Thursday, 21 November 2019

संगीत से चिकित्सा

नियमित रूप से गायत्री मंत्र और मृत्युंजय मंत्र का जाप करने वाली अमरीका की ख्यातनाम म्यूजिक थैरेपिस्ट पैट मोफिट कुक रंजनी ए. सिंह को ध्वनि के चिकित्सकीय महत्व के बारे में बता रही हैं।
 
 
ध्वनि (साउंड)से आप क्या समझती हैं? 
ध्वनि पवित्र है। विश्वभर की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में ध्वनि को ब्रह्मांड की रचना करने, उसे बनाए रखने और पोषण करने में महत्वपूर्ण माना गया है। यह विश्वास कि कंपन (वाइब्रेशन)सभी दृश्य-अदृश्य चीजों में व्याप्त है, संगीत से चिकित्सा का वैज्ञानिक आधार रहा है। उदाहरण के लिए, ओझा, नील, मेंबो, झनकरी और शमन जैसे लोग काफी समय से संगीत से देसी चिकित्सा करते आए हैं और वे एक तरह से मनोवैज्ञानिक और फिजिशियन हैं। वे ध्वनि का इस्तेमाल भीतरी चेतना जाग्रत करने, दर्द से छुटकारा दिलाने और उत्कर्ष तक पहुंचने के मुख्य साधन के रूप में करते हैं। ध्वनि का प्रभाव प्रकृति, पशु और इंसानों पर समान रूप से होता है। मैं 2011 में पांजाल में आयोजित अतिरात्र यज्ञ के दौरान भारत में थी, जहां लगातार बारह दिनों तक ऋग् और सामवेद के मंत्रों का जाप किया गया था। ऐसे असाधारण माहौल में रहना मेरे लिए काफी ज्ञानवर्धक और स्फूर्तिदायक रहा।
 
 
क्या अमरीका में वेद मंत्रों से चिकित्सा की जाती है?
 
मुझे पूरी तौर पर मालूम नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए जरूर वेदोंं का प्रयोग किया जाता है। लोगों का विश्वास है कि वेदों के मंत्रों और संस्कृत श्लोकों में हीलिंग वाइब्रेशंस होते हैं। लोग उनका अर्थ समझें या ना समझें, लेकिन वे उनसे प्रभावित होते हैं और खुद को अच्छा महसूस करते हैं। और यही वजह है कि वैदिक परंपराएं अब भी जीवित हैं।
 
 
 
संगीत से चिकित्सा कैसे संभव है?
 
संगीत चिकित्सा इस सिद्धांत पर आधारित है कि कुछ खास तरह की ताल और लय में मस्तिष्क की क्रियाओं को स्लो डाउन करने की क्षमता होती है और ऐसा करके ये दुख-दर्द या चिंताओं को कम करते हैं। संगीत और मंत्रोच्चार से भीतर कान को काफी शांति मिलती है। भावात्मक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक-तीनों रूपों में। कुछ अस्पतालों में सर्जरी से पहले रोगी को एनेस्थिशिया के लिए मानसिक रूप से तैयार करने के लिए संगीत बजाया जाता है। ऑपरेशन से पहले संगीत सुकून देता है और यह व्यक्ति को आराम देने के लिए है। ऑपरेशन के बाद जोशीला संगीत सुनाया जाता है ताकि रोगी में उत्साह और जोश बना रहे और वह जल्द सामान्य स्थिति में आ जाए। हमने संगीत से चिकित्सा के कुछ अध्ययनों में यह पाया कि जब दीर्घ स्वर और दीर्घ श्वास होती है, तो यह मस्तिष्क के सामनेे के कॉर्टेक्स को एकाग्र होने में मदद करती है, लगभग ध्यान की तरह। इसीलिए, जब हम मंत्रों को सुनते हैं, या तो उनींदा महसूस करते हैं या फिर एकाग्र या सजग। मंत्रोच्चार का अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग असर होता है।
 
 
 
आप ध्वनि चिकित्सा का किस तरह प्रयोग करती हैं?
 
मैं उन ध्वनियों का प्रयोग करती हूं, जो थोड़ी भिन्न होती हैं, और सुनने वाले के लिए अपरिचित होती हैं, क्योंकि यह थिंकिंग प्रोसेस का विस्तार करने में मदद करती हैं। मैं दूसरी संस्कृतियों से उपचारात्मक ध्वनियों का प्रयोग करती हूं, क्योंकि उनमें कुछ खास तरह के ध्वनिक तत्व होते हैं। उच्च आवृत्ति की ध्वनियों का प्रयोग, खासकर अनुनासिक, शायद मन को जाग्रत करता है या दर्द से रोगी का ध्यान हटाता है। संगीत का प्रयोग 'कंटेनरÓ प्रभाव पैदा करने के लिए किया जाता है। इससे रोगी को आराम मिलता है और वह सकारात्मक प्रतिक्रिया करता है। उदाहरण के लिए हम उन रोगियों पर ग्रेगरी और वैदिक मंत्रों का प्रयोग करते हैं, जो ऑटिस्टिक हैं अथवा जो अपना ध्यान पूरी तौर पर एकाग्र नहीं (अटेंशन डेफिसिट डिसॉर्डर) कर पाते हैं।  
 
 
 
दूसरी संस्कृति का संगीत समझ में न आने पर भी यह कैसे उपचार कर सकता है?
 
संगीत में ऐसे तत्व हैं, जो विश्व संस्कृति से आए हैं और हम उसका इस्तेमाल बाइनॉरल बीट्स (द्विकर्णी ताल)के साथ करते हैं। बाइनॉरल बीट्स ऑडियोज हैं, जिन्हें आपकी ब्रेनवेव्ज को ट्रेन करने के लिए तैयार किया गया है ताकि वे मानव मस्तिष्क की सर्वाधिक शक्तिशाली आवृत्तियों तक पहुंच सकें। बाइनॉरल बीट्स को एक खास आवृत्ति पर दोनों कानों के पास दो अलग-अलग टोन में बजाया जाता है। चूंकि इनका ब्रेनवेव्ज पर सीधा प्रभाव होता है, वे मूड, व्यवहार, यहां तक कि चेतना (कॉन्शियसनेस)को बदल सकते हैं। प्राचीन समय के देसी लोक कलाकार यह सदियों से कर रहे हैं। घंटियों जैसे साज वे इस्तेमाल करते हैं, उनसे बाइनॉरल बीट्स पैदा होती हैं। मैं मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध में समान कॉम्युनिकेशन के लिए तिब्बती घंटियों का इस्तेमाल करती हूं। इससे आप व्यवस्थित होते हैं, सुकून मिलता है और अच्छी नींद आने में मदद मिलती है।   
 
 
 
क्या रैप और पॉप म्यूजिक के आदी खुद को देसी उपचारात्मक संगीत से जोड़ पाते हैं?
 
यहां व्यवहारवादी और मनोवैज्ञानिक अप्रोच अधिक काम करती है। धीरे-धीरे हम आध्यात्मिकता से दूर होते जा रहे हैं, जो व्यक्ति के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखता है, हमारी सेहत की प्राकृतिक समझ (आध्यात्मिक अर्थ में) को अलाइन में रखता है। दूसरी संस्कृति का पवित्र उपचारात्मक संगीत उन लोगों का भी उपचार कर सकता है, जो रैप और पॉप सुनते हुए बड़े हुए हैं।
 
 
 
आप यह कैसे जानती हैं कि खास तरह की टोन या नोट्स अमुक बीमारी में काम करेंगे?
 
मैंने यह चीन, भारत और इंडोनेशिया से सीखा-समझा है। सभी जिस बात पर जोर देते हैं, वह है रिदम; दूसरा, उन सबमें ऐसा कंपोजिशन करने की क्षमता है, जो ब्रेनवेव्स और पल्स रेट को कम कर सकती है। सही संगीत से आप ऑपरेशन के लिए जा रहे व्यक्ति की पल्स रेट 80 से 50 प्रति मिनट तक ला सकते हैं। आराम की इस स्थिति में, उसकी चिंता कम होती है और सारी प्रक्रिया आसान हो जाती है।
 
 
फास्ट म्यूजिक आपको जाग्रत कर देता है। यदि आप तेज लय को ऊंची आवृत्ति वाले साज के साथ मिला देते हैं(सितार, सरोद या गिटार), तो ये वास्तव में ब्रेन सेल्स को एक्साइट करते हैं। सर्जरी करवा कर आने वाला व्यक्ति इस तरह का जोशिला संगीत सुनकर अच्छी प्रतिक्रिया करता है।
 
 
 
हेवी मेटल म्यूजिक के बारे में आप क्या सोचती हैं?
 
यह दोनों तरह से काम करते हैं। मेटल म्यूजिक नर्वस सिस्टम को अशांत कर सकता है, लेकिन साथ ही सुस्त लोगों में जोश भर सकता है। उनके नर्वस सिस्टम को इस तरह का शॉक नॉर्मल कर सकता है। एक अध्ययन में पौधों और सब्जियों की पैदावार में विभिन्न प्रकार के संगीत-शा ीय, रोमांटिक, पॉप, मेटल आदि के प्रभाव को देखा गया। पाया गया कि मेटल म्यूजिक से पौधे तेजी से उगते हैं, क्योंकि इससे शीघ्रता से सेल डिविजन में मदद मिली। अधिकतर लोगों का मानना है कि शा ीय संगीत से पौधे जल्दी उगते हैं, क्योंकि यह सुकून और शांति देने वाला है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

Thursday, 7 November 2019

मृत्यु के पल

मृत्यु के समय एक शांतिपूर्ण माहौल तैयार करने की परंपरा है। क्या मृत्यु के पल का मरने वाले व्यक्ति के ऊपर प्रभाव पढता है? क्या यह उसके अगले जन्म से जुड़ा है?

 

जिज्ञासु: भगवद्गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘मृत्यु के समय, जो इंसान सिर्फ मुझे याद करते हुए अपना शरीर छोड़ता है, वह नि:संदेह मुझे पा लेता है। हे कुंतीपुत्र, मृत्यु के समय इंसान जिस अवस्था को याद करता है, उसके विचार में मग्न होने के कारण वह उसी अवस्था को पा लेता है। इसलिए हर समय मुझे याद करते हुए अपना धर्म करते रहो। जब तुम्हारा मन और बुद्धि मुझमें लगी रहेगी, तो तुम नि:संदेह मुझे पा लोगे।’ सद्गुरु, क्या यह इतना ही सरल है?

सद्‌गुरु: हां, यह इतना ही सरल है, लेकिन . . .। इस संबंध में एक बहुत सुंदर कहानी है। नारद मुनि जहां भी जाते थे, बस ‘नारायण, नारायण’ कहते रहते थे। नारद को तीनों लोकों में जाने की छूट थी। वह आराम से कहीं भी आ-जा सकते थे। एक दिन उन्होंने देखा कि एक किसान परमानंद की अवस्था में अपनी जमीन जोत रहा था। नारद को यह जानने की उत्सुकता हुई कि उसके आनंद का राज क्या है। जब वह उस किसान से बात करने पहुंचे, तो वह अपनी जमीन को जोतने में इतना डूबा हुआ था, कि उसने नारद पर ध्यान भी नहीं दिया। दोपहर के समय, उसने काम से थोड़ा विराम लिया और खाना खाने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठा। उसने बर्तन को खोला, जिसमें थोड़ा सा भोजन था। उसने सिर्फ ‘नारायण, नारायण, नारायण’ कहा और खाने लगा।

आप जिस पल जीवन के एक आयाम से दूसरे आयाम में जाते हैं  उस समय अगर आप सिर्फ अपनी जागरूकता कायम रख पाएं, तो आपको मुक्ति मिल सकती है।

किसान अपना खाना उनके साथ बांटना चाहता था मगर जाति व्यवस्था के कारण नारद उसके साथ नहीं खा सकते थे। नारद ने पूछा, ‘तुम्हारे इस आनंद की वजह क्या है?’ किसान बोला, ‘हर दिन नारायण अपने असली रूप में मेरे सामने आते हैं। मेरे आनंद का बस यही कारण है।’ नारद ने उससे पूछा, ‘तुम कौन सी साधना करते हो?’ किसान बोला, ‘मुझे कुछ नहीं आता। मैं एक अज्ञानी, अनपढ़ आदमी हूं। बस सुबह उठने के बाद मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम शुरू करते समय मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम खत्म करने के बाद मैं फिर तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। जब मैं खाता हूं, तो तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं और जब सोने जाता हूं, तो भी तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं।’ नारद ने गिना कि वह खुद 24 घंटे में कितनी बार ‘नारायण’ बोलते हैं। वह लाखों बार ऐसा करते थे। मगर फिर भी उन्हें नारायण से मिलने के लिए वैकुण्ठ तक जाना पड़ता था, जो बहुत ही दूर था। मगर खाने, हल चलाने या बाकी कामों से पहले सिर्फ तीन बार ‘नारायण’ बोलने वाले इस किसान के सामने नारायण वहीं प्रकट हो जाते थे। नारद को लगा कि यह ठीक नहीं है, इसमें जरूर कहीं कोई त्रुटि है।

वह तुरंत वैकुण्ठ पहुंच गए और उन्होंने विष्णु से पुछा, ‘मैं हर समय आपका नाम जपता रहता हूं, मगर आप मेरे सामने नहीं प्रकट नहीं होते। मुझे आकर आपके दर्शन करने पड़ते हैं। मगर उस किसान के सामने आप रोज प्रकट होते हैं और वह परमानंद में जीवन बिता रहा है!’ विष्णु ने नारद की ओर देखा और लक्ष्मी को तेल से लबालब भरा हुआ एक बर्तन लाने को कहा। उन्होंने नारद से कहा, ‘पहले आपको एक काम करना पड़ेगा। तेल से भरे इस बर्तन को भूलोक ले जाइए। मगर इसमें से एक बूंद भी तेल छलकना नहीं चाहिए। इसे वहां छोड़कर आइए, फिर हम इस प्रश्न का जवाब देंगे।’ नारद तेल से भरा बर्तन ले कर भूलोक गए, उसे वहां छोड़ कर वापस आ गए और बोले, ‘अब मेरे प्रश्न का जवाब दीजिए।’ विष्णु ने पूछा, ‘जब आप तेल से भरा यह बर्तन लेकर जा रहे थे, तो आपने कितनी बार नारायण बोला?’ नारद बोले, ‘उस समय मैं नारायण कैसे बोल सकता था? आपने कहा था कि एक बूंद तेल भी नहीं गिरना चाहिए, इसलिए मुझे पूरा ध्यान उस पर देना पड़ा। मगर वापस आते समय मैंने बहुत बार ‘नारायण’ कहा।’ विष्णु बोले, ‘यही आपके प्रश्न का जवाब है। उस किसान का जीवन तेल से भरा बर्तन ढोने जैसा है जो किसी भी पल छलक सकता है। उसे अपनी जीविका कमानी पड़ती है, उसे बहुत सारी चीजें करनी पड़ती हैं। मगर उसके बावजूद, वह नारायण बोलता है। जब आप इस बर्तन में तेल लेकर जा रहे थे, तो आपने एक बार भी नारायण नहीं कहा। यानी यह आसान तब होता है जब आपके पास करने के लिए कुछ नहीं होता।’

मृत्यु के पल जरुरी है जागरूकता

जब मृत्यु का पल सामने आ जाता है तो वह कहने के लिए जिसे आप कहना चाहते हैं, पर्याप्त जागरूकता होनी चाहिए। इस संस्कृति में किसी के मरते समय हमेशा ‘ऊं नम: शिवाय’ या ‘राम नाम सत्य है’ बोला जाता है, ताकि मरने वाला अपने आखिरी पल में भगवान का नाम ले या किसी तरह जागरूक हो जाए। आपको कुछ कहने की भी जरूरत नहीं है। आप जिस पल जीवन के एक आयाम से दूसरे आयाम में जाते हैं  उस समय अगर आप सिर्फ अपनी जागरूकता कायम रख पाएं, तो आपको मुक्ति मिल सकती है। मगर उस पल में जागरूक होने के लिए आपको जीवन भर जागरूकता का अभ्यास करना होगा। या आपको किसी ऐसे व्यक्ति की मौजूदगी में होना चाहिए  , जो आपके लिए ऐसा कर सके। इसी संदर्भ में कृष्ण ने कहा था कि अगर मृत्यु के समय आप उनके बारे में ध्यान करें तो वे आकर आपकी मृत्यु को आसान बना देंगे।

यहां वह एक आंतरिक हकीकत की बात कर रहे थे, यानि परम तत्व को पाने का योग। परम तत्व को पाने के लिए अगर आप सही चीजें करें तो सौ फिसदी पक्का है कि आपकी  कोशिश कामयाब होगी क्योंकि इसमें एकमात्र तत्व आप होते हैं। इसमें कोई और नहीं सिर्फ आप होते हैं। इसलिए वह पूरे यकीन से कह सकते थे, ‘आपका ध्यान रखूंगा’। वे जीवन के बाहरी वास्तविकताओं के बारे में ऐसी बात नहीं कह सकते थे, क्योंकि बाहरी हकीकतें तमाम चीजों पर आधारित होती हैं।

अगर आप भौतिक से परे जाने के समय अपनी जागरूकता बरकरार रख सकते हैं, तो आप परम तत्व को पा सकते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर लोगों के लिए आत्मज्ञान प्राप्ति का पल ही शरीर त्यागने का भी पल बन जाता है। जब आप शरीर को छोड़ते हैं उस समय यदि आप जागरूक हो जाएं, तो भी शरीर को तो आप त्यागेंगे ही। लेकिन यदि अपने शरीर को छोडऩे का समय अभी नहीं आया है, और आपकी जागरूकता ऐसे चरम पर पहुंच जाती है, जहां आप और आपका शरीर साफ तौर पर अलग-अलग हो जाते हैं - तो इस स्थिति में आप अपने शरीर में बने नहीं रह पाएंगे - जब तक कि आपके पास कुछ ऐसा सिस्टम न हो जो यह सुनिश्चित कर सकें कि आप अपने शरीर से फिसल न जाएं।

मसलन, समयमा में कई बार लोग शरीर को छोडऩे के कगार पर होते हैं। भाव स्पंदन में भी कई बार ऐसा होता है, जब लोग वाकई छोर पर खड़े होते हैं। चूंकि कुछ नियंत्रण तंत्र बना दिए गए हैं, इसलिए यह सुरक्षित होता है। यदि ये नियंत्रण तंत्र नहीं होते, तो निश्चित रूप से वे शरीर से अलग हो जाते। यह उनके लिए एक सौभाग्य होता, मगर ईशा के लिए अच्छा नहीं होता, इसलिए हम उन्हें जाने नहीं देते। वास्तव में उन्हें जाने न देना एक अपराध है, लेकिन यदि हम उन्हें जाने देंगे तो समाज हमें अपराधी ठहराएगा। इसलिए हम बस वह कर रहे हैं, जो सामाजिक रूप से स्वीकार्य है, न कि जो सही है।

मृत्युके पल के विचार आपके साथ रहते हैं

एक और पहलू यह है कि यदि मृत्यु के समय आपके दिमाग में कोई विचार है तो वह आपके अगले जन्म की प्रकृति का हिस्सा बन जाता है। इसलिए हमें किसी की मृत्यु की प्रक्रिया के समय शांति और खुशहाली का माहौल बनाना चाहिए क्योंकि मरने वाले के दिमाग और भावनाओं में जो भी चीज प्रधान होती है, वह उनके भावी जन्मों की विशेषता बन जाती है।

अगर आप फिर से जन्म लेना चाहते हैं तो निश्चित रूप से आखिरी पल की विशेषता आपके अगले जन्मों में शामिल होगी। लेकिन यदि आप परम तत्व में विलीन होना चाहते हैं, यदि आप उसमें समा जाना चाहते हैं, तो आपका पुनर्जन्म नहीं होगा।

इसी वजह से इस संस्कृति में हमेशा से यह कहा गया है कि आपको अपने परिवार के बीच नहीं मरना चाहिए। लोग अपनी मृत्यु के समय वन चले जाते थे, जिसे वानप्रस्थ कहा गया है। राजा धृतराष्ट्र, उनकी रानी गांधारी और कुंती भी कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद वन चले गए थे। उनके साथ सहायक के रूप में सिर्फ संजय थे। वे सब बूढ़े हो चुके थे इसलिए वे महल में रहने की बजाय मरने के लिए वन चले गए। हालांकि धृतराष्ट्र नेत्रहीन और कई रूपों में मूर्ख थे, मगर फिर भी उनमें इतनी जागरूकता थी, जो आजकल दुनिया में देखने को नहीं मिलती। कुंती ने अपने जीवन में बहुत मुश्किलें झेली थीं। अब उसके बच्चे राजा बन चुके थे, तो वह अब महलों में आनंद से रह सकती थी, मगर उसने भी वन में जाकर शरीर छोडऩे का फैसला किया।

वे वन में चले गए और वहां एक दुर्गम पहाड़ी के ऊपर चढऩे लगे। एक जगह जंगल में आग लगी हुई थी। वे लोग बूढ़े थे, इसलिए न तो भाग सकते थे, न ही जंगल की आग से बच सकते थे, तो उन्होंने खुद को अग्नि को समर्पित करने का फैसला किया। धृतराष्ट्र ने संजय से कहा, 'तुमने अब तक मेरी बहुत सेवा की, मगर तुम्हारी आयु अभी कम है, तुम वापस लौट जाओ। हम तीनों खुद को अग्नि को समर्पित कर देंगे।’ संजय ने उन्हें छोड़कर जाने से इनकार कर दिया और चारो जंगल की आग में जल गए।

जब आप परिवार के बीच मरते हैं, तो आप जुड़ाव की भावना को मन में लेकर मरेंगे जो भविष्य में आपके लिए खुशहाली नहीं लाएगी। आपको पता ही होगा कि हमारे देश में आज भी लोग मरने के लिए काशी जाते हैं, क्योंकि वह एक पवित्र जगह है। वे शिव की कृपा की छाया में मरना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि उनकी मृत्यु के समय उनका परिवार अपनी भावनाएं उनके सामने प्रदर्शित करे।

मृत्यु एकमात्र ऐसी चीज है, जो जीवन में निश्चित है। अगर आपने अपना जीवन अच्छी तरह जिया है, तो मृत्यु कोई बुरी चीज नहीं है। यदि आपने हर पल हिचक, भय, नफरत, और गुस्से के बीच जीवन बिताया है, तो इसका मतलब है कि आपने कभी जीवन नहीं जिया। मृत्यु के समय, अगर आप जीना चाहते हैं तो यह कोई अच्छी बात नहीं है। आखिर, मृत्यु है क्या? आप शरीर को छोड़ रहे हैं। यह शरीर एक ऋण है जो आपने धरती मां से लिया है। मान लीजिए, आपने बैंक से एक करोड़ रुपये का ऋण लिया और अगले पचास सालों में आपने इस एक करोड़ को दस अरब बना लिया, तब यदि आपका बैंकर ऋण वापस मांगेगा तो आप खुशी-खुशी ब्याज सहित उसका ऋण चुका देंगे। उसे दावत और उपहार देंगे। मगर मान लीजिए आपने वे एक करोड़ रुपये उड़ा दिए और सब कुछ गंवा दिया तो बैंकर के आने पर आप आतंकित हो जाएंगे। आप छिपने की कोशिश करेंगे। बहुत सी चालें चलने की कोशिश करेंगे। इसी तरह धरती मां ने आपको यह ऋण दिया। यदि आपने इसे एक आनंदमय जीवन में बदल दिया, अगर आपने वाकई उसका पूरा इस्तेमाल किया और अपने अंदर पूरे मिठास के साथ जीवन जिया, तो जब धरती मां कहती है कि ऋण चुकाने का समय हो गया तो आप खुशी-खुशी उसे चुका देंगे। और उसका कोई ब्याज नहीं होता। जो खुशी-खुशी ऋण चुकाता है, उसके लिए जीवन समाप्त हो जाता है क्योंकि जब आप आनंदित होते हैं, तो आपके अंदर कुदरती तौर पर जागरूकता आती है। जब आप जागरूक होते हैं, तो आप मुक्ति के रास्ते पर होते हैं। अगर आप फिर से जन्म लेना चाहते हैं तो निश्चित रूप से आखिरी पल की विशेषता आपके अगले जन्मों में शामिल होगी। लेकिन यदि आप परम तत्व में विलीन होना चाहते हैं, यदि आप उसमें समा जाना चाहते हैं, तो आपका पुनर्जन्म नहीं होगा। लोग मुझसे कहते हैं, 'सद्‌गुरु इन नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल मत कीजिए, इससे हमें डर लगता है। क्या हम विलीन होकर शून्य हो जाएंगे?’ तो हम यह कह सकते हैं, 'जब आप मुक्ति पा लेते हैं, तो आप सब कुछ हो जाते हैं, हर चीज में शामिल हो जाते हैं।’ जब शिव की बात आती है, तो हम शून्यता की बात करते हैं। लेकिन चूंकि लीला का संबंध कृष्ण से है, तो हम आपके साथ खुशनुमा बातें करना चाहते हैं। आप सब कुछ बन जाएंगे। आप ईश्वर बन जाएंगे। क्या यह सुनने में बेहतर लगता है?

Sunday, 3 November 2019

आपको नहीं पता होगा आरती के बाद क्यों बोलते हैं कर्पूरगौरं मंत्र

'कर्पूरगौरं करुणावतारं ' यह मन्त्र सबसे प्रसिद्ध मंत्रों में से एक है जिससे सभी हिन्दुओ ने कभी न कभी जरूर सुना ही होगा। यह भगवान शिव से संबंधित एक प्राचीन संस्कृत श्लोक और लोकप्रिय आरती है। जोकि हमें यजुर्वेद से मिला है, यजुर्वेद हिंदू धर्म के चार प्रमुख ग्रंथों में से एक है।
भगवान शिव, हिन्दुओ के तीनो प्रमुख देवताओ में से एक है जिन्हे शंकर, रुद्र, भोलेनाथ, नीलकंठ और महादेव के नाम से भी जाना जाता है। वह परम पूज्य हिंदू देवता है। हिंदू पद्धतियों और पुराणों के अनुसार उन्हें विनाशक या बदलाव लाने वाला भी कहा जाता है। शिव शब्द शुभ को दर्शाता है। भगवान शिव पापो और दुष्टो का विनाश करते है और संसार का कल्याण करते है। शिव को शंकर नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है शुभकर्ता यानी की कल्याण करने वाला। शिव बुराई को नष्ट करने वाले है शिव कल्याणकारी है और साथ ही शिव त्याग की मूर्ति भी है।

शिवयजुर्मन्त्र – Sivayajurmantra (कर्पूरगौरं करुणावतारं)

शिव यजूर मंत्र (कर्पूरगौरं करुणावतारं) एक शक्तिशाली मंत्र है जो आमतौर पर आरती के समय के दौरान बोला जाता है। यह भगवान शिव को प्रसन करने के लिए सबसे लोकप्रिय हिंदू मंत्रों में से एक है। जोकि कुछ इस प्रकार से है –

कर्पूरगौरं करुणावतारं
संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम् ।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे
भवं भवानीसहितं नमामि ॥


karpūragauraṁ karuṇāvatāraṁ
sansārsāram bhujagendrahāram ।
sadāvasantaṁ hṛdayāravinde
bhavaṁ bhavānīsahitaṁ namāmi ।।

भगवान शिव को समर्पित सभी मंत्रों में से शिवयजुर्मन्त्र सबसे शुद्ध मंत्र माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंत्र का जप करते हुए भक्त आध्यात्मिक रूप से परमानंद महसूस करते हैं क्योंकि यह मंत्र उच्चतम क्रम में शिव की महिमा का गुणगान करता है। आइए समझें कि इसका क्या अर्थ है।

कर्पूरगौरं करुणावतारं मंत्र का अर्थ – Karpur Gauram Karunavtaram Mantr

कर्पूरगौरं  वह जो एक कपूर के रंग के सामान शुद्ध और गौर वर्ण वाले है।

करुणावतारं  उनका व्यक्तित्व करुणा का है।

संसारसारं  वह जो दुनिया/सृष्टि का सार है।

भुजगेंद्रहारम्  जो सांप को माला के रूप में धारण करते हैं।

सदा वसतं हृदयाविन्दे – वे हमेशा कमल की तरह हृदय में रहते हैं। हृदय जो कमल की तरह शुद्ध है। कमल, हालांकि गंदे पानी में पैदा होता है, लेकिन फिर भी उसके चारों ओर का कीचड़ उसे छू भी नहीं पता है। इसी प्रकार, भगवान शिव सदा जीवों के हृदय में रहते हैं जिसपर सांसारिक बुराइओं का प्रभाव नहीं पड़ता।

भवंभावनी सहितं नमामि – देवी भवानी (शिव की पत्नी) के साथ, उनको मेरा नमन है।

मन्त्र का पूरा अर्थ है- जो कपूर की तरह शुद्ध और गौर वर्ण वाले हैं, वह करुणा के साक्षात् रूप है, वही इस संसार का सार है और भुजंगों का हार धारण करते हैं। वे भगवान शिव माता पार्वती सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करते है और उन्हें मेरा नमन है।

लेकिन यही मंत्र क्यों...  
 
किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारम....मंत्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं। भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई मानी गई है। अमूमन ये माना जाता है कि शिव शमशान वासी हैं, उनका स्वरुप बहुत भयंकर और अघोरी वाला है। लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरुप बहुत दिव्य है। शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है, वे मृत्युलोक के देवता हैं, उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति। ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का अधिपति है, वो हमारे मन में वास करे। शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं। हमारे मन में शिव वास करें, मृत्यु का भय दूर हो।


Friday, 1 November 2019

गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र:- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र को वेदों का सर्वश्रेष्ठ मंत्र बताया गया है। इसके जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। गायत्री मंत्र का जप का पहला समय है प्रात:काल, सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के पश्चात तक करना चाहिए।

मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है।

तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए। इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से जप करना चाहिए। मंत्र जप तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।

गायत्री मंत्र का अर्थ :-



गायत्री मंत्र का अर्थ : सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।

अथवा

उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।


पढ़ने में भी मन लगाए :-

विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र बहुत लाभदायक है। रोजाना इस मंत्र का 108 बार जप करने से विद्यार्थी को सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने में आसानी होती है। पढऩे में मन नहीं लगना, याद किया हुआ भूल जाना, शीघ्रता से याद न होना आदि समस्याओं से भी मुक्ति मिल जाती है।



दरिद्रता का नाश करे :-

व्यापार, नौकरी में हानि हो रही है या कार्य में सफलता नहीं मिलती, आमदनी कम है तथा व्यय अधिक है तो गायत्री मंत्र का जप काफी फायदा पहुंचाता है। शुक्रवार को पीले वस्त्र पहनकर हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान कर गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप करने से दरिद्रता का नाश होता है। इसके साथ ही रविवार को व्रत किया जाए तो अधिक लाभ होता है।



संतान का वरदान :-

किसी दंपत्ति को संतान प्राप्त करने में कठिनाई आ रही हो या संतान से दुखी हो अथवा संतान रोगग्रस्त हो तो प्रात: पति-पत्नी एक साथ सफेद वस्त्र धारण कर 'यौं' बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। संतान संबंधी किसी भी समस्या से शीघ्र मुक्ति मिलती है।



शत्रुओं पर विजय :-

शत्रुओं के कारण परेशानियां झेल रहे हैं तो मंगलवार, अमावस्या अथवा रविवार को लाल वस्त्र पहनकर माता दुर्गा का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र के आगे एवं पीछे 'क्लीं' बीज मंत्र का तीन बार सम्पुट लगाकार 108 बार जाप करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।।

विवाह कराए गायत्री मंत्र :-

यदि विवाह में देरी हो रही हो तो सोमवार को सुबह के समय पीले वस्त्र धारण कर माता पार्वती का ध्यान करते हुए 'ह्रीं' बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर 108 बार जाप करने से विवाह कार्य में आने वाली समस्त बाधाएं दूर होती हैं। यह साधना स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं।


रोग निवारण :-

यदि किसी रोग से मुक्ति जल्दी चाहते हैं तो किसी भी शुभ मुहूर्त में एक कांसे के पात्र में स्वच्छ जल भरकर रख लें एवं उसके सामने लाल आसन पर बैठकर गायत्री मंत्र के साथ 'ऐं ह्रीं क्लीं' का संपुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। जप के पश्चात जल से भरे पात्र का सेवन करने से गंभीर से गंभीर रोग का नाश होता है। यही जल किसी अन्य रोगी को पीने देने से उसका रोग भी नाश होता हैं।


गायत्री हवन से रोग नाश :-

किसी भी शुभ मुहूर्त में दूध, दही, घी एवं शहद को मिलाकर 1000 गायत्री मंत्रों के साथ हवन करने से चेचक, आंखों के रोग एवं पेट के रोग समाप्त हो जाते हैं। इसमें समिधाएं पीपल की होना चाहिए।

गायत्री मंत्रों के साथ नारियल का बुरा एवं घी का हवन करने से शत्रुओं का नाश हो जाता है। नारियल के बुरे मे यदि शहद का प्रयोग किया जाए तो सौभाग्य में वृद्धि होती है।