Sunday, 7 June 2020

16 संस्कार भाग - 4

अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम 13 - 16 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 4 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।


इस संस्कार में बालक जब 16 वर्ष का होता है तो पहली बार उसकी दाढ़ी-मूछ काटी जाती है। गुरु के समीप रहते हुए जब बालक विधिवत् शिक्षा ग्रहण करते हुए युवा अवस्था में प्रवेश करता है गुरु
उसका केशान्त संस्कार करता है। और वह अपने गुरु को गुरु दक्षिणा में गाय दान देता है इसीलिए इसे गोदान संस्कार भी कहा जाता है। गुरुकुल में वेदाध्ययन प्राप्त करने के बाद आचार्य के सम्मुख यह संस्कार संपन्न किया जाता था। यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम  होता है।

समावर्तन संस्कार 

समावर्तन ‘गुरुकुल’ में वेदों की औपचारिक शिक्षा की समाप्ति से जुड़ा हुआ समारोह है. समावर्तन संस्कार विद्याध्ययन के उपरांत ब्रह्मचारी अथवा ब्रह्मचारिणी के गुरु के आश्रम से अपने माता – पिता के घर लौटने का संस्कार है । एक प्रकार से यह संस्कार नव सृजन की तैयारी के प्रतीक के रूप में लिया जाना चाहिए । क्योंकि इसके पश्चात ही नवयुवक और नवयुवती अथवा ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी विवाह संस्कार के लिए मानसिक रूप से तैयार होते हैं । इस प्रकार यह संस्कार एक नए सृजन के लिए या समाज की शुद्ध संरचना के लिए किया जाता है। जब वह जीवन के नियम के बारे में अपनी शिक्षा पूरी करता है, तो उसका पहला आश्रम ब्रह्मचर्य पूरा होता है. अब वह गृहस्थ अवस्था में प्रवेश करने के योग्य है और विवाह करने के लिए योग्य पुरुष माना जाता है।

इस समावर्तन-संस्कार के संबध में कथा प्रचलित है- एक बार देवता, मनुष्य और असुर तीनों ही ब्रह्माजी के पास ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्याध्ययन करने गये। कुछ काल बीत जाने पर उन्होंने ब्रह्माजी से उपदेश (समावर्तन) ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की। सबसे पहले देवताओं ने कहा-प्रभो ! हमें उपदेश दीजिए। प्रजापति ने एक ही अक्षर कह दिया ‘ द ‘। इस पर देवताओं ने कहा- हम समझ गए। हमारे स्वर्गादि लोकों में भोगों की ही भरमार है। उनमें लिप्त होकर हम अंत में स्वर्ग आत्मिक आनन्द से गिर जाते हैं, अतएव आप हमें ‘द ‘ से दमन अर्थात इंद्रियसयंम का उपदेश कर रहे है। तब प्रजापति ब्रह्मा ने कहा- ठीक है, तुम समझ गए। फिर मनुष्यों को भी ‘द’ अक्षर दिया गया तो उन्होंने कहा-हमें ‘द’ से दान करने का उपदेश दिया है, क्योंकि हम लोग जीवन भर संग्रह करने की ही लिप्सा में लगे रहते हैं। अतएव हमारा दान में ही कल्याण है। प्रजापति इस जवाब से संतुष्ट हुए। 

असुरों को भी ब्रह्मा ने उपदेश में ‘ द’ अक्षर ही दिया। असुरों ने सोचा-हमारा स्वभाव हिंसक है और क्रोध व हिंसा हमारे दैनिक जीवन में व्याप्त है, तो निश्च्य ही हमारे कल्याण के लिए दया ही एकमात्र मार्ग होगा। दया से ही हम इन दुष्कर्मों को छोड़कर पाप से मुक्त हो सकते हैं। इस प्रकार हमें ‘द ‘ से दया अर्थात प्राणि-मात्र पर दया करने का उपदेश दिया है। ब्रह्मा ने कहा-ठीक है, तुम समझ गए। निश्च्य ही दमन, दान और दया जैसे उपदेश को प्रत्येक मनुष्य को सीखकर अपनाना उन्नति का मार्ग होगा।
समावर्तन संस्कार अथवा दीक्षांत समारोह के इसी प्रकार के अन्य अनेकों उदाहरण हैं । जिनसे गुरु के द्वारा शिष्य को दीक्षांत समारोह के अवसर पर दिए गए उत्कृष्टतम ज्ञान का पता चलता है।



मनुस्मृतिकार ने तृतीय अध्याय में लिखा है कि तीन वेदों का, दो वेदों का अथवा एक वेद का अध्ययन
पूर्ण करके अविलुप्त ब्रह्मचर्य स्नातक का विवाह संस्कार किया जाना चाहिए। यह संस्कार मनुष्य की मृत्यु से पूर्व का अंतिम संस्कार है। विवाह का अर्थ है ‘विशेषेण वाह्यते इति विवाह:’ अर्थात विशिष्ट प्रकार से वहन करना विवाह है। सृष्टि के तीन शाश्वत सत्यों उत्पति, स्थिति और प्रलय में से स्थिति अवयव के लिए विवाह को सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। वहीं पितृऋण से मुक्ति के लिए यह संस्कार आवश्यक है। इस संस्कार में स्त्री और पुरुष संयुक्त रूप से धर्म की पालना का संकल्प लेते हैं और एक दूसरे के हाथ को विशिष प्रकार से वहन करते हैं। इसीलिए इस संस्कार को पाणिग्रहण संस्कार भी कहा जाता है।


मृत्यु के पश्चात किया जाने वाला संस्कार।

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