Friday, 17 April 2020

“आदित्य हृदय स्तोत्र”

वाल्मीकि रामायण के अनुसार “आदित्य हृदय स्तोत्र” अगस्त्य ऋषि द्वारा भगवान् श्री राम को युद्ध में रावण पर विजय प्राप्ति हेतु दिया गया था. आदित्य हृदय स्तोत्र का नित्य पाठ जीवन के अनेक कष्टों का एकमात्र निवारण है. इसके नियमित पाठ से मानसिक कष्ट, हृदय रोग, तनाव, शत्रु कष्ट और असफलताओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है. इस स्तोत्र में सूर्य देव की निष्ठापूर्वक उपासना करते हुए उनसे विजयी मार्ग पर ले जाने का अनुरोध है. 

ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः पूर्व पिठिता ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥1॥ 
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम् । येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥ 

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥4॥ 

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥5॥ 

मूल -स्तोत्र रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥6॥ 

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभि: ॥7॥ 

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥ 

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । 
वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥ 

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥ 

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥11॥ 

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥ 

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥ 

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥ 

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥15॥ 

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥ 

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥ 

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥ 

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥ 

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥ 

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥ 

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥ 

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥23॥ 

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥ 

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥ 

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम् । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥ 

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥27॥ 

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान् ॥28॥ 

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥29॥ 

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥30॥ 

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥ 

।।सम्पूर्ण ।।


रावन के साथ लड़ाई करते करते जब राम थक जाते है और यूद्ध के सोचने लगते है तभी रवाब उनके सामने यूद्ध करने के लिए उपस्थित हो जाता है। यूद्धभूमि की यह स्थिति को देख देवताओ के साथ यूद्ध को देखने आए अगस्त्य ऋषि राम के पास जाते है और उनसे कहते है।

सभी के हृदय में राज करने वाले राम आप मेरे इस सनातन गोपनीय स्तोत्र को सुने और इसका जप करे, ऐसा करने से आप युद्धभूमि में अपने समस्त शत्रुओ पर विजय पाएंगे।

हमारे द्वारा बताई जा रही यह स्तुति भगवान सूर्य को समर्पित है। अगर आप इस स्तुति का जप करते है तो इस स्तुति के प्रभाव से आपके सभी दुश्मन नष्ट हो जाएँगे और आप इस यूद्ध के निर्णायक बनेंगे और इस निर्णय के साथ सर्वोच्च आनंद कभी नहीं समाप्त होगा ।

भगवान सूर्य की यह भजन इनके सर्वोच्च प्रार्थना है। इस प्रार्थना के जाप से मनुष्य को हमेशा खुशी देती है, इसके साथ ही मनुष्य के सभी पाप, चिंता नष्ट होती और उसे आयु में वृद्धि होती है।

अनंत किरणों से सुशोभित एवं नित्य उदय होने वाले दुनिया के शासक एवं ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान सूर्य की पूजा करे। इनकी पूजा देवताओ एवं असुरो के द्वारा भी किया जाता है।

भगवान सूर्य ब्रह्माण्ड के सभी देवताओ के स्वरुप हैं, ये तेज़ की राशि है एवं इनकी किरणों से किरणों से पुरे ब्रह्माण्ड को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान होती । भगवान सूर्य स्वः चमत्कार है ये अपने किरण से देवताओ एवं असुरसो की दुनिया को एक साथ बनाए रखते है ।

भगवान सूर्य ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, महेंद्र, कुबेर, काल, यम, सोम एवं वरुन आदि में भी प्रचलित हैं।

भगवान सूर्य पिटर, वासु, साधुआस, अस्विनी देव, मार्ट्स, मनु, वायु, अग्नी, प्राण आदि सभी ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत होने के कारण इन्हें इन सभी सत्रों का निर्माता के रूप में भी जाना जाता है।

भगवान सूर्य अदिती के बेटा है जिन्हें ब्रह्मांड के निर्माता, कार्रवाई के प्रेरक, स्वर्ग के ट्रान्सवर्सर हैं । इन्हें निर्वाहक, सभी दिशाओं का प्रदीपन, सुनहरे रंग का प्रतिभाशाली और दिन का निर्माता भी कहा जाता है ।

अनगिनत किरणों के साथ व्याप्त भगवान सूर्य सर्वव्यापी है, इन्हें सात इंद्रियों की शक्ति के रूप में जाना जाता है । ये अंधेरे के फैलानेवाले, सुख और समृद्धि का लाभ, दुर्भाग्य को हटाने और जीवन का ज्ञान रखने वाले है ।

सूर्य एक ज्ञान एवं समृद्धि के स्वर्ण स्रोत है, वह अपने वर्षा से दुनिया को ठंडा करता है, विश्व को गर्मी एवं रोशनी प्रदानकरता है । वह रात में विलीन एवं शांत हो जाता है और अगले सुबह ठंड बर्फ और कोहरे को नष्ट करते हुए हम तह पहुचते है ।

सूर्य अंतरिक्ष के स्वामी, आकाश के शासक, अंधेरे के विद्वान, तीन वेदों रिग, यजुर एवं साम वेद के स्वामी है । भारी वर्षा के कारण भी यही है, या भगवान वरुना के दोस्त हैं । ये विंध्या रेंज को पार कर ब्रह्मा नदी को भी पार कर लिया है ।

वह, जिसका आकार गोल और रंगीन पीला है, तीव्रता से अवशोषित होता है और मृत्यु को जन्म देती है । वह सभी का विनाशकारी है और वह सर्वज्ञ है जो ब्रह्मांड को बेहद ऊर्जावान बना देता है एवं सभी कार्य को करते है ।

सूर्य सितारों, ग्रहों और सभी नक्षत्रों के स्वामी है, वह ब्रह्मांड सब कुछ का उत्पत्ति एवं चमकदार लोगों की चमक का कारण है । मई उन्हें नमस्कार करता हूँ जो सूर्य के बारह रूपों में प्रकट होते है ।

पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल को मेरा प्रणाम है । ग्रहों एवं तारों के स्वामी तथा दिन के स्वामी आपको मेरा प्रणाम है ।

आप जयस्वरूप एवं विजय और कल्याण के दाता हैं, आपके रथ में हरे रंग के घोड़े को भी मेरा नमस्कार है । सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है । आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से भी प्रसिद्द हैं, आपको नमस्कार है ।

उग्र, वीर एवं सारंग सूर्यदेव को मेरा नमस्कार है । कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को भी मेरा प्रणाम है ।

आप भगवान ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी है । सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले आपको मेरा नमस्कार है ।

हे प्रभु आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक है, आप जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं । आपका स्वरुप अप्रमेय है । आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, संपूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको मेरा प्रणाम है ।

प्रभु आप प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरी, आप विश्वकर्मा हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप एवं जगत के साक्षी हैं, आपको मेंरा प्रणाम है।

हे रघुनन्दन! ये भगवान् सूर्य ही संपूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये अपनी किरणों से गर्मी पहुंचाते और वर्षा भी करते हैं ।

ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं । ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं ।

सूर्य ही इस ब्रह्मांड में सभी कार्यों का भगवान है । देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं । संपूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं ।

विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।

हे राघव ! अगर आप पूरी भक्ति भाव एवं ईमानदार से इस स्तोत्र का भजन तीन बार करते है तो आप इस यूद्ध में अवश्य जित जाएँगे।

महाबाहो ! और तुम इसी समय रावण को यूद्ध में वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्य ऋषि वापस चले गए।

ऋषि के इन सभी बातो को सुन कर राम खुश हुए और बहादुर एवं ऊर्जावान बन गए।

भक्ति के साथ राम ने सूरज को देखा एवं तीन बार इस भजन का आनंद लिया । भजन के समाप्त होने पर राम ने अपने धनुष को उठाया और रावन से यूद्ध करने के लिए तैयार हो ग​ए।

रावण को नष्ट करने के दृढ़ संकल्प के साथ रावण को लड़ाई के लिए चुनौती दी ।

उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की और देखा और निशाचरराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा – ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’ ।

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