अमावस्या तिथि प्रारंभ- 20 जुलाई 12.10 AM से
अमावस्या तिथि प्रारंभ समाप्त- 20 जुलाई 11.02 PM तक
सोमवती अमावस्या से दूर होते हैं अशुभ योग
अमावस्या तिथि प्रारंभ- 20 जुलाई 12.10 AM से
अमावस्या तिथि प्रारंभ समाप्त- 20 जुलाई 11.02 PM तक
सोमवती अमावस्या से दूर होते हैं अशुभ योग
हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। तुलसी का पौधा 5 प्रकार का होता है:
1. श्याम तुलसी
2. राम तुलसी
3. विष्णु तुलसी
4. वन तुलसी और
5. नींबू तुलसी।
तुलसी का पत्ता तोड़ने के नियम भी हैं। ऐसा नहीं है कि आप तुलसी जी के पौधे के पास गए और तोड़ दिया पत्ता। तुलसी जी का पौधा पूजन के लिए होता है। अगर देखा जाए तो तुलसी का एक रूप लक्ष्मी का भी है या यूं मानें कि तुलसी जी कोई पौधा नहीं है अपितु तुलसी जी राधा जी का अवतार हैं इसलिए तुलसी जी का पत्ता तोडऩे और घर में तुलसी जी को रखने के नियम हैं।
रविवार, शुक्रवार, एकादशी, अमावस्या, चौदस तिथि, ग्रहण और द्वादशी को तुलसी का पत्ता नहीं तोडऩा चाहिए।
रविवार और एकादशी को तुलसी जी को जल अर्पण नहीं करना चाहिए।
तुलसी का पत्ता कभी भी नाखून से नहीं तोडऩा चाहिए।
तुलसी के पौधे से गिरे हुए पत्तों का प्रयोग औषधि अथवा अन्य क्रियाओं में करना चाहिए या गिरे हुए पत्तों को मिट्टी में दबा देना चाहिए।
बिना किसी विशेष कारण के तुलसी का पत्ता नहीं तोडऩा चाहिए।
तुलसी जी का पत्ता तोड़ने से पूर्व इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
‘मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानंद कारिणी।
नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते
अग्नि देवता पंच तत्वों में से एक है। इन्हे यज्ञ और हवन का सबसे महान अंग मानते है। हवन के माध्यम से इन्ही के द्वारा हव्य देवताओ तक पहुँचाई जाती है। अत: इन्हे सभी देवताओ का मुख भी कहते है। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।
पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी का नाम स्वाहा है। इनके तीन पुत्र नाम पावक, पवमान तथा शुचि है।
अग्नि देव की कृपा के हिन्दू धार्मिक पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा लेने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुंडल मांगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुंच उनकी आज्ञा से महारानी का कुण्डल प्राप्त किया। रानी ने कुंडल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुंडलो को सावधानी से ले जाइयेगा नहीं तो तक्षकनाग कुंडल छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुंडलो के लेकर पाताल में चला गया। अग्नि देव की कृपा से ही उत्तंक ने दुबारा कुंडल प्राप्त किए और उन्हें गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। अग्नि देव ने ही अपने ब्रम्हचारी भक्त उपकोशल को ब्रम्ह विद्या का उपदेश दिया था।
अग्नि देव की प्रार्थना और उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त कर सकता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है। अग्नि देव का बीजमन्त्र ‘रं’ तथा मुख्य मंत्र ‘रं वहिन्चैतन्याय नमः’ है।
किसी-किसी व्यक्ति के हाथों की रेखाओ में अकाल मृत्यु का योग होता है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र के जाप से अकाल मृत्यु के योग को टाला जा सकता है। ऐसा भी कहा गया है कि इस मंत्र के जाप से मौत के मुंह से लोग बाहर आ जाते हैं। इतना ही नहीं अगर आपकी कुंडली में कोई गंभीर बीमारी, दुर्घटना या फिर कम आयु का योग है तो इस मंत्र के जाप से यह भी टल सकता है।
भय से मुक्ति मिलती हैं इस मंत्र से
अगर आपको किसी बात य चीज से डर लगता है तो आपकों इस मंत्र का जाप जरूर से करना चाहिए, क्योंकि यह मंत्र आपको भय से मुक्ति दिलाता हैं। बच्चों को भी यह मंत्र जरूर से याद करवाना चाहिए। इससे उनको कभी डर नहीं लगेगा। भविष्य पुराण में तो यहां तक बताया गया है इस मंत्र का जाप रोज 108 बार करना चाहिए।
स्वास्थ्य लाभ के लिए
भले ही आपका स्वास्थ अच्छा हो मगर, आपको हर रोज सुबह 2 बजे से 4 बजे के बीच इस मंत्र का जाप करना चाहिए। जाहिर है आजकल की लाइफस्टाइल इस बात की इजाजत नहीं देती। ऐसे में आप सुबह आराम से उठ कर स्नान करके साफ कपड़े पहन कर रुद्राक्ष की माला ले कर इस मंत्र का जाप कर सकते है। इससे आपका स्वास्थ ठीक रहेगा। आप ऐसा किसी और के लिए भी कर सकती हैं। इसके लिए आपको उसके नाम का संकल्प लेना पड़ेगा।
धन लाभ के लिए
अगर आप प्रॉपर्टी के मामले में उलझे हैं या फिर आप आर्थिक संकट की समस्या से जूझ रही हैं तो आपको महामृत्युंजय मंत्र का जाप जरूर से करना चाहिए। इससे आपके व्यापार में वृद्धि होगी। इतना ही नहीं आपके रुके हुए काम भी बनने लगेंगे। मगर, इसके लिए आपको शिवलिंग के समक्ष बैठ कर शिवलिंग की पूजा अराधना करने के बाद ही इस मंत्र का जाप करना पड़ता है।
गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.
गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.
वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 'गुरु पूर्णिमा' अथवा 'व्यास पूर्णिमा' है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इसी के संदर्भ में यह समय अधिक प्रभावी भी लगता है. गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप. हिंदु परंपरा के अनुसार गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि "गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय". इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है.
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा
गुरु है ज्ञान का मार्ग
शास्त्रों में गुरू के अर्थ के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है. गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं. गुरु की भक्ति में कई श्लोक रचे गए हैं जो गुरू की सार्थकता को व्यक्त करने में सहायक होते हैं. गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता.
भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की.
गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है.
गुरू आत्मा - परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है , "हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर".
गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.
वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 'गुरु पूर्णिमा' अथवा 'व्यास पूर्णिमा' है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा
इतिहास:- हिन्दू धर्म भारत का सबसे प्राचीन धर्म है वैसे इसके बारे में विद्वानों के अलग अलग मत है वही इतिहासकार इसको कुछ हजार वरषों पुराना बताते है वही भारत कि सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म चिन्ह है हिन्दू धर्म में मातृदेवी कि मूर्ति ,शिव पशुपति और भी देवता कि मुर्तिया पीपल कि पूजा हिन्दू धर्म में मानते है सिन्धु घाटी के लोग स्वय को आर्य बताते है और आर्य कि सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा जाता है
सिद्धांत ;- हिन्दू धर्म एक ही सिद्धान्त से नही बना है इसमें सभी सिद्धान्त को समान श्रध्दा दी जाती है इसमें अनेक मत और संप्रदाय आते है हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थाई मानता है हिन्दू धर्म क अनुसार मनुष्य ही ऐसा है जो पाप और पुण्य दोनों को भोग सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है इनमे चार संप्रदाय है । हा लेकिन इसमें ईश्वर के नाम अनेक है इस सिधान्त का मानना है कि धर्म कि रक्षा के लिय ईश्वर बार -बार जन्म लेता है और दुसरो को कष्ट देना पाप मानते है हमारी आत्मा अमर अजर है हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र है हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन को एक चक्र के रूप में माना गया है
हिन्दू धर्म के नियम – हिन्दू धर्म में 10 नियम है यह सुना जाता है ईश्वर ही शक्ति है कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस नियम का पालन नही करता है वह भटका हुआ होता है
1.ईश्वर प्रणिधान -ईश्वर इससे अलग किसी और में आस्था न रखे चाहे आप पर कितना ही दुःख हो अपनी आस्था को बनाये रखे
2.ईश्वर कि पूजा –ईश्वर कि पूजा हमे प्रतिदिन करनी चाहिए ये ध्यान और प्राथना दोनों से कि जा सकती है पूजा को नियमो के अनुसार ही करना चाहिए यह तक कि दुखो में भी पूजा करना न छोड़े
3.व्रत या उपवास –सप्ताह में एक व्रत जरुर रखे श्रावण का महिना बहुत ही शुभ माना जाता है इसमें मास का सेवन नही करना चाहिए वैसे तो सभी दिन श्रेष्ठरस माना जाते है इस महीने लेकिन सोमवार और शनिवार अधिक माना जाता है
4.तीर्थयात्रा या तीर्थस्थान -तीर्थयात्रा को बहुत ही सुभ माना जाता है और पुण्य भी हम सभी को कभी न कभी तीर्थ स्थानों पर जाना चाहिए इससे वैराग्य और कि प्राप्ति होती है
5.दान देना – हमे अपने जीवन दान पुण्य करना चाहिए गरीबो को खाना खिलाना चाहिए कपडे दान करने चाहिए जरुरी नही है कि आप पैसे खाना ही दान करो वेदों में अनेक दानो का जिक्र है जैसे अन्नदान ,विद्यादान,धनदान,अभयदान आदि
6.मकर सक्रांति और कुंभ पर्व मनाना –वैसे तो हम सभी त्योहारों को अच्छे से मनाते है परन्तु मकर सक्रांति को भी हमे अच्छे से मनाना चाहिए इसके बाद कुंभ का उत्सव मनाना चाहिए मकर सक्रांति के दोरान सभी देवता धरती पर घूमते रहते है जब सूर्य धनु राशी से मकर में जाता है तो मकर सक्रांति मनाते है
7.यज्ञ करना –ह्मेअपने घरो में साल में एक यज्ञ जरुर करना चाहिए वेद के अनुसार यज्ञ चार तरह के होते है ब्रह्मायज्ञ,देवयज्ञ,पितृयज्ञ,अतिथि यज्ञ,वैश्वदेव यज्ञ/ यज्ञ करने से घर में बुरी आत्मा नही आती है घर म शांति रहती है
8.सेवा करना –वेदों में लिखा है कि अपनी माता-पिता और गुरु कि सेवा करनी चाहिए उनको दुःख नही देने चाहिए उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए उनका अनादर न करे माता पिता कि सेवा ही सबसे बड़ा पुन्य है सेवा इसमें बच्चो महिलाओ बूढों आदि कि सेवा करना ही पुण्य है
9.संस्कार का पालन करना –हर एक घर में माँ बाप अपने बच्चो को अच्छे से अच्छे संस्कार देते है तो बच्चो को उनके संस्कारो का पालन करना चाहिए कोई भी गलत काम नही करने चाहिए जिससे संस्कारो पर प्रभाव पड़े प्रतिएक हिन्दू को संस्कारो का पालन करना चाहिए चाहे वो छोटे हो या बड़े
10.धर्म प्रचार –हमे अपने धर्म का बारे में कबी भी गलत नही बोलना चहिये हिन्दू धर्म को पढ़कर ही उसका प्रचार और प्रसार करना चाहिए उसको इसका ज्ञान एक से दुसरो को बाटना चाहिए अपने धर्म कि बुराइयाँ न सुने और अपने धर्म को जाने
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुँचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे।
कांधे मूंज जनेउ साजे।।
शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानु।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरे सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु संत के तुम रखवारे।।
असुर निकन्दन राम दुलारे।।
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुह्मरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै।।
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बन्दि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
कैंसर का खतरा होता है कम
कई रिसर्चों में बताया गया है कि तुलसी का बीज कैंसर के इलाज में फायदमंद होते है. हालांकि, इस बारे में अभी तक पुष्टि नहीं हुई है.
सांस की दुर्गंध को करता है दूर
तुलसी के पत्ते का इस्तेमाल करने से सांस की दुर्गंध को दूर करने में काफी हद तक राहत मिलती हैं. नेचुरल होने के कारण इसका कोई साइडइफेक्ट नहीं है. यदि आपके मुंह से बदबू आ रही हो तो तुलसी के कुछ पत्तों को चबा लें. इसके सेवन से दुर्गंध चली जाती है.