Thursday, 7 May 2020

16 संस्कार

अब हम इस अध्याय में उन 16 संस्कारों का संक्षिप्त विवरण देंगे जो भारत की अथवा हिंदुत्व की चेतना के मूल स्वरों में सम्मिलित हैं । अध्ययन की सुविधा के लिए हमने इन 16 संस्कारों को 4 भागों में विभक्त कर लिया है । इस अध्याय में हम पहले 4 संस्कारों के बारे में तो दूसरे अध्यायों में हम शेष 12 संस्कारों के बारे में चर्चा करेंगे।


1. गर्भाधान

गर्भाधान से पहले व गर्भाधान के समय जैसी शारीरिक व मानसिक स्थिति माता-पिता की होती है, उसी का प्रभाव आने वाली सन्तान पर पड़ता है।  गर्भाधान की यह क्रिया बहुत महत्वपूर्ण क्रिया है । उस क्रिया से हमारे देश , समाज व राष्ट्र का भूत , वर्तमान और भविष्य तीनों जुड़े होते हैं । वैदिक संस्कृति की यह मान्यता है कि हम जैसी संतान चाहते हैं वैसी ही संतान प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए शर्त केवल एक ही है कि माता – पिता बनने की इच्छा रखने वाले पति – पत्नी स्वयं संयमी , विवेकी , वैराग्यवान , विद्यावान और त्यागी – तपस्वी विचारधारा के धनी हों। यह एक बच्चे के लिए उत्साहपूर्ण प्रार्थना है. एक अच्छा बच्चा पैदा करने के लिए, उसकी माँ और पिता को शुद्ध विचार रखने चाहिए और शास्त्रों के नियमों का पालन करना चाहिए/ दुनिया में एक अच्छे बच्चे को लाने के लिए माता-पिता की भूमिका निभाना आवश्यक है.

 2. पुंसवन 

यह दूसरा संस्कार समारोह गर्भावस्था के तीसरे या चौथे महीने के दौरान किया जाता है. सुश्रुतसंहिता के अनुसार जिस समय स्त्री ने गर्भधारण कर रखा हो, उन्हीं दिनों में लक्ष्मणा, वटशुंगा, सहदेवी और विश्वदेवा — इनमें से किसी एक औषधी को गोदुग्ध के साथ खूब महीन पीसकर उसकी तीन या चार बूँदें उस स्त्री की दाहिनी नासिका के छिद्र में डालें। इससे उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।  पहले संस्कार यानी गर्भदान की तरह, पुंसवन संस्कार भी परिवार के सदस्यों के लिए प्रतिबंधित है। स्मृतिसंग्रह में लिखा है-

गर्भाद् भवेच्च पुंसूते पुंस्त्वस्य प्रतिपादनम्

अर्थात् इस गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो, इसलिए पुंसवन-संस्कार किया जाता है।

जब महिला गर्भ अवस्था काल में गर्भस्थ शिशु के दिव्य निर्माण के दृष्टिगत अपने लिए ऐसी साधना की रूपरेखा खींचती है तो सचमुच वह दिव्य संतति को उत्पन्न करती है , इसीलिए हमारे समाज में माता को निर्माता कहकर संतान के निर्माण में उसके महत्वपूर्ण योगदान को नमन किया गया है।

3.सीमंतोन्नायन 

   इस संस्कार के माध्यम से गर्भस्थ शिशु के मस्तिष्क का विकास करने का विधान किया गया है । सीमन्त का अर्थ ही मस्तिष्क है और उन्नयन का अर्थ उसका विकास करना है । कहने का तात्पर्य है कि जिस संस्कार के माध्यम से बच्चे का मानसिक विकास किया जाए उसे सीमंतोन्नयन संस्कार कहते हैं । इस संस्कार को चौथे या छठे फिर आठवें माह में किए जाने का विधान है । सुश्रुत के अनुसार पांचवें महीने में मन अधिक जागृत होता है, छठे में बुद्धि जागृत होती है तो सातवें में अंग-प्रत्यंग अधिक व्यक्त होने लगते हैं। जबकि आठवें माह में ओज अधिक अस्थिर रहता है। आठवें महीने में गर्भस्थ शिशु के शरीर मन बुद्धि और हृदय सबका विकास हो जाता है। बच्चे के हृदय का विकास हो जाने के कारण इस अवस्था में आकर गर्भवती महिला दो हृदयों वाली कहीं जाने लगती है। इस अवस्था में गर्भवती महिला को कुछ ऐसी वस्तुओं के खाने का निर्देशन किया गया है जिससे गर्भस्थ शिशु के तन का अच्छा विकास हो सके।  अर्जून ने अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूहभेदन की जो शिक्षा दी थी, वह सब गर्भस्थशिशु अभिमन्यु सीख ली थी। उसी शिक्षा के आधार पर 16 वर्ष की आयु में ही अभिमन्यु ने अकेले 7 महारथियों से युद्ध कर चक्रव्यूह-भेदन किया।इस संस्कार को करते समय शास्त्रवर्णित गूलर वनस्पति द्वारा गार्भिणी पत्नी के सीमंत (मांग) का ॐ भूर्विनयामि, ॐ भूर्विनयामि, ॐ भूर्विनयामि, पढते हुए और पृथक् करणादि क्रियाएं करते हुए पति को निम्नलिखित मंत्रोच्चारण करना चाहिए 

-येनादितेः सीमानं नयाति प्रजापतिर्महते सौभगाय।तेनाहमस्यौ सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि।।

अर्थात जिस प्रकार देवमाता अदिति का सीमंतोन्नयन प्रजापति ने किया था, उसी प्रकार मैं इस गार्भिणी का सीमंतोन्नयन करके इसके पुत्र को जरावस्थापर्यंत दीर्घजीवी करता हूं।

 संस्कार के अंत में वृद्धा ब्राह्मणियों द्वारा पत्नी को आशीर्वाद दिलवाएं। सीमंतोन्नयन-संस्कार में पर्याप्त घी मिली खिचड़ी खिलाने का विधान है। इसका उल्लेख गोभिल गृहयसूत्र में इस प्रकार किया गया है

4. जातकर्म 

बच्चे के जन्म से छह दिन पर किया जाने वाला जात-कर्म घर की शुद्धि के लिए होता है. यह एक बच्चे को एक स्वच्छ वातावरण में रखने के लिए किया जाता है जहां वह किसी भी शारीरिक या मानसिक समस्या के प्रभाव में न आ सके. इसे षष्ठी भी कहा जाता है. देवी षष्ठी बच्चों की रक्षक हैं.  च्चे की त्वचा को साफ करने के लिए साबुन या बेसन और दही को मिलाकर उबटन के रूप में परिवार की वृद्ध महिला मल देती है। स्नान के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग होता है। चरक के अनुसार कान को साफ करके वे शब्द सुन सकें इसलिए कान के पास पत्थरों को बजाना चाहिए। शिशु के तन को कोमल वस्त्र या रुई से सावधानीपूर्वक साफ-सुथरा कर गोद में लेकर देवयज्ञ करके स्वर्ण शलाका को सममात्रा मिश्रित घी-शहद में डुबोकर उसकी जिह्वा पर ॐ नाम लिखा जाए । इस क्रिया के करने से उस बच्चे का वाक् देवता जागृत किया जाता है। उस शिशु के दाहिने तथा बाएं कान में ”वेदोऽसि“ भी कहा जाता है । जिसका अर्थ होता है – तू ज्ञानवान प्राणी है, अज्ञानी नहीं है। इस प्रकार ” मैं मूरख फ़लकामी ” – न कहकर मैं अमृत पुत्र हूं या तू अमृत पुत्र है , ऐसा कहने की भारत की परंपरा रही है। इतनी क्रिया प्रक्रियाओं के करने के पश्चात मां अपने स्थान से शिशु को दूध पिलाएगी तो वह बच्चा समझ जाएगा कि अब तू अमृत पान कर रहा है और तेरी तैयारी संसार में अमृतत्व को प्राप्त करने के लिए प्रारंभ हो गई है। जात-कर्म का पालन ग्रहा पूजा, होमा के साथ किया जाता हैं।

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