Sunday, 31 May 2020

निर्जला एकदशी

हिंदू पंचांग के अनुसार अभी तीसरा महीना ज्येष्ठ का चल रहा है। इस महीने में गर्मी काफी तेज होती है इस कारण ये समय लोगों को पानी का मूल्य बताता है। इस पूरे माह पानी की बचत और जल का दान करना अच्छा माना जाता है। ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस दिन को भीमसेन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन व्रती पानी की एक बूंद ग्रहण किये बिना निर्जला एकादशी का व्रत पूरा कर विष्णु जी की उपासना करता है। इस साल निर्जला एकादशी का व्रत 2 जून को रखा जाएगा।


एकादशी तिथि प्रारंभ - दोपहर 02:57 बजे से (1 जून 2020)

एकादशी तिथि समाप्त - दोपहर 12:04 बजे तक (2 जून 2020)

सूर्य पूजा करने की परंपरा

ज्येष्ठ महीने में सूर्य का प्रभाव चरम पर होता है। इस महीने तेज गर्मी रहती है और वाष्पीकरण अधिक होता है। इस कारण नदी, तालाब सूखने लगते हैं, जमीन का जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। लोगों को पानी बर्बाद करने से बचना चाहिए। आप निर्जला एकादशी के मौके पर प्याऊ या मटके लगवाएं। अपने घर के बाहर या छत पर चिड़ियों के लिए दाना-पानी का इंतजाम करें। जल्दी उठकर सूर्य की पूजा करें। ज्येष्ठ महीने में अपने खाने पीने का विशेष ख्याल रखें।

Wednesday, 27 May 2020

खेतवाडीचा राजा मुंबई

गणपति पंडाल
खेतवाडीचा राजा मुंबई

खेतवाडीचा राजा मुंबई के प्राचीन और प्रसिद्ध गणपति पंडाल हैं। इनकी स्थापना 1959 हुई थी। सं 2000 में 40 फिट ऊंचाई का गणपति बनानें से ख्यातिप्राप्त हुआ। खेतवाडी में 13 गली है, और उनमें से लगभग हर गली में गणपति पंडाल है, परन्तु 12 वीं गली का पंडाल खेतवाडी का सबसे प्रसिद्ध पंडाल है।

पता-  12वीं गली खेतवाडी, गिरगांव। चर्नी रोड स्टेशन के बाजू में।


Monday, 25 May 2020

जाने वाले महीने में कितने ग्रहण है

२०२० ग्रहण
5 जून से 5 जुलाई 2020 के बीच मे तीन ग्रहण है 
एक महीने में तीन ग्रहण 
दो चंद्र ग्रहण 
एक सूर्य ग्रहण 

जब कभी एक महीने में तीन से ज्यादा ग्रहण आ जाये 
तो एक चिंता का कारण बनता है 

5 जून 2020 चंद्रग्रहण
प्रारंभ रात 11:15 मिनिट समाप्ति 6 जून सुबह 2:34 चंद्र ग्रहण जिसमे शुक्र वक्री और अस्त रहेगा गुरु शनि वक्री रहेंगे तो तीन ग्रह वक्री रहेंगे, जिसके कारण जिसके प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा। शेयर बाजार से जुड़े हुए लोग सावधान रहें। यह ग्रहण वृश्चिक राशि पर बहोत बुरा प्रभाव डालेगा। किसी ख्यातिप्राप्त व्यक्ति की रहस्यात्मक मौत।
परिवार वालो के साथ वाद विवाद का सामना करना पड़ेगा तो वृश्चिक राशिवाले सावधान।

21 जून 2020 सूर्य ग्रहण
एक साथ छ ग्रह वक्री रहेंगे बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु यह छह ग्रह 21 जून 2020 को वक्री रहेंगे। इन छह ग्रह का वक्री होना यानी एक बहोत बड़ा तहलका मचाने वाला है।

5 जुलाई 2020 चंद्रग्रहण एक बहुत बड़ा परिवर्तन
मंगल का राशि परिवर्तन
सूर्य का राशि परिवर्तन
गुरु धन राशि मे वापस, लेकिन वक्री रहेंगे।
शुक्र मार्गी
प्राकृतिक आपदाएं आयेगी।
विश्व युद्ध होगा वैश्विक शक्तियां लड़ने को हावी होगी।
किसी ख्यातिप्राप्त यशस्वी कीर्तिमान राजनीति नेता की हत्या होगी कुछ जगह पर आपसी लड़ाईया होगी। जल प्रलय का खतरा हम सभी पे मंडरा रहा है।

5 जून को चंद्र ग्रहण
21 जून को सूर्य ग्रहण
5 जुलाई को चंद्र ग्रहण 

यह तीन ग्रहण के कारण उथल-पुथल मच जायेगी 
मांसाहार का त्याग करें, अन्यथा भयकर परिणाम।

Thursday, 21 May 2020

16 संस्कार भाग -3

अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम 9 - 12 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 4 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।


कर्णवेध संस्कार नवम संस्कार है। इस संस्कार में शिशु  के कोमल कानों में एक सूचिका द्वारा छेद किया जाता है। इस संस्कार को 6 माह से लेकर 16वें माह तक अथवा 3,5 आदि विषम वर्षों में या कुल की पंरपरा के अनुसार उचित आयु में किया जाता है। इसे स्त्री-पुरुषों में पूर्ण स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व की प्राप्ति के उद्देश्य से कराया जाता है। मान्यता यह भी है की सूर्य की किरणें कानों के छिद्र से प्रवेश पाकर बालक-बालिका को तेज़ संपन्न बनाती है। बालिकाओं के आभुषण धारण हेतु तथा रोगों से बचाव हेतु यह संस्कार आधुनिक एक्युपंचर पद्धति के अनुरुप एक सशक्त माध्यम भी है इसका व्यावहारिक पक्ष मुखमंडल की सौंदर्यता से है। वहीं चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से कर्णवेध से हाइड्रोसील नामक रोग से विमुक्ति होती है। इसी प्रकार दर्शन के अनुसार यह संसार एक शून्य है और कर्णवेध इसका परिचायक है।


जब शिशु की आयु शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाए तो उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है। इसमें समारोह के जरिये बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा होता है। दूसरी तरफ अभिभावकों, शिक्षकों को भी उनके दायित्व के प्रति जागरूक कराया जाता है। प्रचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था. आज भी बसंत पंचमी के दिन बच्चे से पहली बार अक्षर लिखवाया जाता है.शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार शुरू होता है और इसके बाद बच्चा अपनी पढाई शुरू करता है.



यह दशम संस्कार है।, शास्त्रों में बताया गया है कि इस संस्कार के द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का दूसरा जन्म होता है। उपनयन का अर्थ है, "ज्ञान रूपी नेत्र का प्रस्फोटन करना "   इस संस्कार से जीवन की ज्ञान यात्रा की शुरूआत होती है। बालक को विधिवत यज्ञोपवित (जनेऊ) धारण करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं जो कि त्रिदेव यानी कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक माने जाते हैं। इस संस्कार के द्वारा बालक को गायत्री जाप, वेदों का अध्ययन आदि करने का अधिकार प्राप्त होता है। इस संस्कार से जीवन की ज्ञान यात्रा की शुरूआत होती है। जनेउ धारण करने का वैज्ञानिक महत्व भी है। शौच जाते समय जनेउ से कान को बांधने से कान के पास से गुजरने वाली एक पतली सी नस बंध जाती है। इससे हृदय प्रदेश के अवयव प्रभावित होती हैं और हृदय रोगी की आशंका कम हो जाती है।


वेदारंभ (वेदों और सिद्धांतों का अध्ययन) संस्कार उपनयन के साथ किया जाता है. वेदारंभ ‘गुरुकुल’ में वेदों और उपनिषदों की शिक्षा है. प्रत्येक शैक्षणिक अवधि की शुरुआत में एक समारोह होता है जिसे उपकर्म कहलाता है। और प्रत्येक शैक्षणिक अवधि के अंत में एक और समारोह होता है जिसे उपसर्जना कहलाता है.वेदारम्भ संस्कार में केवल बालक ही एक आवश्यक अंग नहीं है , अपितु माता-पिता और अध्यापक भी इस संस्कार के महत्वपूर्ण अंग हैं । क्योंकि उनके उचित मार्गदर्शन के बिना इस संस्कार का संपन्न होना असंभव है । यही कारण रहा कि प्राचीन काल में भारत में विद्यारम्भ संस्कार के लिए सुयोग्य , चरित्रवान , विद्वान , संयमी , तपस्वी अध्यापक या गुरु की खोज करते थे। क्योंकि जब गुरु अवगुणों से रहित होगा तभी वह गुणी शिष्यों का निर्माण कर सकेगा । एक अच्छे समारोह के माध्यम से गुरु को भी समाज के सामने अपने आपको उत्तम सिद्ध करने का अवसर मिलता था । वह समाज को यह विश्वास दिलाते थे कि इस शिष्य को वह योग्यतम बनाकर संसार को देगा । गुरु के इस संकल्प की पूर्ति तभी संभव हो पाती है जब माता-पिता भी अपने बच्चे को वैसी ही प्रेरणा और शिक्षा देने वाले हों , जैसी उसका गुरु उसे देता है।

एक ऐसी चीज जिसके बिना है हर पूजा अधूरी

हिंदू धर्म


यह चीज हर पूजा का आधार है। इस चीज के बिना हर पूजा अधूरी है। हिंदू धर्म आस्था का प्रतीक हैं। हिंदू धर्म आधार स्तम्भ है "पूजा- अर्चना", और हमारे देश का हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य के हिसाब से पूजा करता है।
 हमारे देश के हर कार्य की शुरुआत पूजा से होती हैं। हर वर्ग के अलग - अलग विधि विधान से पूजा कार्य होता हैं। परन्तु ये वो वस्तु है जो हर धर्म में और सभी देवी देवताओं के लिए जरूरी है। सभी देवी देवता इस वस्तु के उपयोग स खुश रहते हैं। इसे धार्मिक लिहाज से भी बहुत शुभ माना जाता है। पूजा में इसके कुछ दाने ही आपकी सोई किस्मत को जागा सकते हैं। जानें कैसे?

पूजा पाठ में इसका अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है। तिलक लगाना हो या पूजा-पाठ करना हो उसमें भी इसका का प्रयोग किया जाता है। 

अक्षत का अर्थ होता है कि जो टूटा ना हो। चावल का जिस पूजा में प्रयोग होता है यदि पूजा में कुछ अन्य चीजें चूक वश छूट भी जाएं तो चावल के चढ़ावे से वह भूल माफ मानी जाती है। कई बार ऐसा होता है कि कुछ चीजें कुछ देवाता या देवी को पूजा में चढ़ाने की मनाही होती है, जैसे तुलसी को कुमकुम, गणेशजी को तुलसी, शिवजी को हल्दी नहीं चढ़ाई जाती, लेकिन अक्षत ऐसी महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है जिसे हर पूजा में हर देवी-देवता को चढ़ाया जाता है। अक्षत यानी चावल के कुछ दाने का प्रयोग आपके घर में सुख-शांति और धन-समृदधि सब कुछ दे सकता है।

मंत्र-
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ता: सुशोभिता:।
मया निवेदिता भक्त्या: गृहाण परमेश्वर॥

इस मंत्र का अर्थ यही होता है कि हे भगवान कुमकुम के रंग से सुशोभित यह अक्षत आपको समर्पित हैं, कृपया आप इसे स्वीकार करें। इसका यही भाव है कि अन्न में अक्षत जिसे सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जिसे देवान्न भी कहा जाता है साथ ही यह सभी देवताओं का प्रिय अन्न होता है। इसलिए इसे सुगंधित द्रव्य कुमकुम के साथ आपको अर्पित कर रहे हैं। इसे ग्रहण करें, आप भक्त की भावना को स्वीकार करें।

  • याद रखें कि जब भी पूजा में आप अक्षत यानी चावल के दाने प्रयोग करें वह संपूर्ण हो। यानी चावल के दाने टूटे नहीं होने चाहिए। टूटा चावल अशुभ माना जाता है। चावल के कुछ दाने रोज भगवान को चढ़ाने से आपको ऐश्वर्य की प्राप्ति हो सकती है।
  • शिवलिंग पर चावल चढ़ाना बहुत ही फलदायी माना गया है। यदि आपके पास धतुरा या कनैल का फूल नहीं भी है और आप शिवलिंग पर अक्षत चढ़ा दें तो आपको असीम फल की प्राप्ति होगी। अक्षत चढ़ाने वाले को भगवान शिव धन-वैभव और सम्मान प्रदान करते हैं।
  • यदि आपके घर में आर्थिक समस्या बनी रहती है तो आपको अपने घर कें मंदिर में मां अन्नपूर्णा की स्थापना करनी चाहिए और उनकी प्रतिमा चावल के ढ़ेर पर स्थापित करना चाहिए। इससे आपके घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होगी।
  • यदि आपके घर में आर्थिक समस्या बनी रहती है तो आपको अपने घर कें मंदिर में मां अन्नपूर्णा की स्थापना करनी चाहिए और उनकी प्रतिमा चावल के ढ़ेर पर स्थापित करना चाहिए। इससे आपके घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होगी।
  • देवताओं का प्रिय अन्न है चावल और यही कारण है कि इसे देवतान्न भी कहा गया है। इसे सुगंधित द्रव्य कुंकुम के साथ भगवान अर्पित करना चाहिए। ये आपकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का जबरदस्त उपाय है।
  • अपने ईष्ट देव के नाम से भी अक्षत का चढ़ावा जरूर चढ़ाया करें। ये आपके घर में सौभाग्य लाएगा।
  • विवाह की कई रस्मों में अक्षत का प्रयोग किया जाता है। माना जाता है कि अक्षत से दुष्टात्माएं भागती हैं। इसलिए वर-वधू इसे अग्नि में समर्पित करते हैं। परिवार के लोग जोड़े के ऊपर अक्षत छिड़कते हैं। मान्यता है कि इस तरह दोनों को जीवन में समृद्धि प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया जाता है।

Wednesday, 20 May 2020

जीएसबी सेवा पंडाल मुंबई

जीएसबी सेवा पंडाल


गणपति पंडालों में जीएसबी पंडाल मुम्बई  का सबसे महंगा गणेश पंडाल  है। यहां हर साल 60 किलो से भी ज्यादा सोना और चांदी चढ़ावा आता है। इसलिए इसे मुंबई के गोल्डन गणेशा के नाम से भी जानते हैं। यहां साल 1954 से ही हर साल गणेश चतुर्थी पर पंडाल सजाया जाता है।

Sunday, 17 May 2020

मुंबईचा राजा (गणेश गली गणपति)

गणपति पंडाल मुंबई


देशभर में ऐसे कई मंडल हैं जो गणेशोत्सव की महिमा बढाते हैं और व्यापक स्तर पर इसको मनाते हैं। वैसे तो देशभर में कई पंडाल है लेकिन गणेश गली मुंबई चा राजा पंडाल का अपना विशेष महत्व हैं।


यह पंडाल लालबागचा राजा पंडाल से केवल कुछ ही दूरी पर है इस पंडाल की शुरुआत 1928 में की गई थी। यह मुंबई के सबसे मशहूर गणेश पंडालों में से एक है। हर साल इसे एक थीम पर आधार करके बनाया जाता है। यहां पर भारत के प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिकृति बनाई जाती है। यहां आने के लिए आप चिंचपोकली, करी रोड या लोअर परेल स्टेशन उतर सकते हैं यहां से पंडाल की पैदल दूरी है।


Saturday, 16 May 2020

लालबागचा राजा

लालबाग का राजा – गणपति बहुत मशहूर हैं. लोग इन्हें मन्नत के गणपति भी कहते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि यहां आकर गणपति से मांगने पर वो आपकी सभी मुरादे पूरी कर देते हैं. लालबाग का राजा गणपति कितने लोकप्रिय है।लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की स्थापना वर्ष 1934 में हुई थी। यह मुंबई के लालबाग, परेल इलाके में स्थित हैं।यह गणेश मंडल अपने 10 दिवसीय समारोह के दौरान लाखों लोगों को खासा आकर्षित करता है। इस प्रसिद्ध गणपति को ‘नवसाचा गणपति’(इच्छाओं की पूर्ति करने वाले) के रूप में भी जाना जाता है। हर वर्ष केवल दर्शन पाने के लिए यहां करीबन 5 किलोमीटर की लंबी कतार लगती है, लालबाग के गणेश मूर्ति का विसर्जन गिरगांव चौपाटी में दसवें दिन किया जाता है।

लालबाग के राजा की कहानी इस प्रकार है. आज जहां पर लालबाग के राजा विराजमान हैं, पहले वहां पर अंग्रेजों के जमाने में मिल मजदूर रहा करते थें. उसके बाद साल 1930 में विकास के नाम पर उनको वहां से निकला दिया गया, जिसके बाद उन लोगों ने श्री गणपति महराज से ये मन्नत मांगी कि अगर उनके सर की छत बची रही तो वो गणपति जी की प्रतिमा वहां स्थापित करेंगे. बेघर लोगों को नई जगह के साथ-साथ सर पर छत भी मिल गई और उन्होंने अपनी मन्नत मानते हुए वहां उसी समय पर गणपति की एक मुर्ति के स्थापना की और उनको दिया नया नाम, मन्नतों के गणपति. तब से यहां बड़े ही भव्य अंदाज में पूजा-अर्चना होने लगी. लोग यहां दूर-दूर से आते और अपनी-अपनी मन्नत मानते. आज भी ये सिलसिला यू हीं बरकरार है. बता दें कि यहां हर साल उत्सव में गणपति का रुप बदला जाता है. यहां लाखों-करोड़ों की तादात में चढ़ावा आता है, जिससे गरीबों का पेट भरता और वहां रहने वाले मजूबर लोगों की मदद की जाती है.

Sunday, 10 May 2020

16 संस्कार भाग-2

अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम 4- 8 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 8 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।



इस संस्कार को प्रायः दस दिन के सूतक की निवृत्ति के बाद ही किया जाता है। पारस्कर गृहयसूत्र में लिखा है -दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति। कभी न कभी उसके मन में ऐसा भाव अवश्य आता है कि जैसा तेरा नाम है वैसे ही तेरे कर्म भी होने चाहिए। नामकरण संस्कार सन्तान के जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन या एक सौ एकवें दिन में या दूसरे वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो किए जाने की परंपरा रही है । इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर मधुर भाषण कर, सूर्यदर्शन कराया जाता है और कामना की जाती है की बच्चा सूर्य की प्रखरता-तेजस्विता धारण करे, इसके साथ ही भूमि को नमन कर देवसंस्कृति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाता है।हमारे यहां पर यह भी परंपरा रही है कि बच्चों को प्यार करते समय उसका चुंबन नहीं लिया जाएगा। क्योंकि ऐसा करने से बच्चे को संक्रामक रोग लग सकते हैं । इसके स्थान पर बच्चे की नासिका द्वार को स्पर्श करने या बच्चे को सूंघने की परंपरा रही है।

 
निष्क्रमण का अर्थ है - बाहर निकालना। जन्म के चौथे माह में इस संस्कार को संपन्न कराया जाना उचित होता है। इस अवसर पर बाहर के लोग नव शिशु का स्वागत और सत्कार करते हैं । आज भी पहली बार घर से बाहर निकले ऐसे शिशु को लोग बहुत लाड – प्यार करते हैं और उसके चिरायु होने की कामना करते हैं । इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर मधुर भाषण कर, सूर्यदर्शन कराया जाता है और कामना की जाती है की बच्चा सूर्य की प्रखरता-तेजस्विता धारण करे, इसके साथ ही भूमि को नमन कर देवसंस्कृति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाता है। शिशु का नया नाम लेकर सबके द्वारा उसके चिरंजीवी, धर्मशील, स्वस्थ एवं समृद्ध होने की कामना की जाती है।भारतीय चिंतन के अनुसार आत्मा अजर-अमर है। शरीर नष्ट होता है, कितुं जीवात्मा के संचित संस्कार उसके साथ लगे रहते हैं। बालक किस समय, किस नक्षत्र, राशि आदि में उत्पन्न हुआ, यह सब एक निश्चित विधान के अनुसार होता है। इस प्रकार निष्क्रमण संस्कार के समय बालक का परिचय सूर्य , चंद्रमा , सितारे ,नक्षत्र आदि से कराया जाना शास्त्रविहित कर्म है ।


जब बालक 6 माह का हो जाए तो उसे पहली बार अन्न ग्रहण कराया जाना चाहिए । प्रारंभ में बच्चे को गाय के 150 ग्राम दूध में 50 या 60 ग्राम उबला हुआ पानी और एक चम्मच मीठा डालकर बच्चे को पिलाना चाहिए । दूध की मात्रा को धीरे – धीरे बढ़ा सकते हैं और फिर जब भी बच्चे को भूख लगे तो उसे मां अपने दूध के स्थान पर गाय का दूध दे सकती है। चौथे सप्ताह से बच्चे को फलों का रस व सब्जी का रसा भी दिया जा सकता है। उसके पश्चात दही शहद सब्जी के माध्यम से धीरे-धीरे बच्चे को भोजन पर लाया जा सकता है। छठे माह में माता-पिता चांदी के चम्मच से खीर आदि पवित्र और पुष्टिकारक अन्न शिशु को चटाते हैं और निम्नलिखित मंत्र बोलते हैं
    शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ।
    एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतोअंहसः।।
अर्थात् हे बालक! जौ और चावल तुम्हारे लिए बलदायक तथा पुष्टिकारक हों, क्योंकि ये दोनों वस्तुएं यक्ष्मानाशक हैं तथा देवान्न होने से पापनाशक हैं।
इस प्रक्रिया को अपनाने से बच्चे को कभी भी किसी प्रकार का कोई शिशु रोग नहीं सताता। इस प्रकार बच्चे की शिक्षा हमारे यहां पर 5 वर्ष के पश्चात नहीं ,अपितु उसके जन्म की प्रक्रिया अर्थात गर्भाधान संस्कार से ही प्रारंभ हो जाती थी , जिसे आज भी समझने की आवश्यकता है।


चूड़ाकरण (मुडंन, शिखा) संस्कार अष्टम संस्कार है। यह संस्कार पहले या तीसरे वर्ष में कर लेना चाहिये। नयी रचना सृजना से पहले या उसके होते समय कुछ विशेष कष्ट उठाना ही पड़ता है । मां को भी नये सृजन के समय अर्थात बच्चे के प्रसव के समय कष्ट भोगना पड़ता है । इसी प्रकार जब शिशु के दांत निकलते हैं तो उसकी इस नई सृजना के लिए भी उसे कुछ कष्ट होता है । उस समय इस कष्ट के कारण बच्चा चिड़चिड़ा भी हो जाता है । यह प्रक्रिया एक वर्ष से आरंभ होकर 3 वर्ष की अवस्था तक पूर्ण हो जाती है। जन्म के पश्चात् प्रथम वर्ष के अंत तथा तीसरे वर्ष की समाप्ति के पूर्व मुंडन-संस्कार कराना आमतौर पर प्रचलित है, क्योंकि हिंदू मान्यता के अनुसार एक वर्ष से कम की उम्र में मुडंन-संस्कार करने से शिशु की सेहत पर बुरा प्रभाव पडता है और अमंगल होने की आशंका रहती है। इस अवस्था में बच्चे का सिर भारी हो जाता है । सिर में गर्मी बढ़ जाती है । मसूड़े फूल जाते हैं । आंखें आ जाती हैं । जिससे उसके मुंह में लार अधिक बनती है । यही कारण रहा कि इस अवस्था में हमारे ऋषि पूर्वजों ने मुंडन संस्कार कराने का प्रावधान किया । जिससे सिर में कुछ ठंडक अनुभव हो और बच्चे की चिड़चिड़ाहट में कमी आए। यजुर्वेद में लिखा है-

नि वर्त्तयाम्यायुषेड्न्नाद्याय प्रजननाय।
रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय।।

अर्थात् हे बालक! मैं तेरी दीर्घायु के लिए, तुझे अन्न-ग्रहण करने में समर्थ बनाने के लिए, उत्पादन शाक्ति प्राप्ति के लिए, ऐश्वर्य वृद्धि के लिए, सुंदर संतान के लिए एवं बल तथा पराक्रम प्राप्ति के योग्य होने के लिए तेरा चूडाकर्म संस्कार (मूडंन) करता हूं।


Thursday, 7 May 2020

16 संस्कार

अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम पहले 4 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 12 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।


1. गर्भाधान

गर्भाधान से पहले व गर्भाधान के समय जैसी शारीरिक व मानसिक स्थिति माता-पिता की होती है, उसी का प्रभाव आने वाली सन्तान पर पड़ता है।  गर्भाधान की यह क्रिया बहुत महत्वपूर्ण क्रिया है । उस क्रिया से हमारे देश , समाज व राष्ट्र का भूत , वर्तमान और भविष्य तीनों जुड़े होते हैं । वैदिक संस्कृति की यह मान्यता है कि हम जैसी संतान चाहते हैं वैसी ही संतान प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए शर्त केवल एक ही है कि माता – पिता बनने की इच्छा रखने वाले पति – पत्नी स्वयं संयमी , विवेकी , वैराग्यवान , विद्यावान और त्यागी – तपस्वी विचारधारा के धनी हों। यह एक बच्चे के लिए उत्साहपूर्ण प्रार्थना है. एक अच्छा बच्चा पैदा करने के लिए, उसकी माँ और पिता को शुद्ध विचार रखने चाहिए और शास्त्रों के नियमों का पालन करना चाहिए/ दुनिया में एक अच्छे बच्चे को लाने के लिए माता-पिता की भूमिका निभाना आवश्यक है.

 2. पुंसवन 

यह दूसरा संस्कार समारोह गर्भावस्था के तीसरे या चौथे महीने के दौरान किया जाता है. सुश्रुतसंहिता के अनुसार जिस समय स्त्री ने गर्भधारण कर रखा हो, उन्हीं दिनों में लक्ष्मणा, वटशुंगा, सहदेवी और विश्वदेवा — इनमें से किसी एक औषधी को गोदुग्ध के साथ खूब महीन पीसकर उसकी तीन या चार बूँदें उस स्त्री की दाहिनी नासिका के छिद्र में डालें। इससे उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।  पहले संस्कार यानी गर्भदान की तरह, पुंसवन संस्कार भी परिवार के सदस्यों के लिए प्रतिबंधित है। स्मृतिसंग्रह में लिखा है-

गर्भाद् भवेच्च पुंसूते पुंस्त्वस्य प्रतिपादनम्

अर्थात् इस गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो, इसलिए पुंसवन-संस्कार किया जाता है।

जब महिला गर्भ अवस्था काल में गर्भस्थ शिशु के दिव्य निर्माण के दृष्टिगत अपने लिए ऐसी साधना की रूपरेखा खींचती है तो सचमुच वह दिव्य संतति को उत्पन्न करती है , इसीलिए हमारे समाज में माता को निर्माता कहकर संतान के निर्माण में उसके महत्वपूर्ण योगदान को नमन किया गया है।

3.सीमंतोन्नायन 

   इस संस्कार के माध्यम से गर्भस्थ शिशु के मस्तिष्क का विकास करने का विधान किया गया है । सीमन्त का अर्थ ही मस्तिष्क है और उन्नयन का अर्थ उसका विकास करना है । कहने का तात्पर्य है कि जिस संस्कार के माध्यम से बच्चे का मानसिक विकास किया जाए उसे सीमंतोन्नयन संस्कार कहते हैं । इस संस्कार को चौथे या छठे फिर आठवें माह में किए जाने का विधान है । सुश्रुत के अनुसार पांचवें महीने में मन अधिक जागृत होता है, छठे में बुद्धि जागृत होती है तो सातवें में अंग-प्रत्यंग अधिक व्यक्त होने लगते हैं। जबकि आठवें माह में ओज अधिक अस्थिर रहता है। आठवें महीने में गर्भस्थ शिशु के शरीर मन बुद्धि और हृदय सबका विकास हो जाता है। बच्चे के हृदय का विकास हो जाने के कारण इस अवस्था में आकर गर्भवती महिला दो हृदयों वाली कहीं जाने लगती है। इस अवस्था में गर्भवती महिला को कुछ ऐसी वस्तुओं के खाने का निर्देशन किया गया है जिससे गर्भस्थ शिशु के तन का अच्छा विकास हो सके।  अर्जून ने अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूहभेदन की जो शिक्षा दी थी, वह सब गर्भस्थशिशु अभिमन्यु सीख ली थी। उसी शिक्षा के आधार पर 16 वर्ष की आयु में ही अभिमन्यु ने अकेले 7 महारथियों से युद्ध कर चक्रव्यूह-भेदन किया।इस संस्कार को करते समय शास्त्रवर्णित गूलर वनस्पति द्वारा गार्भिणी पत्नी के सीमंत (मांग) का ॐ भूर्विनयामि, ॐ भूर्विनयामि, ॐ भूर्विनयामि, पढते हुए और पृथक् करणादि क्रियाएं करते हुए पति को निम्नलिखित मंत्रोच्चारण करना चाहिए 

-येनादितेः सीमानं नयाति प्रजापतिर्महते सौभगाय।तेनाहमस्यौ सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि।।

अर्थात जिस प्रकार देवमाता अदिति का सीमंतोन्नयन प्रजापति ने किया था, उसी प्रकार मैं इस गार्भिणी का सीमंतोन्नयन करके इसके पुत्र को जरावस्थापर्यंत दीर्घजीवी करता हूं।

 संस्कार के अंत में वृद्धा ब्राह्मणियों द्वारा पत्नी को आशीर्वाद दिलवाएं। सीमंतोन्नयन-संस्कार में पर्याप्त घी मिली खिचड़ी खिलाने का विधान है। इसका उल्लेख गोभिल गृहयसूत्र में इस प्रकार किया गया है

4. जातकर्म 

बच्चे के जन्म से छह दिन पर किया जाने वाला जात-कर्म घर की शुद्धि के लिए होता है. यह एक बच्चे को एक स्वच्छ वातावरण में रखने के लिए किया जाता है जहां वह किसी भी शारीरिक या मानसिक समस्या के प्रभाव में न आ सके. इसे षष्ठी भी कहा जाता है. देवी षष्ठी बच्चों की रक्षक हैं.  च्चे की त्वचा को साफ करने के लिए साबुन या बेसन और दही को मिलाकर उबटन के रूप में परिवार की वृद्ध महिला मल देती है। स्नान के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग होता है। चरक के अनुसार कान को साफ करके वे शब्द सुन सकें इसलिए कान के पास पत्थरों को बजाना चाहिए। शिशु के तन को कोमल वस्त्र या रुई से सावधानीपूर्वक साफ-सुथरा कर गोद में लेकर देवयज्ञ करके स्वर्ण शलाका को सममात्रा मिश्रित घी-शहद में डुबोकर उसकी जिह्वा पर ॐ नाम लिखा जाए । इस क्रिया के करने से उस बच्चे का वाक् देवता जागृत किया जाता है। उस शिशु के दाहिने तथा बाएं कान में ”वेदोऽसि“ भी कहा जाता है । जिसका अर्थ होता है – तू ज्ञानवान प्राणी है, अज्ञानी नहीं है। इस प्रकार ” मैं मूरख फ़लकामी ” – न कहकर मैं अमृत पुत्र हूं या तू अमृत पुत्र है , ऐसा कहने की भारत की परंपरा रही है। इतनी क्रिया प्रक्रियाओं के करने के पश्चात मां अपने स्थान से शिशु को दूध पिलाएगी तो वह बच्चा समझ जाएगा कि अब तू अमृत पान कर रहा है और तेरी तैयारी संसार में अमृतत्व को प्राप्त करने के लिए प्रारंभ हो गई है। जात-कर्म का पालन ग्रहा पूजा, होमा के साथ किया जाता हैं।

Monday, 4 May 2020

जानिए हिंदू धर्म कितने संस्कारों की धरोहर हैं।

 सनातन अथवा हिन्दू धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिये संस्कारों का अविष्कार किया। धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति की महानता में इन संस्कारों का महती योगदान है।प्राचीन काल में हमारा प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। संस्कारों के द्वारा मानवीय मन को एक विशिष्ट वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर निर्मल, सन्तुलित एवं सुसंस्कृत बनाया जाता है । जीवन में काम आने वाले सत्यवृत्तियों का बीजारोपण भी इन संस्कारों के समय होता है ।

संस्कारों के संबंध में आद्य गुरु शंकराचार्य ने कहा है- संस्कारों हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्योषाप नयनेन वा ॥ -ब्रह्मसूत्र भाष्य 1/1/4

अर्थात: व्यक्ति में गुणों का आरोपण करने के लिए जो कर्म किया जाता है, उसे संस्कार कहते हैं।

 प्राचीन काल में संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में ४० संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव २५ संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में १६ संस्कारों का वर्णन हुआ है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से १६ संस्कारों की व्याख्या की गई है। 
गर्भाधानं पुंसवनं सीमंतो जातकर्म च। नामक्रियानिष्क्रमणेअन्नाशनं वपनक्रिया:।। कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारंभक्रियाविधि:। केशांत स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह:।। त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्कारा: षोडश स्मॄताः। (व्यासस्मॄति १/१३-१५)

इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण ये सभी संस्कार नवजात का दैवी जगत् से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं।
नामकरण के बाद चूडाकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इसके बाद विवाह संस्कार होता है। यह गृहस्थ जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। हिन्दू धर्म में स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सबसे बडा संस्कार है, जो जन्म-जन्मान्तर का होता है।

गर्भाधान से विद्यारंभ तक के संस्कारों को गर्भ संस्कार भी कहते हैं। इनमें पहले तीन (गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन) को अन्तर्गर्भ संस्कार तथा इसके बाद के छह संस्कारों को बहिर्गर्भ संस्कार कहते हैं। गर्भ संस्कार को दोष मार्जन अथवा शोधक संस्कार भी कहा जाता है। दोष मार्जन संस्कार का तात्पर्य यह है कि शिशु के पूर्व जन्मों से आये धर्म एवं कर्म से सम्बन्धित दोषों तथा गर्भ में आई विकृतियों के मार्जन के लिये संस्कार किये जाते हैं। बाद वाले छह संस्कारों को गुणाधान संस्कार कहा जाता है। दोष मार्जन के बाद मनुष्य के सुप्त गुणों की अभिवृद्धि के लिये ये संस्कार किये जाते हैं।

हमारे मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिये अपने अथक प्रयासों और शोधों के बल पर ये संस्कार स्थापित किये हैं। इन्हीं संस्कारों के कारण भारतीय संस्कृति अद्वितीय है। हालांकि हाल के कुछ वर्षो में आपाधापी की जिंदगी और अतिव्यस्तता के कारण सनातन धर्मावलम्बी अब इन मूल्यों को भुलाने लगे हैं और इसके परिणाम भी चारित्रिक गिरावट, संवेदनहीनता, असामाजिकता और गुरुजनों की अवज्ञा या अनुशासनहीनता के रूप में हमारे सामने आने लगे हैं।संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोच्चारण आदि होता है, उसका वैज्ञानिक महत्व भी होता है। समय के अनुसार बदलाव जरूरी है लेकिन हमारे मनीषियों द्वारा स्थापित मूलभूत सिद्धांतों को नकारना कभी श्रेयस्कर नहीं होगा।
  1. गर्भाधान
  2. पुंसवन
  3. सीमन्तोन्नयन
  4. जातकर्म
  5. नामकरण
  6. निष्क्रमण
  7. अन्नप्राशन
  8. चूड़ाकर्म
  9. विद्यारम्भ
  10. कर्णवेध
  11. यज्ञोपवीत
  12. वेदारम्भ
  13. केशान्त
  14. समावर्तन
  15. विवाह
  16. अन्त्येष्टि