अग्नि देवता पंच तत्वों में से एक है। इन्हे यज्ञ और हवन का सबसे महान अंग मानते है। हवन के माध्यम से इन्ही के द्वारा हव्य देवताओ तक पहुँचाई जाती है। अत: इन्हे सभी देवताओ का मुख भी कहते है। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।
पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी का नाम स्वाहा है। इनके तीन पुत्र नाम पावक, पवमान तथा शुचि है।
अग्नि देव की कृपा के हिन्दू धार्मिक पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा लेने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुंडल मांगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुंच उनकी आज्ञा से महारानी का कुण्डल प्राप्त किया। रानी ने कुंडल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुंडलो को सावधानी से ले जाइयेगा नहीं तो तक्षकनाग कुंडल छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुंडलो के लेकर पाताल में चला गया। अग्नि देव की कृपा से ही उत्तंक ने दुबारा कुंडल प्राप्त किए और उन्हें गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। अग्नि देव ने ही अपने ब्रम्हचारी भक्त उपकोशल को ब्रम्ह विद्या का उपदेश दिया था।
अग्नि देव की प्रार्थना और उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त कर सकता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है। अग्नि देव का बीजमन्त्र ‘रं’ तथा मुख्य मंत्र ‘रं वहिन्चैतन्याय नमः’ है।
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