हनुमानजी ने दरबार में जाकर नारदजी के कहे अनुसार ही किया । विश्वामित्रजी हनुमानजी के इस व्यवहार से क्रोधित हो गए । तब नारदजी विश्वामित्रजी के पास जाकर बोले—‘हनुमान बहुत उद्दण्ड और घमण्डी हो गया है, उसने आपको छोड़कर उसने सभी ऋषियों को प्रणाम किया ?’ यह सुन गुरु विश्वामित्र आगबबूला हो उठे और श्रीराम के पास जाकर बोले—‘आपके सेवक हनुमान ने सभी ऋषियों के सामने मेरा घोर अपमान किया है, अत: कल सूर्यास्त से पूर्व उसे आपके हाथों मृत्युदण्ड मिलना चाहिए ।’ विश्वामित्रजी श्रीराम के गुरु थे अत: श्रीराम को उनकी आज्ञा का पालन करना आवश्यक था ।‘ प्रभु श्रीराम हनुमान को कल मृत्युदण्ड देंगे’—यह बात सारे नगर में आग की तरह फैल गई थी। हनुमानजी नारदजी के पास गए और बोले—‘देवर्षि ! मेरी रक्षा करें, प्रभु कल मृत्यु दंड देंगे। मैंने तो आपके कहने पे ही यह सब कुछ किया है ।’ नारदजी ने हनुमानजी से कहा—‘तुम हताश मत हो, मैं जैसा कहूं, वैसा ही करो । ब्राह्ममुहुर्त में उठकर सरयू नदी में स्नान करके और फिर नदी-तट पर ही खड़े होकर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’—इस मन्त्र का जाप करना । तुम्हें कुछ नहीं होगा ।’ दूसरे दिन प्रात:काल हनुमानजी की कठिन परीक्षा देखने के लिए अयोध्यावासियों की भीड़ इकट्ठी हो गई । हनुमानजी सूर्योदय से पहले ही सरयू में स्नान कर बालुका तट पर हाथ जोड़कर जोर-जोर से ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जाप करने लगे । भगवान श्रीराम हनुमानजी से थोड़ी दूर पर खड़े होकर अपने प्रिय सेवक पर अनिच्छापूर्वक बाणों का बौछार करने लगे । पूरे दिन श्रीराम बाणों की वर्षा करते रहे, पर हनुमानजी का बाल-बांका भी नहीं हुआ । अंत में श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र निकाला । हनुमानजी पूर्ण आत्मसमर्पण किए हुए जोर-जोर से मुस्कराते हुए ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जाप करते रहे । सभी लोग आश्चर्य में डूब गए ।
तब नारदजी विश्वामित्रजी के पास जाकर बोले—‘मुने ! आप अपने क्रोध को शान्त कीजिए । श्रीराम थक चुके हैं, उन्हें हनुमान के वध की गुरु-आज्ञा से मुक्ती दीजिए । आपने श्रीराम के ‘नाम’ की महत्ता को तो प्रत्यक्ष देख ही लिया है । अनन्य बाण हनुमान का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके है । अब आप श्रीराम को हनुमान को ब्रह्मास्त्र के उपयोग से न मारने की आज्ञा दें ।’ विश्वामित्रजी ने वैसा ही किया । हनुमानजी आकर श्रीराम के चरणों पर गिर पड़े । विश्वामित्रजी ने हनुमानजी को आशीर्वाद देकर उनकी श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति की प्रशंसा करने लगे ।
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