात्रि नौ दिन का उत्सव है, जिसे बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है. नवदुर्गे के दौरान मां देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के त्यौहार को साल में दो बार मनाया जाता है जिसे चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि कहा जाता है. शारदीय नवरात्रि को महानवरात्रि भी कहा जाता है. शारदीय नवरात्रि का खास महत्व होता है. इस साल शारदीय नवरात्री 29 सितंबर से शुरू हो रही है और 7 अक्टूबर तक चलेगी. इसके बाद 8 अक्टूबर को माता के विसर्जन के साथ ही नवरात्रि समाप्त हो जाएगी.u

आपको बता दें कि नवरात्रि के आठवें दिन यानि अष्टमी का खास महत्व होता है. दुर्गा अष्टमी का व्रत करने से सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है और धन-धान्य की प्राप्ति होती है. दुर्गा अष्टमी इसलिए भी खास है क्योंकि कि इसमें दुर्गा माता के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा होती है. माता महागौरी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। 

माता पार्वती को क्यों कहते हैं महागौरी
माता महागौरी ने दो बार कठोर तपस्या की. पहले उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी. इस कारण वह शारीरिक रूप से कमजोर हो गईं थी. शिव जी को पाने के बाद माता ने दोबारा अपने स्वास्थ्य और सौंदर्य को पाने के लिए फिर से तपस्या की. इस तपस्या के बाद माता पार्वती गौरवर्ण हो गईं, इसलिए इनका नाम महागौरी पड़ा.

जानिए क्यों नवरात्र के आठवें दिन होती है मां महागौरी पूजा
माता जब 8 वर्ष की बालिका थीं, तब देव मुनि नारद ने इन्हें इनके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया. फिर माता ने शिवजी को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या की. इसलिए इन्हें शिवा भी कहा जाता है. सिर्फ 8 साल की आयु में घोर तपस्या करने के लिए इनकी पूजा नवरात्रि के आठवें दिन की जाती है.

माता महागौरी की पूजा विधि
अष्टमी के दिन मां दुर्गा की पूरे विधिविधान से पूजा करनी चाहिए. इस दिन हवन का महत्त्व बताया गया है. पूजा करने के बाद ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन करा कर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए. महागौरी की पूजा के लिए नारियल, पूड़ी और सब्जी का भोग लगाया जाता है. हलवा और काले चने का प्रसाद बनाकर माता को विशेष भोग लगाया जाता है. माता महागौरी की पूजा करते समय गुलाबी रंग का वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है. क्योंकि माता गौरी ग्रहस्थ आश्रम की देवी हैं और गुलाबी रंग प्रेम का प्रतीक है.

माता महागौरी का मंत्र
श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

 


मां कालरात्रि

माँ कामकलाकाली का दुर्लभ गद्य सहस्त्रनाम स्तोत्र अर्थ सहित ।

आज सप्तम नवरात्रि पर मां कालरात्रि का श्रीमद् आदिनाथ द्वारा रचित बहुत ही दुर्लभ माँ कामकलाकाली के सहस्त्र नाम का मंत्ररूप गद्य प्रस्तुत है । इसका प्रभाव यह है कि इस भौतिक संसार में ऐसा कोई कार्य नही है जो पूर्ण न हो सकता हो । इसके अर्थ को समझते हुए बहुत ही विनीत भाव से माँ का ध्यान कर इसका पाठ करे, तो मनोवांछित प्रत्येक फल संभव है । इसके साथ में अर्थ भी स्पष्ट किया हुआ है ताकि आपको अपूर्णता का अहसास न हो ।

महाकाल ने कहा- हे महेशानि! अब में संजीवन के रुप में स्थित एवं महापाप नाशक गद्य-सहस्त्रनाम को बताऊंगा जिसे पढने वाला व्यक्ति हे प्रिये! प्राक्तन समस्त जन्मो को सफल बना लेता है तथा नही पढने वाले का समस्त जन्मकर्म विफल रहता है, उस पाठ को में तुमसे कह रहा हूँ ।

पाठ-
ॐ फ्रें जय जय कामकलाकालि कपालिनि सिद्धि-करालि, सिद्धि-विकरालि, महा-बलिनि, त्रिशुलिनि, नर-मुंड-मालिनि, शव-वाहिनि, कात्यायिनि, महाsटटाहासिनि, सृष्टि-स्थिति-प्रलय कारिणि, दिति-दनुज-मारिणि, श्मशान-चारिणि । महाघोररावे अध्यासित-दावे, अपरिमित-बल-प्रभावे । भैरवी-योगिनि-डाकिनी सह-वासिनि जगद्धासिनि स्व-पद-प्रकाशिनि । पापौघ-हारिणि आपदुद्धारिणि अप-मृत्यू-वारिणि । बृहन्मद्य-मानोदरि, सकल-सिद्धिकरि चतुर्दश-भुवनेश्वरि । गुनातीत-परम-सदाशिव मोहिनि अपवर्ग-रस-दोहिनि, रक्तार्णव-लोहिनि । अष्ट-नागराज भूषित-भुजदण्डे आकृष्ट-कोदण्डे परम-प्रचण्डे । मनोवागगोचरे मुखकोटि मंत्रमय कलेवरे ।महाभीषण-तरे प्रचल-जटाभार-भास्वरे सजल-जलद-मेदुरे जन्म-मृत्यु-पाशभिदुरे सकल-दैवत-मय-सिंहासनाधिरूढ़े । गुह्याति-गुह्य-परापर-शक्तितत्तरूढ़े वांगमयी-कृतमूढ़े । प्रकृत्य-पर-शिव-निर्वाण-साक्षिणि, त्रिलोकीरक्षिणि दैत्यदानव भक्षिणि । विकट-दीर्घ-दंष्ट्र-संचूर्णित-कोटिब्रह्मकपाले, चन्द्र-खण्डांकितभाले देहप्रभाजित-मेघजाले । नवपंचचक्र-नयिनि महाभीमषोडश-शयिनि, सकल कुलाकुल चक्र-प्रवर्तिनि, निखिल-रिपुदल-कर्त्तिनि महामारी-भय-निवर्त्तिनि, लेलिहान-रसना करालिनि त्रिलोकीपालिनि त्रय-स्त्रिंशत्कोटि-शस्त्रास्त्रशालिनि । प्रज्वल-प्रज्वलन-लोचने, भवभयमोचने निखिलागमादेशित रोचने । प्रपंचातीत-निष्कल-तुरीयाकारे, अखण्डाsनंदाधारे निगमागमसारे । महाखेचरीसिद्धिविधायिनि निजपदप्रदायिनि घोराट्टाहास संत्रासित त्रिभुवने चरणकमलद्वयविन्यास खर्वी-कृतावने विहितभक्तावने ।

अर्थ:- ॐ फ्रें जय जय कामकलाकालि, अपने हाथ में कपाल धारण करने वाली, सिद्धिकराली, सिद्धिविकराली, महाबलशाली, त्रिशुलिनी, नरमुंडो की माला धारण करने वाली, शव पर आरूढ़, कत गोत्र में प्रकटी, महा अट्टहास करने वाली, सृष्टि-स्थिति-प्रलय करने वाली, दैत्यों और दानवों का विध्वंस करने वाली, श्मशान में विचरण करने वाली, अपने तेजोमय रुप से महाघोर शब्द उत्पन्न करने वाली, दावाग्नि का अहसास कराने वाली, अपरिमित बल और अपरिमित प्रभाव वाली, भैरवी, योगिनी और डाकिनी के साथ रहने वाली विश्व को प्रसन्न रखने वाली, अपने पद को प्रकाशित करने वाली, पाप-समूह को नष्ट करने वाली, आपत्ति से उद्धार करने वाली, अपमृत्यु को दूर करने वाली, विस्तारित एवं मद से पूर्ण उदर वाली, समस्त सिद्धि प्रदान करने वाली, चौदह भुवनो की स्वामिनी, गुनातीत भगवान परम शिव को आकर्षित करने वाली, मुक्तिरस का दोहन करने वाली, खून के रंग के समान लाल वर्ण वाली, अपनी भुजाओ में आठ नागराज धारण करने वाली, धनुष खीचकर तैयार रखने वाली, परम प्रचण्ड मन और वाणी की अगोचर, करोडो यज्ञ एवं मंत्रमय देह वाली, महाभीषण, चलती हुई जटा के भार से काले बादलों के समान प्रतीत होती काली, जीवन-मृत्यु के पाश से विमुक्त करने वाली, सभी देवों से युक्त सिंहासन पर विराजित, गुह्य-अतिगुह्य, पर-अपर शक्ति तत्व वाली, मुर्ख को वक्ता बना देने वाली, प्रकृति एवं अपर शिव के निर्वाण की साक्षी, त्रेलोक्य की रक्षक, दैत्य और दानवों का भक्षण करने वाली, विकट एवं लम्बे दांतों से करोडो ब्रह्मा के कपालों को चूर्ण कर देने वाली, भाल पर चंद्रखंड से सुशोभित, शरीर की कान्ति से बादलों की चमक को पराजित कर देने वाली, चौदह चक्र, नव चक्र और पांच चक्रों की अधिष्ठात्री, षोडश मातृकाओं की आधारभूता, समस्त कुल-अकुल चक्र का प्रारंभ करने वाली, समस्त शत्रुओं की नाशक, महामारी के डर को हटाने वाली, लपलपाती हुई जीभ के कारण भयंकर, त्रिजगत की पालनहारा, तैंतीस करोड़ अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित, जलती अग्नि जैसे नेत्रों वाली, भवभय से मुक्त करने वाली, समस्त आगमों में रूचि रखने वाली, प्रपंच से परे निष्कल तुरीय आकार वाली, अखण्ड आनंद की आधार, निगम और आगम की सार, महाखेचरी की सिद्धि प्रदान करने वाली, अपना पद प्रदान करने वाली, महामायाविनी, घोर अट्टाहास से त्रिभुवन को भयभीत कर देने वाली, दोनों चरणों के न्यास से पृथ्वी को छोटी कर देने वाली, अपने भक्तो की रक्षा करने वाली ( आपको नमस्कार है ) ।
ॐ क्लीं क्रों स्फ्रों हूं ह्रीं छ्रीं स्त्रीं फ्रें भगवति प्रसीद प्रसीद जय जय जीव जीव ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंस हंस नृत्य नृत्य क छ भगमालिनि भगप्रिये भगातुरे भगांकिते भगरूपिणि भगप्रदे भग-लिंग-द्राविणि । संहारभैरवसुरतरसलोलुपे व्योमकेशि पिंगकेशि महाशंखसमाकुले खर्परविहस्तहस्ते रक्तार्णवद्वीपप्रिये मदनोन्मादिनि ।

शुष्कनरकपालमालाभरणे विद्युतकोटिसमप्रभे नरमांस खण्ड कवलिनि । वमदग्निमुखि फेरु-कोटि-परिवृते कर-तालिका-त्रासित-त्रिविष्टपे । नृत्य-प्रसारित-पादाघात परिवर्तित-भूवलये । पद-भाराव-नम्रीकृत-कमठ-शेषा-भोगे । कुरुकुल्ले कुंच-तुण्डि रक्तमुखि यमघंटे चच्चिर्के दैत्यासुर दैत्य राक्षस-दानव-कुष्माण्ड-प्रेत-भूत-डाकिनी-विनायक-स्कन्द घोणक क्षेत्रपाल-पिशाच-ब्रह्मराक्षस-वेताल-गुह्यक-सर्प-नाग ग्रह-नक्षत्र उत्पात चौराग्नि स्वापद युद्ध वज्रोपलाश निवर्ष विद्युन्मेघ विषोप-विषकपट कृत्या अभिचार द्वेष वशीकरण उच्चाटन उन्माद अपस्मार भूतप्रेत पिशाचवेशन नदी समुद्र आवर्त कान्तार्घोर अन्धकार महामारी बालग्रह हिंस्त्र सर्वस्वापहारि माया विद्युत् दस्यु वंचक दिवाचर रात्रिचर संध्याचर श्रृन्गि नखि दंष्ट्री विद्युत उल्का अरण्यदर प्रान्तरादि नानाविध महोपद्रव भंजनि, सर्वमंत्रतंत्रयंत्र कुप्रयोग प्रमद्दिनि षडाम्नाय समय विद्या प्रकाशिनि श्मशाना ध्यासिनि । निजबल प्रभाव पराक्रम गुण वशीकृत कोटि ब्रह्माण्डवर्ति भूतसंघे । विराड़रुपिणि सर्वदेव महेश्वरि सर्वजन मनोरंजनि सर्वपाप प्रणाशिनि अध्यात्मिकाधि दैविक आधिभौतिक आदि-विविध ह्रदयादि-निर्ददलिनी कैवल्य निर्वाण बलिनि दक्षिणकालि भद्रकालि चण्डकालि कामकलाकालि कौलाचार व्रतिनि कौलाचार कूजिनि कुलधर्म साधनि जगतकारणकारिणि महारौद्रि रौद्रवतारे अबीजे नानाबीजे जगदबीजे कालेश्वरि कालातीते त्रिकालस्थायिनि महाभैरव भैरवगृहिणि जननि जन-जनन-निवर्तिनि प्रलय-अनल-ज्वाला-ज्वालजिह्वे विखर्वोरु फेरुपोत लालिनि मृत्युंजय ह्रदयानंदकरि विलोल व्याल कुण्डल उलूक पक्षच्छत्र महाडामरि नियुक्त-वक्त्र-बाहुचरणे सर्वभूत दमनि नीलांजन समप्रभे योगीन्द्रह्रदयाम्बुजासन स्थित नीलकंठ-देहार्द्धहारिणि षोडश-कलांत-वासिनि हकारार्द्धचारिणि काल-संकर्षिणि कपालहस्ते मद-घूर्णित-लोचने निर्वाण दीक्षा-प्रसादप्रदे निन्दाsनंद-अधिकारिणि मातृगण-मध्यचारिणि त्रयस्त्रि-शत-कोटि-त्रिदश-तेजोमय-विग्रहे प्रलयाग्निरोचिनि विश्व कर्त्रि विश्वाराध्ये विश्व जननि विश्व-संहारिणि विश्व-व्यापिके विश्वेश्वरि निरुपमे निर्विकारे निरंजने निरीहे निस्तरंगे निराकारे परमेश्वरि परमानन्दे परात्परे प्रकृति-पुरुषात्मिके प्रत्ययगोचरे प्रमाणभूते प्रणवस्वरुपे संसारसारे सच्चिदानंदे सनातनि सकले सकल कलातीते सामरस्य-समयिनि केवले कैवल्यरुपे कल्पनातिगे काललोपिनि कामरहिते कामकलाकालि भगवति ।

अर्थ:- ॐ क्लीं क्रों स्फ्रों हूं ह्रीं छ्रीं स्त्रीं फ्रें भगवति प्रसीद प्रसीद जय जय जीव जीव ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हस हस नृत्य नृत्य क छ भगमालिनी भगप्रिये भगातुरे भगांकिते भगरूपिणी भगप्रदे भग और लिंग को द्रवित करने वाली, संहार भैरव के साथ सूरत करने से उत्पन्न आनंद की लोलुप, शिव की भार्या, पिंगकेश वाली, नरकपाल से आवृता, हाथ में खप्पर लिए हुए, रक्त समुद्र और रक्त द्वीप के प्रति आसक्त, कामदेव को उन्मत्त करने वाली, सूखे हुए नरकपालो के आभूषण धारण करने वाली, करोडो बिजली के समान चमक वाली, मनुष्य के मांस को ग्रहण करने वाली, मुख से अग्नि का वमन करने वाली, करोडों गिदडियो से घिरी हुई, हाथ की ताली मात्र से स्वर्ग को कंपा देने वाली, नृत्य के लिए फैलाये गये पैर के आघात से पृथ्वी को मोड़ देने वाली, पैर के भार से कच्छप और शेषनाग के फन को झुका देने वाली, कुरुकुल्ले जैसे संकुचित मुख वाली, रक्त से भरे हुए मुख वाली, यमघंटा चच्चिर्का दैत्य असुर दैत्यराक्षस दानव कुष्माण्ड प्रेत भूत डाकिनी विनायक स्कन्द घोणक क्षेत्रपाल पिशाच ब्रह्मराक्षस बेताल, गुह्यक सर्प नाग ग्रह-नक्षत्र के उत्पात चोर अग्नि जंतु से युद्ध वज्र उपल अशनि की वर्षा विद्युत् मेघ विष उपविश कपटपन अभिचार द्वेष वशीकरण उच्चाटन उन्माद मिर्गी भूत प्रेत पिशाच का आवेश नद-नदी समुद्र के चारों ओर के घने जंगल अंधकार महामारी बालग्रह हिंसक सर्वस्व का अपहरण करने वाले मायावी डाकू ठग लुटेरे चोर सन्ध्याचर सींग नख दांत वाले जीव, विद्युत उल्का अरण्य उसके समीप का स्थान आदि अनेक प्रकार के उपद्रव का नाश करने वाली, समस्त मंत्र-तन्त्र-यंत्र के दुष्प्रयोग को नष्ट करने वाली, समस्त आम्नाय के सिद्धान्त और ज्ञान का प्रकाश करने वाली, श्मशान-निवासिनी, अपने बल, प्रभाव, पराक्रम और गुणों के कारण असंख्य ब्रह्माण्डो में रहने वाले प्राणियों को वश में करने वाली, विराट-स्वरूपा, समस्त देवों की अधिश्वरी, समस्त जनों का मनोरंजन करने वाली, सभी के पापों को नष्ट करने वाली, आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिवैदिक आदि द्वारा विविध ह्रदय की पीड़ा का नाश करने वाली, कैवल्य निर्वाण प्रदान करने वाली दक्षिण काली, भद्र काली, चंड्काली, कामकलाकाली, कौलाचार व्रत करने वाली, कौलाचार का प्रचार करने वाली, कुलधर्म की साधना करने वाली, जगत के कारण की कारण, महारौद्री, स्वयम्भू, नानाबीज, जगत की कारणभूता, काल की स्वामिनी, काल से परे, त्रिकाल-स्थापिनी, महाभयंकर, भैरव की भार्या, जननी, मनुष्य के जन्मबन्धन को हरने वाली, प्रलय-अग्नि की ज्वाला के समूह के समान जिह्वा वाली, छोटी जंघाओ वाली, सियार के बच्चे का पालन करने वाली, महादेव मृत्युंजय के ह्रदय को प्रसन्न करने वाली, चंचल सर्प का कुण्डल और उल्लू के पंखों का छत्र धारण करने से महाभयंकर, दश हजार करोड़ मुख, बाहु और चरनों वाली, समस्त भूतों का दमन करने वाली, नीली स्याही के समान प्रभा वाली, योगियों के ह्रदय-कमल-रूपी आसन पर स्थित नीलकंठ भगवान् की अर्धदेह को धारण करने वाली, सोलह कलाओ के अंत अर्थात् अमृताकला में निवास करने वाली, 'ह' कार के अर्घ यानि विसर्ग में संचरण करने वाली, काल-संकर्षिणी, हाथ में कपाल धारण करने वाली, मद से मस्त नेत्रों वाली, निर्वाण दीक्षा रूपी प्रसाद प्रदान करने वाली, निंदा और आनंद दोनों की अधिकारिणी, मातृसमूह के मध्य में विचरण करने वाली, तैतीस करोड़ देवताओं के तेज की देह वाली, प्रलयकाल में उत्पन्न अग्नि के समान कान्ति वाली, सृष्टि का संहार करने वाली, विश्व द्वारा पूजिता, सृष्टि की रचना करने वाली, सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त, विश्व की ईश्वरी, उपमा-रहित विकारशून्य कलंकवर्जित इच्छारहित निस्तरंग निराकार परमेश्वरी परम आनंदस्वरूपा परापरा प्रकृति-स्वरूपा ध्यान से जान जाने वाली, प्रमाण स्वरूपा, ओंकार स्वरूपा, संसार की तत्वभूत सत-चित-आनन्दस्वरूपा, सनातनी, कलायुक्ता, सम्पूर्ण कलाओ से परे, सामरस्य सिद्धान्त वाली, केवल, केवल्यरुपा, कल्पनातीत काल का लोप करने वाली, कामरहित माँ कामकलाकाली भगवती ( आपको नमस्कार है ) ।

ॐ ख्फ्रें हसौ: सौ: श्रीं ऐं ह्रौं क्रों स्फ्रों सर्वसिद्धिं देहि-देहि मनोरथान् पूरय-पूरय मुक्तिं नियोजय-नियोजय भवपाशं समुन्मूलय-समुन्मूलय जन्ममृत्यु तारय-तारय परविद्यां प्रकाशय-प्रकाशय अपवर्गं निर्माहि-निर्माहि संसारदुखं यातनां विच्छेदय-विच्छेदय पापानि संशमय-संशमय चतुवर्गं साधय-साधय ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं यान् वयं द्विष्मो ये चास्मान् विद्विषन्ति तान् सर्वान् विनाशय-विनाशय मारय-मारय शोषय-शोषय क्षोभय-क्षोभय मयि कृपां निवेशय-निवेशय फ्रें ख्फ्रें ह्स्फ्रें ह्स्ख्फ्रें हूं स्फ्रों क्लीं ह्रीं जय-जय चर-अचरात्मक-ब्रह्माण्ड-उदरवर्ति-भूत-संघाराधिते प्रसीद-प्रसीद तुभ्यं देवि नमस्ते-नमस्ते-नमस्ते ।

अर्थ:- ॐ ख्फ्रें हसौ: सौ: श्रीं ऐं ह्रौं क्रों स्फ्रों सर्वसिद्धि प्रदान करे, प्रदान करे, मेरे मनोरथ पूर्ण करे, पूर्ण करे, मुक्ति प्रदान करे, प्रदान करे, भवपाश से मुक्त करे, मुक्त करे, जन्ममृत्यु से पार करे, पार करे, दुसरो की विद्या का प्रदर्शन करे, प्रदर्शन करे, अपवर्ग से उबारे, उबारे, संसारदुःख की यातना को दूर करे, दूर करे, पापों का नाश करे, नाश करे, चतुवर्ग का साधन करे, साधन करे, ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं, जो मुझसे द्वेष रखते हो, उन सबका विनाश करो, विनाश करो, मारों मारों, शोषण करो, शोषण करो, क्षोभण करो, क्षोभण करो, मुझ पर कृपा करो, कृपा करो, फ्रें ख्फ्रें ह्स्फ्रें ह्स्खफ्रें हूं स्फ्रों क्लीं ह्रीं जय जय चराचरात्मक-ब्रह्माण्ड-उदरवर्ति-भूत-संघाराधिते प्रसीद-प्रसीद तुभ्यं देवि नमस्ते-नमस्ते-नमस्ते । ( देवि! आपको बारम्बार-बारम्बार नमस्कार है ) ।