Thursday, 24 October 2019

रमा एकादशी


भगवान विष्णु के प्रिय और दान-पुण्य, जप-तप के लिए परम पावन कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी रमा एकादशी के नाम से जानी जाती है। इस वर्ष रमा एकादशी 24 अक्टूबर 2019 गुरुवार को आ रही है। इस दिन भगवान विष्णु का पूजन और भागवत महापुराण का पाठ करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है और उसके जीवन में मधुरता आती है। इस एकादशी के प्रभाव से व्यक्ति के पूर्व जन्मों के पाप भी नष्ट होते हैं और इस जन्म में मृत्यु के पश्चात उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। इस एकादशी को रंभा एकादशी भी कहा जाता है। माना जाता है कि सूर्य-चंद्र ग्रहण के दौरान गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह इस व्रत के दिन भगवान विष्णु के पूजन मात्र से प्राप्त हो जाता है। रमा एकादशी करने से मनुष्य को कुयोनियां प्राप्त नहीं होती है। इस एकादशी की पूजा में तुलसी का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

रमा एकादशी व्रत कथा


रमा एकादशी के संबंध में पुराणों में कथा मिलती है। उसके अनुसार एक समय मुचुकुंद नाम का राजा था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। इंद्र, वरुण, कुबेर और विभीषण आदि उसके मित्र थे। राजा बड़ा दयालु था और अपनी प्रजा का हर तरह से ध्यान रखता था। प्रजा भी राजा को बहुत पसंद करती थी। एक समय राजा के घर में एक कन्या ने जन्म लिया। कन्या का नाम चंद्रभागा रखा गया। पुत्री के युवा होने पर राजा ने उसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन के साथ कर दिया। जब चंद्रभागा अपने ससुराल में थी, तो एक एकादशी का व्रत आया। वह भी एकादशी का व्रत करने की कामना करती है, लेकिन उसका पति सोभन इस व्रत को करने में शारीरिक रूप से अक्षम था। वह अत्यंत कमजोर था इस कारण पत्नी को भी व्रत न करने के बारे में कहता। इस बात से चंद्रभागा बड़ी परेशान रहती थी। उसकी व्रत करने की बड़ी इच्छा रहती, इसलिए वह अपने पति को उस एक दिन के लिए किसी अन्य स्थान पर चले जाने को कहती है, ताकि वह सुखपूर्वक व्रत कर सके। पत्नी की यह बात सुनकर सोभन कहता है कि तब तो मैं यही रहूंगा और व्रत अवश्य ही करूंगा। इस प्रकार दोनों पति पत्नी एकादशी का व्रत करते हैं। व्रत में वह भूख प्यास से पीड़ित होने लगा और उसकी मृत्यु हो गई।


भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखें


राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल में प्रवाहित करा दिया और अपनी पुत्री को आज्ञा दी कि वह सती न हो और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखे। चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार पिता के घर में रहकर एकादशी के व्रत करने लगी। उधर रमा एकादशी के प्रभाव से सोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से वह जीवित हो उठा और उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ। उसे वहां का राजा बना दिया गया। किंतु वह नगर अस्थिर था और सोभन उस नगर से बाहर नहीं जा सकता था। उन्हीं दिनों मुचुकुंद नगर में रहने वाला सोम शर्मा नाम का एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला। घूमते हुए वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। वह ब्राह्मण सोभन को पहचान गया और उसको राजा का जमाई जानकर उसके निकट गया। राजा सोभन ब्राह्मण को देख आसन से उठ खड़ा हुआ और अपने ससुर तथा पत्नी चंद्रभागा की कुशलक्षेम पूछने लगा। सोभन की बात सुन सोम शर्मा ने कहा कि हे राजन हमारे राजा कुशल से हैं तथा आपकी पत्नी चंद्रभागा भी कुशल है। अब आप अपना वृत्तांत बतलाइए। आपने तो रमा एकादशी के दिन अन्न् जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको किस प्रकार प्राप्त हुआ।


कार्तिक माह की रमा एकादशी के व्रत का फल

इस पर सोभन ने कहा हे देव यह सब कार्तिक माह की रमा एकादशी के व्रत का फल है। किंतु यह अस्थिर है और मैं यहां से बाहर नहीं जा सकता। ब्राह्मण बोला राजन यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है। सोभन ने कहा ब्राह्मण देव मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ परंतु यदि तुम इस वृत्तांत को राजा मुचुकुंद की पुत्री चंद्रभागा से कहोगे तो वह इसको स्थिर बना सकती है। सोभन की बात सुन ब्राह्मण अपने नगर को लौट आया और उसने चंद्रभागा से सारा वाक्या सुनाया। चंद्रभागा बोली मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी। चंद्रभागा के वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चंद्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चंद्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई। सोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा को देखकर उसे प्रसन्न्तापूर्वक आसन पर अपने पास बैठा लिया। चंद्रभागा ने कहा हे स्वामी अब आप मेरे पुण्य को सुनिए जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी तभी से मैं सविधि एकादशी का व्रत कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। चंद्रभागा के व्रत के फलस्वरूप न केवल वह नगर स्थिर हुआ बल्कि वह अपने पति साथ सुखपूर्वक रहने लगी।


Wednesday, 16 October 2019

करवा चौथ की व्रत कथा

करवा चौथ पर्व पर इस बार खास संयोग का योग है। महिलाएं इस दिन रोहिणी और मंगल नक्षत्र में व्रत-पूजन कर पति की दीर्घायु की कामना करेंगी। यह शुभ संयोग सुहागिनों के लिए फलदायी रहेगा।


ज्योतिषाचार्य पं. दिवाकर त्रिपाठी पूर्वांचली के अनुसार गुरुवार को सूर्योदय 6:17 बजे होगा और चतुर्थी तिथि का मान पूरा दिन और रात्रिशेष 5:28 बजे तक रहेगा। कृतिका नक्षत्र योग दिन में 3:25 बजे तक रहेगा। इसके बाद रोहिणी नक्षत्र, योग व्यतिपात और वरियान दोनों है। चंद्रमा वृषभ राशि में उच्च स्थिति में रहेगा। यह योग प्रेम को समृद्ध करेगा। महिलाएं निर्जला व्रत रखकर व सोलह शृंगार कर चंद्रमा को अर्घ्य देंगी। इस दिन करवा चौथ व्रत की कथा भी सुननी चाहिए: यहां पढ़ें व्रत की कथा:

करवा चौथ की व्रत कथा-
करवा चौथ की कथा इंद्रप्रस्थ नगरी के वेदशर्मा नामक ब्राह्मण परिवार की पुत्री से जुड़ी है। सात भाइयों में अकेली बहन वीरावती का विवाह सुदर्शन नामक ब्राह्मण के साथ हुआ। वीरावती ने एक बार करवा चौथ का व्रत अपने मायके में किया। पूरे दिन निर्जल रहने के कारण वह निढाल हो गई। उसके भाइयों से उसकी यह दशा नहीं देखी गई। उन्होंने खेत में आग लगा कर समय से पहले ही नकली चांद उदय करा दिया। 

वीरावती की भाभियों ने उसे चांद निकलने की बात बता कर अर्घ्य दिलवा दिया। उसके बाद से वीरावती का पति लगातार बीमार रहने लगा। उसने इंद्र की पत्नी इंद्राणी का पूजन कर उनसे समाधान मांगा। उन्होंने व्रत के खंडित होने की बात बताई और पुन: विधि विधान से व्रत करने की सलाह दी। वीरावती ने वैसा ही किया। इससे उसका पति ठीक हो गया। उसी समय से यह व्रत लोक प्रचलन में आ गया।

Tuesday, 15 October 2019

इन 5 कामों के बिना आपका करवा चौथ रह जाएगा अधूरा

क्यों है करवा चौथ इतना महत्वपूर्ण...


करवा चौथ उत्तर भारतीय स्त्रियों के लिए एक बेहद ही ख़ास त्योहार है। भारत में इस व्रत को खासकर पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाती है। ये व्रत सिर्फ धार्मिक कारणों और मान्यताओं के लिए ही नहीं बल्कि पति-पत्नी के आपसी प्रेम और समर्पण का भी त्योहार है। करवा चौथ पति की लंबी आयु के लिए रखा जाने वाला व्रत है। 


क्या है इस व्रत का महत्त्व
सब लोग ये तो जानते हैं कि इस व्रत को पत्नियां अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए रखती हैं लेकिन क्या आप इसके महत्त्व के बारे में जानते हैं। मान्यताओं के मुताबिक और छांदोग्य उपनिषद के अनुसार करवा चौथ के दिन व्रत रखने वाली चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इससे जीवन के सभी तरह के कष्टों का निवारण तो होता ही है साथ ही लंबी उम्र भी प्राप्त होती है। करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणोश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य देकर पूजा होती है। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल,उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री रखकर सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर सुहाग सामग्री भेंट करनी चाहिए।

व्रत के बारे में महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले गए। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। अर्जुन की पत्नी द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। तभी उनके सखा श्रीकृष्ण उन्हें कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करने के बारे में बताते हैं, जिससे अर्जुन के सभी कष्ट दूर होगें। श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए विधि विधान से द्रौपदी करवाचौथ का व्रत रखती हैं जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है। यह व्रत यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।

व्रत के बारे में महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले गए। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। अर्जुन की पत्नी द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। तभी उनके सखा श्रीकृष्ण उन्हें कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करने के बारे में बताते हैं, जिससे अर्जुन के सभी कष्ट दूर होगें। श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए विधि विधान से द्रौपदी करवाचौथ का व्रत रखती हैं जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है। यह व्रत यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।


1. बहू को सरगी देना है बेहद ज़रूरी

ससुराल से मिलने वाली सरगी करवा चौथ के व्रत का सबसे ज़रूरी हिस्सा होती है। बता दें की व्रत शुरू होने से पहले हर सास अपनी बहू को कुछ मिठाइयां, कपड़े और श्रृंगार का सामान देती हैं, इसे ही सरगी कहा जाता है। करवा चौथ के दिन सूर्योदय होने से पहले सुबह लगभग चार बजे के आस-पास महिलाएं इसी सरगी को खाकर अपने व्रत की शुरुवात करती हैं। 


2. बेटी के घर बाया भेजती हैं मां

बता दें कि जिस तरह तरह सास का अपनी बहू को देती है उसी तरह बाया, मां और बेटी से जुड़ी रस्म है। हर करवा चौथ पर शाम को चौथ माता की पूजा शुरू होने से पहले हर मां अपनी बेटी के घर कुछ मिठाइयां, तोहफे और ड्राई फ्रूट्स भेजती है। इसे बाया कहा जाता है। ध्यान रखें बाया पूजा शुरू होने से पहले ही पहुंचाया जाना शुभ होता है।



3. कथा सुनना भी है ज़रूरी

करवा चौथ में जितना महत्व व्रत और पूजा का है उतना ही महत्व करवा चौथ की कथा सुनने का भी है। अक्सर ये देखा जाता है कि कई महिलाओं को कथा सुनने में रुचि नहीं होती और इसी वजह से वे कथा में अपना ध्यान नहीं लगातीं। हालांकि बिना कथा सुने आपका इस व्रत को रखने का कोई फायदा नहीं है। इस त्योहार में जितना जरूरी व्रत और पूजा करना होता है, उतना ही जरूरी कथा सुनना भी होता है। इसलिए सभी महिलाओं को एकचित्त होकर कथा सुननी चाहिए और अगर कथा नहीं सुननी है तो व्रत से भी परहेज करना चाहिए। 


करवा चौथ के गीत भी गाएं

करवा चौथ की पूजा के लिए आस-पास की सभी महिलाएं एक जगह मिलकर व्रत कथा सुनती हैं और पूजा करती हैं। ऐसे में पूजा के समय ही करवा चौथ के गीत और भजन गाए जाते हैं, इनमें हिस्सा लेना भी कथा सुनने के जितना ही महत्वपूर्ण है। ऐसा करने से वातावरण शुद्ध होता है और पूजा का पूरा फल प्राप्त होता है।


लाल साड़ी या लहंगा ही पहनें

ये तो सभी जानते हैं कि करवा चौथ का व्रत महिलाओं के वैवाहिक जीवन से जुड़ा होता है। इसलिए ये कहा जाता है कि महिलाओं को इस दिन अपनी शादी का जोड़ा पहनना चाहिए। अगर किसी के पास शादी का जोड़ा नहीं है तो उसे लाल रंग की साड़ी या लहंगा पहनना चाहिए। असल में मान्यताओं के मुताबिक लाल रंग को प्रेम का प्रतीक माना जाता है। करवा चौथ के दिन जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके इसी रंग का प्रयोग करना चाहिए।









Monday, 14 October 2019

घरेलु टोटके और उपाय

(1) अपने आस पास रहने वाले भूखे व्यक्ति और जीव जन्तुओ को उनके प्रिय भोजन कराये | वे उस भोजन से जैसे जैसे संतुष्ट होंगे आपका भाग्य वैसे ही चमकने लगेगा |

( 2 ) व्यक्ति को नशे की लत , माँस और तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए | अच्छे विचार के साथ जीवन जीना चाहिए | अपने गुस्से और वाणी पर नियंत्रण रखे |


(3 ) घर से जब भी काम के लिए निकले , अपने आराध्य से अच्छे और मंगल दिन की कामना करे |


(4) किसी मंदिर में जाकर करे | वहा किसी जरूरतमंद को भोजन कराये , वस्त्र दे और पाने चप्पल भी जरुर दान दे | इसके आपका दुर्भाग्य भी चलता बनेगा |


कैसे लाये लक्ष्मी 

यदि घर की मालकिन सुबह उठाकर सबसे पहले अपने आँगन को धोती है , तो यह लक्ष्मी माँ को घर में आने का निमंत्रण होता है 

|घरेलु टोटके और उपाय

(1) कभी भी अग्नि और जल को लांघे नही | यह देवता समान है |

(2) किसी निर्जन जगह या जंगल में किसी भी पेड़ के ऊपर पेशाब ना करे |

(3) हाथ से गिरा हुआ और जमीन पर पड़ा हुई खाने की चीज को ना तो खुद खाए और ना ही दुसरो को खाने दे |

(4) महिलाओ को पीरियड के समय चौराहे से दूर रहना चाहिए वरन उन्हें काली शक्तियाँ मिल सकती है |

(5) पीपल , मेहंदी , बरगद के पेड़ के निचे संध्या के बाद कोई मीठी चीज नही खानी चाहिए |

(6) अन्न का कभी अपमान ना करे |

(7) अमावस्या के दिन अच्छे से घर की सफाई करे और सुबह और शाम को गूगल की धुप से घर में खुशबु फैलाये | यह लाल किताब का उपाय घर को बीमारी से दूर रखता है |

(8) घर के अग्नि कोन में पानी की कोई टंकी नही होनी चाहिए | यह जगह वास्तु शास्त्र से अग्नि देव की है | यहा आप लाल रंग का हमेशा बल्ब जला करे रखे |

Thursday, 10 October 2019

माँ सृष्टि-देवी के बीज मंत्रो से उपचार!

🌹 *खं*– हार्ट-टैक कभी नही होता है | उच्च रक्तचाप (हाई बी.पी.), निम्न रक्तचाप (लो बी.पी.) कभी नही होता | * ५० माला जप करें, तो लीवर ठीक हो जाता है | १०० माला जप करें तो शनि देवता के ग्रह का प्रभाव चला जाता है |

बीज मंत्रो से उपचार! * कां, * गुं, * शं

🌹 *कां*– पेट सम्बन्धी कोई भी विकार और विशेष रूप से आंतों की सूजन में लाभकारी। 🌹 *गुं*– मलाशय और मूत्र सम्बन्धी रोगों में उपयोगी। 🌹 *शं*– वाणी दोष, स्वप्न दोष, महिलाओं में गर्भाशय सम्बन्धी विकार औेर हर्निया आदि रोगों में उपयोगी ।

बीज मंत्रो से उपचार! * घं, * ढं

🌹 *घं* – काम वासना को नियंत्रित करने वाला और मारण-मोहन-उच्चाटन आदि के दुष्प्रभाव के कारण जनित रोग-विकार को शांत करने में सहायक।🌹 *ढं*– मानसिक शांति देने में सहायक। अप्राकृतिक विपदाओं जैसे मारण, स्तम्भन आदि प्रयोगों से उत्पन्न हुए विकारों में उपयोगी।

बीज मंत्रो से उपचार! * पं, * बं, * यं, * रं

🌹 *पं*– फेफड़ों के रोग जैसे टी.बी., अस्थमा, श्वास रोग आदि के लिए गुणकारी। 🌹 *बं*– शूगर, वमन, कफ, विकार, जोडों के दर्द आदि में सहायक। 🌹 *यं*– बच्चों के चंचल मन के एकाग्र करने में अत्यत सहायक। 🌹 *रं* – उदर विकार, शरीर में पित्त जनित रोग, ज्वर आदि में उपयोगी।


बीज मंत्रो से उपचार! * लं, * मं, * घं, * एं

🌹 *लं*– महिलाओं के अनियमित मासिक धर्म, उनके अनेक गुप्त रोग तथा विशेष रूप से आलस्य को दूर करने में उपयोगी।*🌹मं*– महिलाओं में स्तन सम्बन्धी विकारों में सहायक।*🌹धं* – तनाव से मुक्ति के लिए मानसिक संत्रास दूर करने में उपयोगी ।*🌹ऐं*– वात नाशक, रक्त चाप, रक्त में कोलेस्ट्राॅल, मूर्छा आदि असाध्य रोगों में सहायक।

बीज मंत्रो से उपचार! * द्वान्, * ह्रीं, * एं, * वं, * शुं

*🌹द्वां*– कान के समस्त रोगों में सहायक।*🌹ह्रीं*– कफ विकार जनित रोगों में सहायक।*🌹ऐं*– पित्त जनित रोगों में उपयोगी।*🌹वं*– वात जनित रोगों में उपयोगी।*🌹शुं*– आंतों के विकार तथा पेट संबंधी अनेक रोगों में सहायक ।


बीज मंत्रो से उपचार! * हुं, * अं, *

*🌹हुं*– यह बीज एक प्रबल एन्टीबॉयटिक सिद्ध होता है। गाल ब्लैडर, अपच, लिकोरिया आदि रोगों में उपयोगी।*🌹अं* – पथरी, बच्चों के कमजोर मसाने, पेट की जलन, मानसिक शान्ति आदि में सहायक इस बीज का सतत जप करने से शरीर में शक्ति का संचार उत्पन्न होता है।


सावधानियां...

बीज मंत्रों से अनेक रोगों का निदान सफल है। आवश्यकता केवल अपने अनुकूल प्रभावशाली मंत्र चुनने और उसका शुद्ध उच्चारण करने की है। पौराणिक, वेद, शाबर आदि मंत्रों में बीज मंत्र सर्वाधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं उठते-बैठते, सोते-जागते उस मंत्र का सतत् शुद्ध उच्चारण करते रहें। आपको चमत्कारिक रुप से अपने अन्दर अन्तर दिखाई देने लगेगा। यह बात सदैव ध्यान रखें कि बीज मंत्रों में उसकी शक्ति का सार उसके अर्थ में नहीं बल्कि उसके विशुद्ध उच्चारण को एक निश्चित लय और ताल से करने में है। बीज मंत्र में सर्वाधिक महत्व उसके बिन्दु में है और यह ज्ञान केवल वैदिक व्याकरण के सघन ज्ञान द्वारा ही संभव है। आप स्वयं देखें कि एक बिन्दु के तीन अलग-2 उच्चारण हैं। गंगा शब्द ‘ङ’ प्रधान है। गन्दा शब्द ‘न’ प्रधान है। गंभीर शब्द ‘म’ प्रधान है। अर्थात इनमें क्रमशः ङ, न और म, का उच्चारण हो रहा है।


Tuesday, 8 October 2019

चांडाल को भी होता है ,श्री जगन्नाथ रथ को खींचने का अधिकार

श्री जगदीश रथ यात्रा का विशेष महत्व है। पुण्य नक्षत्र में सुभद्रा समेत भगवान जगन्नाथ व बलराम के रथ निकालने का विधान है। वैसे तो यह यह पर्व देशभर में मनाया जाता है, लेकिन जगन्नाथ पुरी में यह पर्व मनाने का विशेष महत्व है। इस पर्व का विशेष सम्बन्ध भी जगन्नाथपुरी से ही है।

जगन्नाथपुरी भारत के चार धामों में से एक है। यह मंदिर भारतीय शिल्पकला की अनूठी मिसाल है। ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण विश्वकर्मा जी ने किया था। इस तीर्थ की विशेषता यह है कि यहां जातीय बंधनों का बिल्कुल भी पालन नहीं किया जाता है।

इस मंदिर की देव प्रतिमाओं को वर्ष में एक बार मंदिर के बाहर लाया जाता है और नगर की रथयात्रा कराई जाती है। रथ खींचने का अधिकार चांडाल तक को भी होता है। जगन्नाथ पुरी में जगतगुरु शंकराचार्य द्बारा स्थापित गोवर्धन पीठ भी है। इसके अतिरिक्त वैष्णव, शैव, शाक्य आदि सभी सम्प्रदायों के मठ यहां मौजूद हैं। रथ यात्रा के दिन देश के कोने-कोने से लोग एकत्र होकर यहां पहुंचते हैं। जगन्नाथ जी का रथ 45 फीट ऊंचा, 35 फीट लम्बा और इतना ही चौड़ा होता है। इसमें सात फीट व्यास के 16 पहिये होते हैं। बलभद्र जी का रथ 44 फीट ऊंचा होता है, जिसमें 12 पहिये होते हैं। सुभद्रा जी का रथ 43 फीट ऊंचा होता है। इसमें भी 12 पहिये होते हैं। ये रथ हर वर्ष बनाए जाते हैं। मंदिर के सिंह द्बार पर बैठेकर भगवान जनकपुरी की ओर रथ यात्रा करते हैं।

इन रथों को खींचने वाले मनुष्यों की संख्या करीब 42 हजार होती है। जनकपुरी पहुंचकर तीन दिन तक भगवान वहीं ठहरते हैं। वहां उनकी भेंट लक्ष्मी जी से होती है। इसके पश्चात लौटकर भगवान फिर जगन्नाथ पुरी में आसन पर सुशोभित होते है। यह रथ यात्रा हर वर्ष पारम्परिक रूप से निकाली जाती है।




Monday, 7 October 2019

मां सिद्धिदात्री की पूजा

शारदीय नवरात्रि की नवमी को महानवमी के नाम से जाना जाता है और इस दिन होती है मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा। मां के इस अंतिम स्वरूप की पूजा करके उन्हें विदाई दी जाती है।

वहीं दूसरी ओर महानवमी के दिन छोटी- छोटी कन्याओं को मां का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें उपहार आदि दिए जाते हैं। इसके बाद उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन ऐसा करने से मां की कृपा प्राप्त होती है

ऐसा है मां सिद्धिदात्री का स्वरूप

नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है इनका वाहन सिंह हैं। देवी सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर भी विराजमान है।

मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण से ही भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर कहलाए।

दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। इसलिए मां का यह रूप अत्यंत ही मोहक है।

माना जाता है कि मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

मां सिद्धिदात्री की पूजा पूरे विधि-विधान से की जानी चाहिए और इनकी पूजा में किसी तरह की कोई गलती भी नहीं होनी चाहिए ताकि पूजा का पूरा फल मिल सके।

ऐसे करें मां सिद्धिदात्री की पूजा

-महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह नवरात्रि का आखिरी दिन होता है। इस दिन मां का पूजन करके उन्हें विदाई दी जाती है।

- सबसे पहले साधक को शुद्ध होकर साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद एक चौकी पर मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। - इसके बाद मां को फल, फूल, माला, नैवेद्य आदि अर्पित करने चाहिए और मां कि विधिवत पूजा करनी चाहिए। अंत मे मां कि आरती उतारें।

- इस दिन कन्या पूजन को विशेष महत्व दिया जाता है। छोटी- छोटी नौ कन्याओं को घर बुलाकर उनका भी पूजन करें और उन्हें उपहार अवश्य दें।

- अंत में पैर छुकर उनका आर्शीवाद लें । ब्राह्मण और गाय को भी इस दिन भोजन अवश्य कराएं।
आप सभी परिवार को नवरात्रि पर्व नवमा दिन की हार्दिक शुभकामनाएं है